ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान जिससे पाकिस्तानी सेना खौफ खाती थी

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ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान जंग के मैदान में शहीद होने वाले बड़ी रैंक के पहले अफसर थे। बहादुरी ऐसी कि पाकिस्तानी सेना खौफ खाती थी। इंडियन आर्मी के इस अफसर को नौशेरा का शेर भी कहा जाता है। वतन परस्ती की ऐसी मिसाल पेश की कि बंटवारे के दौरान पाकिस्तानी सेना का चीफ बनने का मोहम्मद अली जिन्ना का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान पहले ऐसे अफसर थे जिनके डर से दुश्मन (पाकिस्तान) ने उन पर 50 हजार रुपये का इनाम रखा था।

15 जुलाई, 1912 को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जनपद के एक छोटे से गांव बीबीपुर में रहने वाले पुलिस अफसर मोहम्मद फारुख़ के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। जैसी ही पिता फारुख को ये ख़बर मिली की उनके घर बेटा पैदा हुआ है, उन्होंने कहा कि अब मैं इसको पढ़ा लिखा कर एक बड़ा अफसर बनाकर रहूंगा ।

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ब्रिगेडियर उस्मान के पिता चाहते थे कि उनका बेटा सिविल सर्विस में जाए। लेकिन उन्होंने सेना को चुना। 1920 से भारतीयों को सेना में कमीशन अफसर के तौर पर नियुक्त किया जाने लगा। लेकिन उस वक्त मुकाबला बहुत कड़ा था। उस पद पर बड़े घराने के लोगों को ही तरजीह दी जाती थी। चूंकि ब्रिगेडियर उस्मान तरजीह प्राप्त वर्ग से नहीं थे इसलिए उन्होंने सैंडहर्स्ट के लिए आवेदन किया और चुने गए। जुलाई 1932 में वह इंग्लैंड गए। वास्तव में सैंडहर्स्ट में भारतीयों के लिए यह अंतिम कोर्स था क्योंकि उसके बाद से भारतीय अधिकारियों को उसी साल देहरादून में खुली इंडियन मिलिट्री अकादमी में प्रशिक्षण दिया जाने लगा। दस अन्य भारतीयों के साथ ब्रिगेडियर उस्मान 1 फरवरी, 1934 को सैंडहर्स्ट से पास हुए।

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बलूच रेजिमेंट में मिली पहली तैनाती

इंग्लैंड की रॉयल मिलिट्री अकेडमी में प्रशिक्षण लेने के बाद साल 1935 में उस्मान को बलूच रेजिमेंट में सैन्य अफसर के तौर पर पहली तैनाती मिलती है। वर्ल्ड वॉर के दौरान मोहम्मद उस्मान को अफगानिस्तान और बर्मा में भी तैनात किया गया। शायद, उस्मान अपने जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हो रहे थे। जो उन्हें बंटवारे के बाद पाकिस्तानी फौज से लड़नी थी।

बंटवारे से पहले साल 1945 से लेकर साल 1946 तक मोहम्म्द उस्मान 10 बलूच रेजिमेंट की 14वीं बटालियन का नेतृत्व करते हैं। इस दौरान वह मेजर पद पर तैनात रहे। साल 1947 में भारत-पाक बंटवारा हो जाता है। जिसके बाद दोनों देशों से हज़ारों लोगों का कूच एक जगह से दूसरी जगह होता है।

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जिन्ना के प्रस्ताव को ठुकराया

भारत-पाक बंटवारे के बाद हर चीज़ का बंटवारा हो रहा था। ज़मीन के टुकड़े के साथ ही विभागों और सेना की कुछ रेजिमेंट का बंटवारा किया गया। बलूचिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा बना। इसलिए बलूच रेजिमेंट बंटवारे के बाद पाकिस्तानी सेना का हिस्सा बन गई।

बंटवारे के बाद मोहम्मद उस्मान पर सबसे ज़्यादा प्रेशर आ गया था। यह प्रेशर किसी लड़ाई का नहीं बल्कि एक मुसलमान नाम होने का था। चूंकि उस दौर में सेना में बहुत ही कम मुसलमान थे। जब बंटवारा हुआ तो मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमान होने की तर्ज़ पर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को पाकिस्तान ले जाना चाहते थे।

जिन्ना जानते थे कि उस्मान एक काबिल और दिलेर अफसर हैं, जो पाकिस्तानी सेना के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। बावजूद इसके उस्मान ने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया।

इतना ही नहीं, मोहम्मद अली जिन्ना ने मोहम्मद उस्मान को पाकिस्तानी सेना का चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाने तक का लालच दिया था। हालांकि जिन्ना का ये लालच भी उस्मान को डिगा नहीं पाया।

साल 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद कश्मीर आज़ाद रहना चाहता था। लेकिन बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने बेहद चालाकी से वहां घुसपैठ की और शांत दिख रही कश्मीर घाटी में कोहराम मचा दिया।

पाकिस्तान की मंशा अपनी ताक़त के दम पर कश्मीर में कब्ज़ा करने की थी। उस दौरान कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद की गुहार लगाई। इस मदद के बाद कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया। भारतीय सेना ने कश्मीर को बचाने के लिए अपने सैनिकों को श्रीनगर भेज दिया।

पाकिस्तानी फौज कश्मीर के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा जमाने में सफल रही। कई अन्य अधिकारियों के साथ ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान कश्मीर में अपनी बटालियन का नेतृत्व कर रहे थे। उस्मान के लिए सब कुछ इतना आसान नहीं था। दुश्मन गुफाओं में छुपकर भारतीय सेना पर हमला कर रहा था।

उस्मान ने झंगड़ क्षेत्र को पाकिस्तानियों के कब्ज़े से आज़ाद कराने की कसम खाई थी। जो उन्होंने पूरी भी की। झंगड़ हासिल करने के बाद ब्रिगेडियर उस्मान ने नौशेरा को भी फतह कर लिया था। जिसके बाद उन्हें ‘नौशेरा का शेर’ कहा जाने लगा।

ब्रिगेडियर उस्मान की काबिलियत और कुशल रणनीति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके नेतृत्व में भारतीय सेना को काफी कम नुकसान हुआ। जहां इस युद्ध में पाकिस्तानी सेना के 900 सैनिक मारे गए, तो वहीं भारतीय सेना के सिर्फ 33 सैनिक शहीद हुए थे।

खस्ताहाल पाकिस्तानी सेना ने उस्मान का सिर कलम कर लाने वाले को 50 हजार रुपये का इनाम देने का ऐलान किया था। 3 जुलाई ,1948 की शाम उस्मान जैसे ही अपने टेंट से बाहर निकले, पाक सेना ने उनपर 25 पाउंड का गोला दाग दिया जिससे उनकी शहादत हुई। मरने के पहले उनके अंतिम शब्द थे – ‘हम तो जा रहे हैं, पर जमीन के एक भी टुकड़े पर दुश्मन का कब्जा न हो पाए।’

शहादत के बाद राजकीय सम्मान के साथ उन्हें जामिया मिलिया इसलामिया क़ब्रगाह, नयी दिल्ली में दफनाया गया। उनकी अंतिम यात्रा में तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, केंद्रीय मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और शेख अब्दुल्ला शामिल थे। किसी फौजी के लिए आज़ाद भारत का यह सबसे बड़ा सम्मान था। यह सम्मान उनके बाद किसी भारतीय फौजी को नहीं मिला। मरणोपरांत उन्हें ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

अपने फौजी जीवन में बेहद कड़क माने जाने वाले उस्मान अपने व्यक्तिगत जीवन में बेहद मानवीय और उदार थे। उन्होंने शादी नहीं की और अपने वेतन का अधिकाँश हिस्सा गरीब बच्चों की पढ़ाई और जरूरतमंदों पर खर्च करते थे। वे नौशेरा में अनाथ पाए गए 158 बच्चों की देखभाल करते और उनको पढ़ाते-लिखाते थे।

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