सुप्रीम कोर्ट द्वारा 48 हज़ार झुग्गी-झोपड़ियां गिराने का आदेश ग़रीब की छाती पर अमीर की JCB जैसा...

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 48 हज़ार झुग्गी-झोपड़ियां गिराने का आदेश ग़रीब की छाती पर अमीर की JCB जैसा…

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

उचत्तम न्यायालय ने अगले 3 माह में ट्रेन की पटरियों के किनारे बनी 48 हज़ार झुग्गी-झोपड़ियों को गिराने का आदेश जारी कर दिया है। वहीं इसी मामले पर जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने हाल के फैसले में कहा है कि इन झुग्गी-झोपड़ियों को रेलवे ट्रैक के किनारे से हटाने के लिए किसी भी तरह से देश का कोई भी कोर्ट अगर आदेश पारित करता है, तो वह आदेश प्रभावी नहीं होगा।

इस देश में ग़रीब होने के क्या मायने हैं इसका मतलब न्यायालय के इस फैसले से लगाया जा सकता है। जब  कोई न्यायालय 48 हज़ार झुग्गियों को ज़मादोश करने का आदेश दे और बेघर होने वाले लोगों से अपील का अधिकार छीन ले, राजनीतिक हस्तक्षेप को प्रतिबन्धित कर दे और फैसला एक अध्यादेश की तरह जारी करे तो समझ लीजिए न्याय का घर पहले ही उजड़ चुका है। इस देश में ग़रीब होना किसी जुर्म सा होने लगा है।

वहां दमनकारी ताक़तों का कब्ज़ा है। यह एक मनुष्यद्रोही, नागरिक द्रोही संरचना है। इस आततायी की क्रूरता की पहचान ज़रूरी है।महामारी के समय यह फरमान कोई दुश्मन ही सुना सकता है। बहुत अधिक लोगों को लगता है। झुग्गी-झोपड़ी तो घर नहीं है। वह तो अस्थायी बसेरा है और उनका उजड़ जाना न केवल स्वाभाविक है बल्कि उचित भी है।

कोई कह सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण को बचाने के लिए थोड़ा कड़ा लेकिन अच्छा फैसला लिया है। अगर झुग्गियों को हटाने का फैसला नहीं लिया जाता तब आगे जाकर बहुत अधिक परेशानी आती। न्याय की समझ पूरी तरह से गलत है। वजह यह कि इसमें झुग्गियों के पक्ष को पूरी तरह से नकारकर छोड़ दिया जा रहा है।

इस तरह झुग्गी-झोपड़ी को वही लोग देखते हैं जिनके पास प्रापर्टी है कहीं पुश्तैनी इलाका है ज़मीन है, घर है या कहीं भी मकान, दुकान, ज़मीन या स्थाई नौकरी है या बस निजी प्रापर्टी से जुड़़ी दृष्टि है। ऐसे लोगों को अक्सर झुग्गी-झोपड़ी एक फालतू, अवांछनीय , बद्सूरत और मिटा दिये जाने लायक चीज लगती है। साफ़ तौर पर इसे वे किसी का आवास या घर नहीं मानते।

हमारे यहां, सफेदपोश लोगो की अनधिकृत कॉलोनी भी हैं, फार्महाउस, बंगले और छोटी- मोटी रियासतें हैं लेकिन उन्हें फालतू नहीं माना जाता। कितना स्वाभाविक है रेलवे किसी अरबपति को बेचने से पहले लाखों लोगो के घर उजाड़ कर ज़मीन ख़ाली करवाना।

न्यायालय और सरकार, पुलिस और प्रशासन, मीडिया, अपराधी, माफिया और सामाजिक नेता, पंच और सरपंच सब मिलकर मेहनत करने वालों के घर अरबपतियों के लिए उजाड़ दें। ज़मीन ख़ाली करा लें। आओ मेहनकश को बेदख़ल करें शहर से, शिक्षण संस्था, अस्पताल, बाज़ार, न्यायालय, खेत, नदी, पहाड़, पृथ्वी से उसे बेदखल करें। उसे भुखमरा अशुभ बताएं।

इन सब के बाद जस्टिस अरुण मिश्रा का फैसला पढ़िए और सोचिए कि क्या न्याय हुआ है? क्या अगर दूसरा पक्ष गरीब लोगों की बजाए अमीर और रसूखदार लोगों का होता तो क्या जस्टिस अरुण मिश्रा यही कहते कि झुग्गियों को वहां से हटाने में राजनीतिक या किसी भी दूसरे तरह की दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए।

मध्य प्रदेश उपचुनाव से पहले शिवराज को बड़ा झटका, बीजेपी नेता सिकरवार कांग्रेस में शामिल

Ground Report के साथ फेसबुकट्विटर और वॉट्सएप के माध्यम से जुड़ सकते हैं और अपनी राय हमें Greport2018@Gmail.Com पर मेल कर सकते हैं।