तेजस्वी यादव और जगन मोहन रेड्डी की तुलना

तेजस्वी की तुलना जगनमोहन रेड्डी से क्यों की जा रही है?

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बिहार में जिस तरह का जनसमर्थन तेजस्वी यादव की रैलियों को मिल रहा है उसे देखकर आंध्र प्रदेश में हुए चुनाव की यादें ताज़ा हो रही है। कुछ इसी तरह की भीड़ जगन मोहन रेड्डी की रैलियों में देखी जा रही थी। जगन मोहन रेड्डी की पार्टी की 9 साल बाद सत्ता में वापसी हुई और उन्होंने सत्तारुढ़ टीडीपी को हराकर राज्य में सत्ता स्थापित की। जिस तरह की जीत जगन मोहन रेड्डी को मिली उसकी कल्पना न चंद्रबाबू नायडू ने की थी न ही खुद जगन मोहन रेड्डी ने। अब बिहार में जिस तरह का जनसमर्थन तेजस्वी को मिल रहा है उसको देखकर खुद तेजस्वी भी हैरान है।

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बिहार में हर राजनीतिक पार्टी यही कह रही हैं कि ज़मीन पर नीतीश कुमार के लिए जनता में गुस्सा है। प्रधानमंत्री मोदी की रैली में आए लोग कह रहे हैं कि वो केंद्र में वोट मोदी को देते हैं लेकिन बिहार में तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाएंगे। कोरोना महामारी में नीतीश कुमार की निष्क्रियता और प्रवासी मज़दूर के बेरोज़गारी संकट पर मौन रही जेडीयू के खिलाफ माहौल बनता दिखाई दे रहा है। तेजस्वी की रैलियों में उमड़ रही अप्रत्याशित भीड़ से भाजपा और जेडीयू दोनो ही बेचैन है। शुरुवाती दौर में हुई रैलियों में जब भीड़ उमड़ी तो बीजेपी के नेताओं ने कहा कि यह राजद की परंपरागत सीटें हैं, वहां भीड़ उमड़ना स्वाभाविक है। लेकिन हाल ही में जब नीतीश कुमार के गृह जिले में तेजस्वी ने रैली की तो वहां भी जनता उन्हें सुनने को उमड़ पड़ी।

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जगन मोहन रेड्डी को मिली सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण टीडीपी के लिए बना एंटी इनकंबेंसी फैक्टर माना जाता है। बिहार में भी नीतीश कुमार पिछले 15 सालों से मुख्यमंत्री हैं। बेरोज़गारी, शिक्षा, दारु पर प्रतिबंध, चरमराता लॉ एंड ऑर्डर और भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या बनकर नीतीश के सामने खड़ा हो गया है। पिछले 5 साल में डबल इंजन की सरकार होते हुए भी नीतीश वो नहीं कर पाए जिसकी उनसे उम्मीद थी। भाजपा के वोटर भी दबी आवाज़ में कहते हैं कि वो अब नीतीश को सीएम के रुप में नहीं देखना चाहते। भाजपा का वोटर बिहार में अब भाजपा का मुख्यमंत्री चाहता है।

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भीड़ से जीत का अंदाज़ा लगाना गलत?

पत्रकारों और राजनीतिक पंडितों का कहना है कि रैलियों की भीड़ वोट में बदल जाए ऐसा ज़रुरी नहीं। पिछले चुनावों में मोदी की रैलियों में अप्रत्याशित भीड़ देखी गई थी लेकिन भाजपा चुनाव हार गई। बिहार में जाति का प्रभाव सबसे ज्यादा है। यहां सोशल इंजीनीयरिंग से चुनाव होता है। लोगों को जब लगता है कि यादव वोट इस पार्टी को पड़ेगा तो दूसरी जातियां अलग पार्टी को वोट कर देती हैं।

बेरोज़गारी बनाम राम मंदिर और धारा 370

बिहार चुनाव में इस बार बेरोज़गारी एक बड़ा मुद्दा है। अगर आप अलग-अलग पार्टियों के घोषणापत्र पर नज़र डाले तो देखेंगे की सभी पार्टियों ने बंपर नौकरियों का वाद किया है। भाजपा 19 लाख रोज़गार का वादा करती है तो राजद 10 लाख। वहीं नीतीश कहते हैं कि इतना पैसा कहां से लाएंगे। भाजपा अपनी रैलियों में राम मंदिर और धारा 370 का मुद्दा उठाती है लेकिन उसका ज़ोर विकास पर ज़्यादा दिखाई देता है। वहीं तेजस्वी यादव बार-बार रैलियों में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और विशेष राज्य के दर्जे पर सवाल पूछते नज़र आते हैं। ज़मीन पर खड़ी जनता से जब पूछा जाता है कि नीतीश या तेजस्वी तो वो कहते हैं कि नीतीश तब कहां था जब लॉकडाउन में पुलिस उन पर लाठियां बरसा रही थी।

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बिहार का चुनाव हमेशा ही दिलचस्प रहा है। पिछले चुनावों में लग रहा था कि नरेंद्र मोदी लहर पर सवार होकर भाजपा जीत जाएगी। लेकिन नीतीश के डीएनए और मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान ने पूरा चुनाव बदल कर रख दिया था। पहले चरण की वोटिंग 28 अक्टूबर को होनी है। इससे पहले देखना है कि कौनसी पार्टी क्या दांव चलती है क्योंकि राजनीति में जनता का रुख रातों रात बदल जाता है।

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