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‘उच्च वर्ग के लोगों के साथ बैठने की इच्छा रखने वाले ‘शूद्र’ की कमर को दाग़ देना चाहिए’

मनुस्मृति एक ग्रंथ के रूप में दलितों और महिलाओं के लिए एक अमानवीय दर्शन का वाहक है. मनुस्मृति में शूद्रों को ऐसा प्राणी माना गया है जिन्हें किसी भी प्रकार के मानव अधिकारों की ज़रूरत नहीं है.

हिन्दूवादी संगठन मनुस्मृति को भारतीय संविधान के स्थान पर लागू करना चाहते हैं. मनुस्मृति इनके लिए कितना पवित्र है,यह हिंदुत्व के दार्शनिक तथा पथ प्रदर्शक वी.डी.सावरकर और आरएसएस के कथनों से अच्छी तरह से स्पष्ट हो जाता है.

सावरकर के अनुसार: मनुस्मृति ऐसा धर्मग्रंथ है जो हमारे हिन्दू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सर्वाधिक पूजनीय है और प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति रीति-रिवाज, विचार तथा आचरण का आधार है. सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक एवं दैनिक अभियान को रास्ता दिखाया है. आज भी करोड़ों हिन्दू अपने जीवन तथा आचरण में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर ही आधारित हैं. आज मनुस्मृति हिन्दू विधि है.

जब भारत की संविधान सभा ने नवंबर 26, 1949 के दिन भारत के संविधान को स्वीकार किया तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने मनुस्मृति को भारत का संविधान घोषित नहीं किये जाने पर ज़ोरदार आपत्ति व्यक्त की. चार दिन बाद 30 नवंबर, 1949 अपने अंग्रेज़ी मुखपत्र में एक संपादकीय में इसने शिकायत की:

हमारे संविधान में प्राचीन भारत में लाजवाब संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है. मनु की विधि स्पार्टा के लाईकरगुस या ईरान के सोलोन के बहुत पहले लिखी गयी थी. आज तक इस विधि की जो मनुस्मृति में उल्लेखित है, विश्वभर में सराहना की जाती है और ये धार्मिक नियम तथा समानरूपता पैदा करती है. लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं ही.

26 जनवरी 1950 के दिन भारत को एक गणराज्य घोषित किया गया और संविधान को पूर्ण रूप से लागू किया गया. इस अवसर पर उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त शंकर सुब्बा अय्यर ने, जो आरएसएस के एक विचारक थे, आरएसएस मुखपत्र में, ‘मनु हमारे हृदय को शासित करते है, के शीर्षक के साथ एक लेख लिखा:

हालांकि भारत रत्न डॉ. अम्बेडकर ने हाल ही में बम्बई में कहा कि मनु के दिन लद गए हैं, पर फ़िर भी यह एक तथ्य है कि आज भी हिंदुओं का दैनिक जीवन मनुस्मृति से प्रभावित है. यहां तक कि जो रूढ़िवादी हिन्दू नहीं हैं, वे भी कुछ मामलों में मनुस्मृति के कुछ नियमों से अपने आप को बंधा हुआ महसूस करते हैं और वे उनमें अपनी निष्ठा का पूरी तरह परित्याग करने में लाचार महसूस करते हैं.

यहां यह जानना ज़रूरी है कि 20 मार्च , 1927 के दिन डॉ. अम्बेडकर की मौजूदगी में महाद, महाराष्ट्र के स्थान पर मनुस्मृति को एक अमानवीय ग्रंथ मानकर विचार मनुस्मृति में दिए गए हैं..

शूद्रों के संबंध में मनुस्मृति के कुछ क़ानून

अनादि ब्रह्मा ने लोक कल्याण एवं समृद्धि के लिए अपने मुख, बांह, जांघ, तथा चरणों से क्रमश: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों को उत्पन्न किया (1/31)

भगवान ने शूद्र वर्ण के लोगों के लिए एक ही कर्तव्य-क्रम निर्धारित किया है- तीनों अन्य वर्णों की निर्विकार भाव से सेवा करना (1/91)

शूद्र यदि – ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को गाली देता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिए, क्योंकि नीच जाती का होने से वह इसी सज़ा का हक़दार है. (8/271)

शूद्र द्वारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुंह एवं कान में गरम तेल डाल देना चाहिए. (8/278)

उच्च वर्ग के लोगों के साथ बैठने की इच्छा रखने वाले शूद्र की कमर को दाग़ करके उसे वहां से निकाल भगाना चाहिए अथवा उसके नितम्ब को इस तरह से कटवा देना चाहिए जिससे वह न मरे और न जिये. (8/280)

एक शूद्र को यदि उसके मालिक द्वारा मुक्त भी कर दिया गया हो तो भी वह सेवा करने के फर्ज़ से मुक्त नहीं हो सकता, चूंकि उनके लिए यह प्राकृतिक है, इससे उन्हें कौन मुक्त कर सकता है? (8/414)

एक तरफ़ तो शूद्रों के लिए इतने सख़्त और अमानवीय दंड हैं और दूसरी तरफ़ ब्राह्मणों के लिए मनु के प्यार की कोई सीमा नहीं है.

अध्याय 8 के श्लोक 380 के अनुसार:

राजा को कभी भी एक ब्राह्मण को मृत्यु दण्ड नहीं देना चाहिए, चाहे वह सभी अपराध ही क्यों न कर दे. उसे राज्य से निष्कासित कर देना चाहिए लेकिन उसकी सारी संपत्ति छोड़ देनी चाहिए और उसके शरीर को कोई चोट नहीं पहुंचना चाहिए

महिलाओं के संबंध में मनु में लिखे कुछ क़ानून

पुरषों को अपनी स्त्रियों को सदैव रात-दिन अपने वश में रखना चाहिए (9/2)

एक स्त्री कभी भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है (9/3)

ये स्त्रियां न तो पुरुष के रूप का और न ही उसकी आयु का विचार करती हैं. इन्हें तो केवल पुरुष के पुरुष होने से प्रयोजन है.यही कारण है कि पुरुष को पाते ही उससे भोग के लिय प्रस्तुत हो जाती हैं चाहे वे कुरूप हों या सुंदर. (9/14)

स्वभाव से ही पुरषों पर रीझने वाली चंचल वित्त वाली और स्नेह रहित होने से स्त्रियां पतियों को धोखा दे सकती हैं.

यह शर्मनाक सिलसिला यहीं समाप्त नहीं होता है.

आरएसएस की किताबों की दुकानों पर गीता प्रेस, गोरखपुर के द्वारा छापी गई एक किताब जिसका नाम ‘गृहस्थ में कैसे रहें’ खुले आम बेची जाती है. इस किताब के लेखक हिंदुत्ववादी राजनीति के एक चिंतक स्वामी रामसुखदास हैं.स्वामी ने इस किताब में प्रश्न-उत्तर के माध्यम से हिन्दू परिवारों को जिस तरह का जीवन जीना चाहिए उस बारे में दिशा-निर्देश दिए हैं. ये दिशा निर्देश कितने शर्मनाक हैं और महिलाओं को किस तरह अपमानित करते हैं, हर तरह के मानवीय अधिकारों की धज्जियां उड़ाते हैं, उसको समझने के लिय कुछ सवाल-जवाब यहां लिख रहा हूँ.

प्रश्न: पति मार-पीट करे, दुख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिए?

उत्तर: पत्नी को यही समझना चाहिए कि मेरे पूर्व जन्म का कोई बदला है, ऋण है जो इस रूप में चुकाया जा रहा है, अतः मेरे पास ही कट रहे हैं और शुद्ध हो रही हूँ. पीहर वालों को पता लगाने पर वे उसको अपने घर ले जा सकते हैं. क्योंकि उन्होंने मार-पीट के लिए अपनी कन्या थोड़े ही दी थी.

ये पुस्तक इसी तरह के सैकड़ों दिशा निर्देश हिन्दू परिवारों को देती है, सती-प्रथा का समर्थन करती है और महिलाओं को घरों में ही रहने की वकालत करती है.

अगर आरएसएस के दर्शन के अनुसार हमारा देश हिन्दू राष्ट्र बन जाता है तो यहां केवल अल्पसंख्यकों का ही सफ़ाया नहीं होगा, बल्कि दलित और हिन्दू औरतें भी तमाम राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों से हाथ धो बैठेंगे.

इस संबंध में एक चौकाने वाली सच्चाई यह भी है कि हमारे पड़ोसी देशों, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ऐसे कट्टरवादी धार्मिक संगठन और व्यक्ति हैं जो औरतों के बारे में बिल्कुल इसी तरह की सोच रखते हैं और जो सोच का खुल कर विरोध करते हैं उनकी हत्या कर देते हैं.

एक हिन्दूवादी संगठन के द्वारा हालही में गांधी जी के पुतले को गोली मारना इसका साफ उदहारण है.

नेहाल रिज़वी

ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख फरोस मीडिया की किताब से आधारित है.

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