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शाहिद आज़मी : जेल में बंद बेकसूर मुस्लमानों का मुक़दमा लड़ने के चलते मार दी गई थी गोली

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बेगुनाह मुसलमानों के मुकदमे लड़ने वाले अपने किस्‍म के इकलौते युवा वकील शाहिद आज़मी की मौत को आज 10 बरस हो गए। 11 फरवरी, 2010 को कानून और साम्प्रदयिक सद्भाव का खून करने वालों ने शाहिद आज़मी को क़त्ल कर दिया था। शाहिद आतंकवाद के नाम पर फंसाए जा रहे बेकसूर मुस्लिम युवकों के मुकदमे देखते थे । साज़िश की वजह से सैकड़ों मुस्लिम नौजवानों को बीते वर्षों सलाखों के पीछे डाल दिया गया है। शाहिद ने बेकसूर युवकों की कानूनी लड़ाई को अपनी ज़िन्दगी का मकसद बनाया था।

कभी चरमपंथी कैंप का रहे थे हिस्सा

बताया जाता है कि शाहिद कभी कश्मीर स्थित चरमपंथी कैंप का हिस्सा थे। लेकिन फिर वो जल्द ही वहां से लौट आए थे। उनके भाई ख़ालिद साफ़ तौर पर इस बारे में तो कुछ नहीं बताते। ख़ालिद ये ज़रूर कहते हैं कि उनके भाई से ग़ल्ती हुई ज़रूर थी लेकिन जल्द ही वो पूरी तरह से बदल गए थे। शाहिद जब कश्मीर से वापस लौटे तो उन्हें कुछ दिनों बाद जेल में डाल दिया गया था।

26 नवंबर 2008 में मुंबई में हुए हमलों में फ़हीम अंसारी पर भी इस हमले की साज़िश में शामिल होने के आरोप लगे थे। लेकिन शाहिद आज़मी ने फ़हीम का केस लड़ा और कोर्ट ने फ़हीम को आरोपों से मुक्त कर दिया। शाहिद ने इसी तरह से कई और बेगुनाहों को इंसाफ़ दिलाया। इसी वजह से उन्हें धमकियां मिलने लगीं। और 2010 में उनके ऑफ़िस में उनकी हत्या कर दी गई।

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पांच साल की हुई थी जेल

शाहिद आज़मी मूल रूप से आज़मगढ़ के इब्राहीमपुर गांव के रहने वाले थे। उनके पिता अनीस अहमद पत्नी रेहाना अनीस के साथ मुम्बई के देवनार क्षेत्र में रहकर अपनी अजीविका कमाते थे। बचपन में ही पिता अनीस अहमद का देहान्त हो गया। शाहिद आज़मी ने पंद्रह साल की आयु में दसवीं की परीक्षा दी। अभी नतीजे भी नहीं आए थे कि कुछ राजनितिज्ञों को कत्ल करने की साजिश के आरोप में उन्हें टाडा के तहत गिरफतार कर लिया गया।

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जेल में भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और कानून की डिग्री हासिल की। उन्हें पांच साल की सजा भी हुई परन्तु बाद में सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए। जेल से रिहा होने के बाद एक साल का पत्रकारिता का कोर्स करने साथ ही एलएलएम भी किया। कुछ समय एडवोकेट मजीद मेमन के साथ रहने के बाद अपनी प्रेक्टिस करने लगे।

शाहिद आज़मी 11, जूलाई 2006, मुम्बई लोकल ट्रेन धमाका, मालेगांव कबरस्तान विस्फोट और औरंगाबाद असलेहा केस के आरोपियों के वकील थे। यही वह जमाना था जब देश में एक साम्प्रदायिक-फासावादी शक्तियों द्वारा यह सघन अभियान चलाया जा रहा था कि कोई अधिवक्ता आतंकवादियों का मुकदमा नहीं देखेगा। इस समय तक आतंकवादी होने का अर्थ होता था मुसलमान होना। देश के कई भागों में ऐसे अधिवक्ताओं पर हिंसक हमले भी हुए थे।

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शाहिद जेल में कैसे बने वकील ?

जेल में रहकर शाहिद ने आत्मविश्लेषण किया और बाहर आने के बाद वो पूरी तरह से बदल गए। कानून की पढ़ाई पढ़ने और वकील बनने के बाद उनके भाई शाहिद मुस्लिम समुदाय के उन युवा लोगों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने लगे जिन पर चरमपंथी होने के ग़लत आरोप लगे और जिन्हें कथित तौर पर पुलिस ज़्यादतियों का शिकार होना पड़ा।

अपने भाई में आए इस बदलाव के बारे में ख़ालिद कहते हैं, “जेल में रहकर उन्होंने काफ़ी किताबें पढ़ीं। उन्हें कई अच्छे लोगों का साथ मिला। और जेल से बाहर आकर वो पूरी तरह से बदल चुके थे।”

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‘शाहिद’ नाम से बनी थी फिल्म

शाहिद आज़मी को केंद्र में रखकर एक फिल्म बनाई गई थी जिसका नाम है ‘शाहिद’ जिसने टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में सुर्खियां बटोरी थी। फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता हैं और इसके निर्माताओं में अनुराग कश्यप का नाम भी शुमार है जिनकी वर्ष 2007 में आई फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ लगभग दो वर्ष तक रिलीज़ नहीं हो पाई थी क्योंकि इसकी पटकथा में मुंबई में वर्ष 1993 में सिलसिलेवार हुए धमाकों का ज़िक्र था।

शाहिद आजमी नीचे से उठे व्यक्ति थे जो उम्मीद के प्रतीक थे, लेकिन उन लोगों ने शाहिद की हत्या करा दी जिन्हें मुंबई हमलों के अभियुक्त फहीम अंसारी की पैरवी करना पसंद नहीं आया”

हंसल मेहता

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