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सूफ़ी संत सरमद शहीद ने क्यों कहा था कि ‘ईश्वर नहीं है’?

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किसी ने सही कहा है कि दुनिया देखनी है तो किताबें खोलो। हाल ही में अरुंधती रॉय की ‘मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ पढ़ रहा था। पुरानी दिल्ली के आसपास रचा बसा यह उपन्यास इस शहर की बखूबी सैर कराता है।

यह उपन्यास एक ट्रांस पर्सन आफ़ताब के बारे में है। यह बात सिर्फ़ आफताब की मां जहाँनारा बेग़म को पता होती है कि उन्होंने जिस बच्चे को जन्म दिया है वह न लड़का है न लड़की। आफ़ताब की सच्चाई को जहाँनारा 14 वर्ष तक दुनिया से छिपा कर रखती है और इस वहम में जीती है कि बड़े होने पर शायद आफ़ताब ठीक हो जाए। वो आफ़ताब को जामा मस्ज़िद के ठीक सामने स्थित सैय्यद सरमद शहीद की दरगाह पर लेकर जाती है। वो इससे पहले इस जगह के बारे में नहीं जानती थी, न ही वो सरमद के इतिहास से वाकिफ़ थी। वो अनायास ही सरमद के दर पर पहुंच जाती है जैसे खुद सरमद ने उन्हें आवाज़ दी हो। वो वहां पहुंचकर आफ़ताब के लिए दुआ मांगती है।

किताब में सरमद शहीद का इतिहास पढ़ा तो उनके बारे में जानने की इक्षा पैदा हुई।

और हम पहुंच गए सरमद की दरगाह पर

दिल्ली में लॉकडाउन के बाद व्यापारियों की स्थिति जानने के मकसद से मैं अपने साथी के साथ चांदनी चौक आया हुआ था, यहां पहुंच कर सरमद की दरगाह पर जाने का ख़्याल आया। जामा मस्जिद के ठीक सामने है, हरे और लाल रंग से रंगी यह दरगाह। मैं इससे पहले कई बार इस जगह से गुज़रा लेकिन कभी इस दरगाह पर ध्यान नहीं गया, न ही कभी किसी ने इसके बारे में ज़िक्र किया। मीना बाज़ार की भीड़भाड़ के बीच यह जगह कहीं छिपी रहती है, यहाँ वही आता है जो इसके बारे में जानता है। असल में किताबे हमारे लिये नए रास्तों के ताले खोलती है।

इस दरगाह में दो मज़ार है। पहली है हरे भरे शाह की और दूसरी सरमद शहीद की। जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, हरे भरे शाह की मज़ार हरे रंग से रंगी गई है। वहीं सरमद शहीद की मज़ार पर लाल रंग छाया हुआ है। दोनों मज़ार पर चादर भी अलग अलग रंग की चढ़ाई जाती है। इसे गुरु शिष्य की मज़ार भी कहा जाता है। हरे भरे शाह सरमद के गुरु थे।

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दरगाह के मुतावल्ली सैयद नबी अहमद से हमने यहां के इतिहास के बारे में बात की। उन्होंने तफ्सील से हमें इस दरगाह के महत्व के बारे में बताया।

उनकी कहानी सुनने और मौजूदा जानकारियों को पढ़कर जो सूफ़ी संत सरमद का इतिहास सामने आता है वो कुछ यूं है:-

कौन थे सरमद शहीद?

सरमद अर्मेनिया के रहने वाले थे। वो एक यहूदी थे। सिंध के द्वीप के माध्यम से वो भारत में व्यापार करने आए थे। यहां वे एक हिन्दू लड़के अभय चंद से प्यार करने लगे थे। वो अभय के साथ रहना चाहते थे लेकिन उन्हें अलग कर दिया गया। वे एक दूसरे से अलग होकर टूट गए थे। पहले सरमद अभय के घर गए थे वहां अभय के पिता के सामने उन्होंने अपने सारे कपड़े उतार दिए और कहा कि वह दुनिया की परवाह नहीं करते। उनके प्रेमी के अलावा उनके जीवन में और किसी चीज का कोई महत्व नहीं। अभय के पिता इस बात पर गुस्से में आ गए। बाद में अभय और सरमद घूम-घूम कर गाने लगे। सरमद परमानंद की स्थिति में रहते थे। उन्होंने अपनी सारी धन संपत्ति और दुनियावी चीजें पूरी तरह त्याग दी थीं। उनके पास सिर्फ उनके कपड़े बचे थे। उसे भी सरमद ने उतार फेंका था। सामाजिक बंधनों से वो पूरी तरह मुक्त हो चुके थे। यही वजह है उन्हें नंगा फ़क़ीर भी कहा जाता है। सरमद और अभय दोनों ने सिंध से दक्खिन तक की यात्रा साथ-साथ की फिर वे दिल्ली की तरफ भी बढ़ चले। सरमद रुबाईयां लिखा करते और अभय उन्हें गाया करते। अभय और सरमद के बीच समलैंगिक संबंध थे। यह जानकर आश्चर्य होता है कि उस काल में समलैंगिक संबंधों की वजह से समाज बहिष्कृत नहीं करता था। अपनी इस यात्रा के बाद अंत में वे दिल्ली पहुंचे। यहां वो हर भरे शाह के शिष्य बन गए।

सरमद पर पड़ी औरंगज़ेब की नज़र

सरमद जामा मस्जिद के आसपास नग्न घूमा करते थे। एक बार औरंगजेब जामा मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए आए तो उन्होंने संतों को बिना कपड़े पहने हुए देखा। इसके बाद उन्होंने कहा कि वह पास में रखे कंबल को क्यों नहीं ओढ़ते है। इस पर दोनों संतों ने कहा कि वह उनके पाप छिपाकर बैठे हैं।

इस पर औरंगजेब भड़क गया और उसने कंबल हटाकर देखा तो उसे उन लोगों के कटे हुए सर दिखे जो उसने काटे थे।

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सरमद को औरंगज़ेब के दरबार में बुलाया गया। उसे अपने धर्म के प्रति वफादारी साबित करने को कहा गया। इसके लिए कलमा पढ़ने का हुक्म दिया गया। ‘ला इलाही इलल्लाह, मुहम्मद उर रसूलल्लाह’ मतलब अल्लाह के अलावा कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। और मोहम्मद उस ईश्वर के दूत हैं। लेकिन सरमद ने पूरा कलमा नहीं पढ़ा और सिर्फ इतना कहा- ‘ला इलाह’ मतलब ‘ईश्वर नहीं है’। काज़ी ने लोगों को चीख-चीख कर ये बात बताई – ‘देखो, तुम्हारा ये फकीर क्या कहता है। ये ईश्वर को नहीं मानता। सरमद को सड़कों-गलियों में घसीटते हुए ले जाया गया और उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया गया।

आज जितने भी लोग सरमद को पूजने उनकी दरगाह पर आते हैं, शायद ही वो सरमद के संदेश को ठीक तरह समझते होंगे। वो उसके चमत्कार को पूजते हैं। सरमद की कहानी ये साफ बताती है कि वो प्रेम को ही ईश्वर मानते थे। अपने प्रेम अभय को न पाने की वजह ने ही उन्हें सभी सांसारिक मोह माया से दूर कर दिया था।

दिल्ली में वैसे तो 22 सूफी संतों की दरगाह है। निज़ामुद्दीन की दरगाह पर कई लोग पहुंचते हैं। सरमद की दरगाह पर इतनी भीड़ नहीं होती। यहां सभी धर्म के लोग मन्नत मांगने आते हैं। आज के दौर में जब प्रेम को तमाम बंधनों में बांधा जा रहा है ऐसे में सरमद की कहानी बहुत ही प्रासंगिक है।

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