बलात्कार को साबित करने के लिए युवती के शरीर में वीर्य के नमूनों का पाया जाना आवश्यक नहीं है ? ये कहता है क़ानून..

बलात्कार को साबित करने के लिए युवती के शरीर में वीर्य के नमूनों का पाया जाना आवश्यक नहीं ? ये कहता है क़ानून..

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उत्तर प्रदेश पुलिस ने दावा किया है कि हाथरस पीड़िता के साथ बलात्कार नहीं हुआ। पुलिस ने कहा है कि फोरेंसिक रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित बच्ची के शरीर पर वीर्य के नमूनों की मौजूदगी नहीं दिखी है। यह स्पष्ट करता है कि कोई बलात्कार या सामूहिक बलात्कार नहीं हुआ था।”

लेकिन भारतीय कानून इसके इतर है। भारतीय दंड सहिंता(CRPC) की धारा 375 के अनुसार बलात्कार के अपराध को साबित करने के लिए युवती के शरीर में वीर्य के नमूनों का पाया जाना आवश्यक नहीं है। इस धारा के अनुसार यदि पुरुष का अंग, स्त्री की योनि से थोड़ा सा भी टच हुआ है तो वह बलात्कार की श्रेणी में आता है, जरूरी नहीं है कि वह स्पर्म युक्त ही हो।

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साल 2010 में वाहिद खान बनाम मध्य प्रदेश नामक केस में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि लिंग का थोड़ा सा प्रवेश भी ​​बलात्कार के अपराध के लिए पर्याप्त है। लिंग के प्रवेश की गहराई का कोई मतलब नहीं है।

साल 1994 के उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बाबूनाथ मामले।में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था

“बलात्कार के अपराध को मानने के लिए ये बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि पुरुष अंग का पूर्ण प्रवेश हो, या स्पर्म का उत्सर्जन हो और हाईमन टूटे ही। पुरुष अंग का आंशिक प्रवेश भी चाहे वह वीर्य उत्सर्जन के साथ हो या उसके बिना, या यहां तक ​​कि पीड़िता के निजी अंग में प्रवेश की कोशिश भी बलात्कार माना जाएगा। जननांगों पर घाव लगने या वीर्य के दाग छोड़े बिना भी बलात्कार का अपराध करना संभव है।”

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सवाल हमारी संवेदनात्मक सोच पर भी है, कोई स्पर्म सहित दुराचार करे या इसके बिना करे, इससे अपराध कहाँ कम हो जाता है? स्पर्म गिराने का प्रयास या स्पर्म गिरा देना, दोनों ही स्त्री अस्मिता पर हमला माना जाएगा। दोनों ही बलात्कार की श्रेणी में आते हैं। सबसे महत्वपूर्ण कि एक बच्ची ने 14 दिन अस्पताल में एक लंबी जंग के बाद दम तोड़ दी है। क्या ये अपराध हमारी संवेदनाएं खोल देने के लिए पर्याप्त नहीं है?

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बहरहाल सुप्रीम कोर्ट और हॉइकोर्ट के ऐसे तमाम जजमेंट हैं जो बताते हैं कि स्पर्म का मिलना, बलात्कार का मामला साबित करने के लिए अनिवार्य नहीं है। साधरण योनि प्रवेश या उसका प्रयास भी बलात्कार माना जाता है। लेकिन मालूम नहीं उत्तरप्रदेश पुलिस के बड़े से बड़े अफसरों को इस अफवाह फैलाने का आदेश कहाँ से मिला है कि वे इस अफवाह को बढ़ा चढ़ाकर प्रसारित करें कि फोरेंसिक रिपोर्ट में स्पर्म नहीं मिला तो बलात्कार नहीं हुआ।

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ये आश्चर्यजनक बात है क्योंकि ये ऐसी जनरल नॉलेज है, जिससे साधारण से साधारण पुलिस अफसर भी परिचित है। लेकिन अखबारों से लेकर पुलिस अफसर तक इस अफवाह को फैलाने का काम कर रहे हैं। ये बताता है सरकार और उसके समर्थकों की पहली प्राथमिकता अपनी इमेज बचाना है, बेटी बचाना नहीं।

ये लेख पत्रकार और सोशल मीडिया के चर्चित लेखक Shyam Meera Singh की fb वॉल से लिया गया।

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