एक कहानी जिसका नायक ऑटो ड्राइवर है

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ग्राउंड रिपोर्ट । मुम्बई

मुंबई से लगे विरार रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक ऑटो तेजी से दौड़ता आ रहा था। विरार वसई में जोरदार बारिश। जगह-जगह जलजमाव। सड़के जाम। गाड़ियां अपने समय से विलंब चल रही थी। नालासोपारा की रहने वाली मौमिता कीर्तिका हलदर प्रसव पीड़ा से छटपटा रही थी। चर्चगेट जाने वाली लोकल ट्रेन के एक डिब्बे में बैठी मौमिता पीड़ा से कराह रही थी। उसकी हालत गंभीर इसलिए भी थी कि उसके पेट में पल रहा शिशु सिर्फ 7 महीने का था और प्रीमेच्योर डिलीवरी की संभावना थी। उसकी हालत इतनी गंभीर थी कि वह वहां से ढोल नहीं सकती थी अस्पताल जाना तो बहुत दूर की बात। को ऐसे मौके पर फरिश्ता बनकर पहुंचे रामचंद्र सावंत और सागर गावड। बिना किसी नियम कानून की परवाह किए पुलिस अफसर सावंत , auto driver सागर के साथ ऑटो लेकर सीधे प्लेटफार्म में पहुंच गए। मौमिता को उस में बिठाया और पास के संजीवनी अस्पताल में उसे भर्ती करा दिया। अगले 10 मिनट के भीतर मौमिता ने एक शिशु को जन्म दिया। प्रीमेच्योर डिलीवरी होने की वजह से नवजात शिशु को आईसीयू में रखना पड़ा।

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दरअसल पहले भी मौमिता को संजीवनी अस्पताल ही ले जाया गया था लेकिन प्रीमेच्योर डिलीवरी का और ज्यादा खर्चे की बात सुनकर मौमिता की परिवार ने तय किया कि ममता को मुंबई के किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जाए। हालांकि मौमिता की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह मुंबई के किसी अस्पताल तक पहुंचे गरीबी की मार देखिए परिवार में यही डिसीजन लिया कि उसकी मुंबई के सरकारी अस्पताल में की जाए। तेज बारिश, अस्तव्यस्त यातायात और गड्ढों से भरे रास्ते ऊपर से किराया। यह संभव नहीं था कि मौमिता किसी अस्पताल में सकुशल पहुंच जाती । आधा निर्णय लिया गया किम अमिता को ट्रेन के जरिए मुंबई के अस्पताल में पहुंचाया जाए। संजीवनी अस्पताल से उसे सुबह 8:00 बजे डिस्चार्ज कर दिया गया जैसे-तैसे वह विरार रेलवे स्टेशन पर पहुंची और गाड़ी में बैठी। लेकिन यहां आते आते काफी देर हो चुकी थी। प्रीमेच्योर डिलीवरी का दर्द और उसकी बिगड़ती हालत।
परिजनों के हाथ-पैर फूल गए। इस बात की खबर रामचंद्र सामंत को लगी। वह सीधे संजीवनी अस्पताल गए और वहां पर डॉक्टरों से रिक्वेस्ट की कि मौमिता की हालत गंभीर है और वह उसे यहां पर ला रहे हैं अतः पूरी तैयारी रखें। खगघचचछत सावंत ऑटो ड्राइवर सागर के साथ सीधे प्लेटफार्म पर पहुंचे और मौमिता ऐन नाजुक हालात में संजीवनी अस्पताल पहुंच गई।

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इस नेक नियत काम के लिए कानून ने अपना फैसला सुनाया। सागर को रेलवे पुलिस ने 154 और 159 के अंतर्गत सोमवार के दिन कोर्ट में पेश किया। माननीय कोर्ट ने सागर के जज़्बात ए इंसानियत भरे ‘गुनाहों’ के मद्देनजर उसे चेतावनी देते हुए उसके गुनाहों को माफ कर दिया।

लब्बो लुआब ए दास्तां: कौन कहता है इंसानियत मर गई है कौन कहता है जज्बात नहीं रहे मुंबई जैसे शहर में जहां पर लोग घड़ी के कांटो के इशारे पर अपनी जिंदगी जीते हैं। इंसानियत जिंदाबाद!