UP : गाय मारने पर दस साल, ‘मुसलमान’ मारने पर कोई सज़ा नहीं !

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उत्तर प्रदेश सरकार ने 10 जून 2020 को गो-हत्या निवारण अध्यादेश में संशोधन को मंज़ूरी दे दी है । अब उत्तर प्रदेश में इस अध्यादेश के मुताबिक गाय की हत्या पर 10 साल तक की सज़ा और 3 से 5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है । इसके अलावा गोवंश के अंग भंग करने पर 7 साल की जेल और 3 लाख तक जुर्माना भी लगाया जाएगा। अभी तक गोवंश को नुक़सान पहुंचाने पर सज़ा का प्रावधान नहीं था । अब इसमें एक साल से सात साल तक की सज़ा का प्रावधान भी कर दिया गया है ।

उत्तर प्रदेश सरकार इसके लिए जल्द ही गो-वध निवारण (संशोधन) अध्यादेश-2020 लेकर आने जा रही है । सूबे के मुख्यमंत्री योगी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में इसके मसौदे को मंजूरी दे गई। योगी सरकार विधानमंडल सत्र होने पर इसे विधेयक के रूप में दोनों सदनों से पास कराया जाएगा। सरकार के अनुसार इस अध्यादेश का मक़सद गोकशी की घटनाओं व गोवंश से जुड़े अपराधों को पूरी तरह रोकना है।

गोकशी करने पर अब दस साल की सज़ा

उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि राज्य कैबिनेट ने साल 1955 के इस क़ानून में संशोधन के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है। राज्य विधानमंडल का सत्र न होने की वजह से सरकार ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण (संशोधन) अध्यादेश, 2020 लाने का फ़ैसला लिया गया है।

अपर मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने बताया कि इस अध्यादेश को लाने का मक़सद उत्तर प्रदेश गोवध निवारण क़ानून, 1955 को और अधिक संगठित और प्रभावी बनाना तथा गोवंशीय पशुओं की रक्षा और गोकशी की घटनाओं से संबंधित अपराधों पर पूरी तरह से लगाम लगाना है ।

आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 दिनांक 6 जनवरी, 1956 को यूपी में लागू हुआ था। इस क़ानून में अब तक चार बार और नियमावली में दो बार संशोधन किया जा चुका है ।

नुक़सान पहुंचाने पर तीन लाख तक जुर्माना

जो कोई धारा -3, धारा-5 या धारा-5 ‘क’ के उपबन्धों का उल्लंघन करता है या उल्लंघन करने का प्रयास करता है या उल्लंघन करने के लिए दुष्प्रेरित करता है, वह तीन साल से 10 साल की सज़ा पाएगा। जुर्माना तीन लाख से पांच लाख तक होगा। अगर एक बार दोष सिद्ध होने के बाद पुन: अपराध करते पाया गया तो उसे दोहरे दंड से दंडित किया जाएगा। ऐसे अपराधों के अभियुक्तों का नाम, फोटोग्राफ, उसका निवास स्थल है, प्रकाशित किया जाएगा।

गोवंशीय पशुओं को शारीरिक क्षति द्वारा उनके जीवन को संकट में डालने अथवा उनका अंग-भंग करने और गोवंशीय पशुओं के जीवन को संकट में डालने वाली परिस्थितियों में परिवहन किए जाने पर अब तक दंड नहीं था। अब यह अपराध करने पर कम से कम एक वर्ष का कारावास होगा और 7 वर्ष तक हो सकता है। जुर्माना एक लाख से तीन लाख तक हो सकता है।

अब बड़ा सवाल ये है कि सूबे की योगी सरकार में गाय के नाम पर बेगुनाह क़त्ल किए गए मुसलमानों को कब इंसाफ दिलाएगी ?

CAA-NRC का विरोध करने पर 23 लोगों को मौत के घाट उतारने वालों को कब सज़ा दिलाएगी सूबे की योगी सरकार ?

दादरी में मोहम्मद अख़लाक़ को पका हुआ मीट रखने के नाम पर पीट-पीटकर मार दिया गया, जबकि जांच में मीट भैंस का नहीं पाया गया । अख़लाक को इंसाफ के नाम पर तिरस्कार के सिवा कुछ न मिला ।

उत्तर प्रदेश में कई ऐसे भी मामले हैं जिनमें पीड़ितों को गोमांस रखने के किसी सबूत के न होने या उनके साथ कोई गाय न होने के बावजूद भी मार डाला गया। गोरक्षा के नाम पर लगभग सभी मवेशियों, फार्म और पॉल्ट्री पशुओं की हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा रक्षा की जा रही है और इस क्रम में मुसलमानों के ख़िलाफ़ एकतरफ़ा हिंसा को अंजाम दिया जा रहा है। यहां तक की अब मुसलमान गाय पालने से भी डरने लगा है ।


कई बार इन हमलों में गायों की वास्तव में कोई भूमिका नहीं होती है।

गोरक्षा के नाम पर देश भर में मुस्लिमों के साथ हिंसा की घटनाएं नई नहीं हैं । हाल के वर्षों में मुस्लिमों की पीट-पीटकर हत्या (लिंचिंग), खासकर ‘मवेशी’ रक्षा के बहाने हुई लिंचिंग की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है। पिछले कुछ सालों में ऐसी दर्जनों हत्याएं हुई हैं। इन हत्याओं में पुलिस की जांच को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं ।

मुस्लिमों पर कथित गोकशी के अलावा दूसरे कारणों से या गैर-मुस्लिमों- ख़ासतौर पर दलितों और आदिवासियों की- तुच्छ आरोपों के चलते लिंचिंग की घटनाएं इससे अलग हैं। फिर भी ‘गोरक्षा’ वह मुख्य बहाना है, जिसकी आड़ में पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिमों को पीट-पीटकर मार देने की कई घटनाएं सामने आई हैं।

इन लिंचिंग की घटनाओं की एक अन्य सामान्य विशेषता यह कही जा सकती है कि लिंचिंग के ज्यादातर मामले राजमार्गों और गांवों में हुए। इन इलाकों में कानून और व्यवस्था की प्रणाली कमजोर और ढीली-ढाली होती है और बहुत दिलेर पुलिसकर्मियों का दल भी ऐसी हिंसा को रोकने के लिए घटनास्थल पर समय पर नहीं पहुंच सकता। सरकार का भी रवया इन मामलों एक ख़ास समुदाय के विरुद्ध ही नज़र आता है । प्रसाशनिक संस्थाएं भी पीड़ित पक्ष को पहले से ही मुजरिम मान कर चलती हैं ।

सितंबर 2015 में भीड़ के हाथों मोहम्मद अख़लाक की हत्या से लेकर अब तक भारत में मॉब लिंचिंग के मामलों में 80 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं। इनमें से हत्या के 30 से ज़्यादा मामलों में सीधे तौर पर स्वघोषित गौ-रक्षकों की भूमिका है।इन हत्याओं में इंसाफ का पैमाना बिल्कुल ख़ाली नज़र आता है । गवाहों और रिकॉर्डेड दस्तावेज़ों के बावजूद मॉब लिंचिंग से जुड़े मामले अदालतों में ‘ब्लाइंड मर्डर’ में तब्दील होते नज़र आती रही है । सरकारी मशीनरी भी इन मामलों पर सवालों के घेरे में खड़ी हुई है ।

देश के अन्य राज्यों में भी गाय के नाम पर जारी है हत्या

18 मार्च, 2016, को लोगों के एक समूह ने दो मुस्लिम चरवाहों की हत्या कर दी ये चरवाहे भारत के झारखण्ड राज्य के एक पशु मेले में अपने बैलों को बेचने के लिए जा रहे थे। सभी हमलावर स्थानीय “गौरक्षा” समूह से जुड़े हुए थे। उन्होंने 35 साल के मोहम्मद मजलूम अंसारी और 12-वर्षीय इम्तेयाज़ खान पर मवेशियों को कसाईखाना भेजने का आरोप लगाया, फिर उन्हें पीट-पीटकर मार डाला और उनके शवों को एक पेड़ से लटका दिया। इस मामले में भी इंसाफ का तराज़ू आज भी झूला ही झूल रहा है ।


मई 2014 में, केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के सत्तारूढ़ होने के बाद इसके सदस्य लगातार सांप्रदायिक और उग्र बयानबाज़ी करते रहे हैं । इसके कारण, गोमांस का उपभोग करने और इससे जुड़े समझे जाने वाले लोगों के खिलाफ गौरक्षकों का हिंसक अभियान शुरू हुआ। मई 2015 से दिसंबर 2018 के बीच, भारत के 12 राज्यों में कम-से-कम 44 लोग मारे गए जिनमें 36 मुस्लिम थे । इसी अवधि में, 20 राज्यों में 100 से अधिक अलग-अलग घटनाओं में करीब 280 लोग घायल हुए।

वर्णित ज्यादातर मामलों में, पीड़ितों के परिवार, वकीलों और कार्यकर्ताओं की मदद से इंसाफ़ पाने की राह में कुछ कदम आगे बढ़ा पाए हैं, लेकिन कई परिवार बदले की कार्रवाई से डरते हैं और अपनी शिकायतों को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं कर पाते हैं।

आइये अब आपको उन 23 बेगुनाह लोगों की कहानी बताते हैं जिनको सरेआम क़त्ल कर दिया गया मगर इंसाफ के दरवाज़े आज भी उनके लिए बंद कर दिए गए ।

उत्तर प्रदेश में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA) और (NRC) के विरोध के दौरान क्रूर दमन की कार्रवाई में 23 लोग मारे गए । राज्य की ओर से दमन इस प्रकार का ढाया गया कि किसी का भी दिल दहल जाए ।

अधिकतर मौतों की वजह

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गोली लगने की वजह से 21 लोग मारे गए, जबकि एक बच्चे की मौत लाठीचार्ज के दौरान मची भगदड़ में कुचल जाने से हुई थी, और एक व्यक्ति की पत्थर से सिर में चोट लगने से मौत हो गई। हालाँकि कई राजनीतिक पार्टियों और विभिन्न फैक्ट-फाइंडिंग कमेटियों ने आरोप लगाये हैं कि इनमें से अधिकतर मौतें पुलिस की गोलियों के चलते हुई हैं।

कथित पुलिसिया बर्बरता की करतूत के नमूने और मुस्लिम इलाकों में छाई बदहवासी के बारे में बताते हुए कानपुर की पूर्व सांसद ने इसमें जोड़ते हुए कहा था “हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि जो भी गोलीबारी और भगदड़ मचने की घटनाएं हुई हैं वे सब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस बयान के बाद घटित हुई हैं, जिसमें उन्होंने बदला लेने की बात कही थी और पुलिस के अधिकारियों ने उसी के अनुसार इसे अंजाम दिया।”

इस बात पर विशेष ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है कि 19 जनवरी को आदित्यनाथ के ‘बदला” लेने वाले विवादास्पद बयान के बाद से ही पूरे राज्य में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की सख्ती तेज हो गई थी। हिंसा के दौरान मारे गए अधिकांश प्रदर्शनकारी आर्थिक तौर पर कमजोर पृष्ठभूमि वाले परिवारों से थे। और पीड़ितों में से अधिकतर दिहाड़ी मजदूर थे।

उत्तर प्रदेश में सीएए विरोधी प्रदर्शनों का जिस प्रकार से निर्दयतापूर्ण दमन किया गया है और जिसके चलते 23 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है, जिनमें से अधिकतर कथित पुलिस फायरिंग में मारे गए बताये जा रहे हैं, इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि राज्य सरकार मानवीय तौर पर इन विरोध प्रदर्शनों को संभाल पाने में विफल रही थी।

यूपी में पुलिस की बर्बरता का संज्ञान लेते हुए कई नागरिक संगठनों ने 16 जनवरी को नई दिल्ली में ‘पीपल्स ट्रिब्यूनल’ का गठन किया। 19-20 दिसंबर को पुलिस की पक्षपातपूर्ण कार्रवाई को लेकर पीड़ितों के परिवारों और फैक्ट-फाइंडिंग कमेटियों की ओर से प्राप्त कई रिपोर्टों के आधार पर जूरी ने यूपी पुलिस के अधिकरियों की कार्यशैली पर बेहद तीखी टिप्पणियाँ की थी।

जूरी में शामिल जस्टिस ए पी शाह और सुदर्शन रेड्डी सहित अन्य सदस्यों ने एकमत स्वर में कहा था, “हम इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हैं कि सम्पूर्ण राज्य मशीनरी ने राज्य की मुस्लिम आबादी और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपना निशाना बनाते हुए घोर पूर्वाग्रह और आपराधिक कृत्य के तौर पर काम किया है।

सरकारी आतंकवाद बनाम पसमांदा मुसलमान

अब सवाल ये है कि एक उत्तर प्रदेश में सरकार गाय मारने पर दस वर्ष तक की सज़ा का प्रवाधान लाई है मगर सूबे में गाय के नाम पर मारे गए दर्जनों लोगों को इंसाफं क्यों नहीं दे सकी ? क्या यह माना जाए कि ये गो-हत्या निवारण अध्यादेश में संशोधन प्रदेश के मुसलमानों को डराने के लिय है या उनको जबरन जेल में डालने के लिए ?

इस देश में राजनीतिक कर्णधार अपने फायदों के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हैं । पुलिस इतनी ज़्यादा मज़बूत हो चुकी है कि वास्तव में यह देश पुलिस राज्य बन चुका है । हर वैध-अवैध के मालिक ये कर्णधार ऐसे देश प्रेमी हैं जो वतन को बेच-बेचकर खा रहे हैं । हमारा देश दुनिया का एकमात्र देश है जहां बेगुनाह मुसलमानों से जेल भरी पड़ी है । सांप्रदायिक दंगों में क़त्ल होने वाला मुसलमान ही कातिल बनाया जाता है ।

इंसाफ अदालत की चौखट पर सर पटक रहा है !

हज़ारों मुस्लिम नौजवानों की ज़िंदगी बेगुनाह होते हुए भी जेलों की चार दीवारी में गुज़र गई । पुलिस ऐसा क्यों करती है ? एक तो मुसलमानों के ख़िलाफ उसके मनो-मस्तिष्क में कूट-कूटकर भरी गयी नफ़रत और दुश्मनी, दूसरे अपनी अकर्मण्यता पर परदा डालने के लिए। पुलिस जब भी ये ग़लत काम करती है तो उसे सरकार का पूरा-पूरा समर्थन प्राप्त होता है ।

वही, दूसरी तरफ़ CAA-NRC का विरोध करने वाले 23 से अधिक नव-जवानों की मौत पर आज भी इंसाफ अदालत की चौखट पर सर पटक रहा है । दर्जनों परिवार को आपार दुख दे कर सरकारी मशीनरी आज भी नए-नए तरीकों से मुसलमानों पर ज़ुल्म कर रही है । क्या ये माना जाए कि सरकार का मुसलमानों के प्रति हर नज़रिया दमन करने वाला ही है ?

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