श्यामा प्रसाद मुखर्जी

श्यामा प्रसाद मुखर्जी : जिन्होंने मुस्लिम लीग और ब्रिटिश शासकों का साथ दिया

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बंगाल में इस भारत छोड़ो आंदोलन से कैसे निबटा जाए? प्रांत का प्रशासन इस तरह से चलाया जाना चाहिए कि कांग्रेस द्वारा हर संभव कोशिश करने के बाद भी, यह आंदोलन प्रांत में जड़ पकड़ने में असफल रहे। हम लोगों, विशेषकर ज़िम्मेदार मंत्रियों को चाहिए कि जनता को यह समझाएं कि कांग्रेस ने जिस स्वतंत्रता को हासिल करने के लिय यह आंदोलन शुरू किया है, वह स्वतंत्रता जनप्रतिनिधियों को पहले ही हासिल है।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मंत्री, बंगाल सरकार, 26 जुलाई, 1942

हिंदुत्व ब्रिगेड मुखर्जी को एक ऐसा महान राष्ट्रवादी और देशभक्त बताता है, जिसने देश की एकता और अखंडता की रक्षा की ख़ातिर अपनी जान क़ुर्बान कर दी। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें एक महान राजनेता, चिंतक और देशभक्त बताया ,जिसने राष्ट्रीय एकता को मज़बूत करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया । डॉ मुखर्जी की देशभक्ति के संबंध में जो कुछ कहा जाता है,उसकी पुष्टि तत्कालीन दस्तावेज़ों से की जा सकती है। चाहे वे दस्तावेज़ आरएसएस और हिंदू महासभा के अभिलेखागारों से ही क्यों न लिए गए हों।

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इन दस्तावेज़ों के अध्ययन से श्यामा प्रसाद के एक ‘निस्वार्थ और जन्म से ही महान देशभक्त’ होने के दावों पर संदेह होता है। मुखर्जी ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध स्वाधीनता आंदोलन में कभी भाग नहीं लिया। अगर देशभक्ति का अर्थ स्वाधीनता संग्राम में भाग लेना और इस संघर्ष के लिए कुर्बानी करना है तो, मुखर्जी की इसमें भागीदारी क्यों नहीं दिखाई देती।

मुखर्जी ने न केवल स्वाधीनता संग्राम से दूरी बनाए रखी और उन्होंने ब्रिटिश शासकों और मुस्लिम लीग के साथ मिलकर ब्रिटिश विरोधी स्वाधीनता आंदोलन को कुचलने और साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने की हर संभव कोशिश की। उन्होंने क्यों संग्राम का साथ कभी नहीं दिया, यह बड़ा सवाल है।

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वे स्वतंत्रता से पहले हिंदू महासभा के प्रमुख नेताओं में से एक थे। हिंदू महासभा का नेतृत्व डी.वी सावरकर कर रहे थे। जब 1942 में कांग्रेस ने ब्रिटिश शासकों से तुरंत भारत छोड़ने आह्वान किया और भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, तब अंग्रेज़ सरकार ने इस जन-आंदोलन के विरुद्ध दमन चक्र शुरू कर दिया। कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कांग्रेस की प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया। पूरे देश को एक विशाल जेल में बदल दिया गया। ब्रिटिश शासकों और देशी राजाओं की सेनाओं द्वारा चलाए गए दमन चक्र में हज़ारों लोग मारे गए। कई लोगों को सिर्फ इसलिए अपनी जान जंवानी पड़ी क्योंकि वे अपने हाथों में तिरंगा झंडा थामे हुए थे।

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हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों-हिंदू महासभा व आरएसएस और मुस्लिम राष्ट्रवादी संगठन मुस्लिम लीग ने न केवल भारत छोड़ो आंदोलन का बहिष्कार किया और इस आंदोलन का दमन करने में ब्रिटिश सरकार का साथ भी दिया। इसकी पुष्टी कई दस्तावेज़ों से की जा सकती है।

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1941 में मुसलिम लीग की अगुआई में बनने वाली संयुक्त सरकार में शामिल हो गए थे। यह सरकार हिन्दू महासभा और मुसलिम लीग की साझा सरकार थी, इसमें कांग्रेस नहीं थी। मुसलिम लीग के नेता ए.के. फ़जलुल हक़ इस सरकार के प्रीमियर यानी प्रधानमंत्री थे और श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके वित्त मंत्री बनाए गए थे। उन दिनों राज्यों के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री ही कहा जाता था। मुखर्जी इस सरकार में अगले 11 महीने तक वित्त मंत्री बने रहे।इसके पहले 1940 में मुसलिम लीग के लाहौर सम्मेलन में अलग पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव पारित किया जा चुका था। महत्वपूर्ण यह है कि भारत के दो टुकड़े कर मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव फ़जलुल हक़ ने ही रखा था।

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दो राष्ट्र सिद्धांत का प्रस्ताव श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सरकार में शामिल होने के पहले ही पारित किया जा चुका था। ऐसे में सावाल उठता है कि मुखर्जी मुस्लिम लीग की अगुवाई में बनी सरकार में शामिल क्यों हुए।

हिंदू महासभा के अध्यक्ष वीर सावरकर ने हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की इस गिरोहबंदी की चर्चा सन 1942 में कानपुर में आयोजित हिंदू महासभा के 24वें अधिवेशन में दिए गए अपने भाषण में की। हिंदू महासभा द्वारा अपने कार्यकर्तायों को अंग्रेज़ो के साथ सहयोग करने का निर्देश देने के बाद, हिन्दुत्ववादियों के प्रतीक पुरुष मुखर्जी ने दिनांक 26 जुलाई, 1942 को लिखे अपने एक पत्र में अपने अंग्रेज़ आक़ाओं को भरोसा दिलाया कि वे उनके साथ हैं।

उन्होंने लिखा-
अब मैं उस स्थिति की चर्चा करूंगा,जो कांग्रेस द्वारा शुरू किए गए व्यापक आंदोलन के कारण प्रांत में बन सकती है। ऐसा कोई भी व्यक्ति,जो युद्ध के दौरान जनभावनाएं भड़काए व जिसके आंतरिक गड़बड़ियां और असुरक्षा का भाव उत्पन्न हो, उसका विरोध करना हर उस सरकार का कर्तव्य है जो तत्समय कार्यरत हो।

बंगाल के गर्वनर को लिखे अपने एक पत्र में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए ठोस सुझाव दिए। उस समय बंगाल का नेतृत्व फ़ज़लुल हक़ कर रहे थे और हिंदू महासभा, सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा थी।

मुखर्जी प्रांत के उपमुख्यमंत्री थे, उन्होंने लिखा-

प्रश्न यह है कि बंगाल में इस भारत छोड़ो आंदोलन से कैसे निबटा जाए? प्रांत का प्रशासन इस तरह से चलाया जाना चाहिए कि कांग्रेस द्वारा हर संभव कोशिश करने के बाद भी, यह आंदोलन प्रांत में जड़ पकड़ने में असफल रहे। हम लोगों, विशेषकर ज़िम्मेदार मंत्रियों को चाहिए कि जनता को यह समझाएं कि कांग्रेस ने जिस स्वतंत्रता को हासिल करने के लिय यह आंदोलन शुरू किया है, वह स्वतंत्रता जनप्रतिनिधियों को पहले ही हासिल है। कुछ मामलों में आपात स्थिति में यह स्वतंत्रता कुछ सीमित हो सकती है। भारत वासियों को अंग्रेज़ों पर भरोसा करना चाहिए-ब्रिटेन की ख़ातिर नहीं और न ही ऐसे किसी लाभ की ख़ातिर जो अग्रेंज़ों को इससे होगा- बल्कि प्रांत की किसी सुरक्षा और स्वतंत्रता बरक़रार रखने के लिए गर्वरन बतौर आप प्रांत के संवैधानिक प्रमुख होंगे और पूरी तरह से अपने मंत्री के परामर्श से काम करेंगे।

किताबों के नाम जिनसे ये जानकारियां लेकर लेख तैयार किया गया है- 1. लीव्ज़ फ्राम ए डायरी 2. सी.पी भिशिकर, संघवृक्ष के बीज : डॉ. केशवराव हेडगेवार

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