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पुलिस सुधारों के बिना लोकतंत्र की सुरक्षा असंभव

Security of democracy impossible without police reforms
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Pavan Chaurasia | New Delhi

भारत में कोरोना संकट के खिलाफ लड़ाई में जिस तरह से यूपी, राजस्थान, केरल आदि कुछ राज्यों में अराजक तत्वों द्वारा पुलिस पर हमले किये गए, उसने एक बार फिर पुलिस की चुनौतियों और समस्याओं को हम सबके सामने ला कर खड़ा कर दिया है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत में जनता की नज़र में पुलिस की छवि कोई बहुत अच्छी नहीं है। हममें से अधिकांश लोग पुलिस की मौजूदगी में सुरक्षित महसूस करने के बजाए और अधिक असहज महसूस करने लगते हैं। लोकसभा चुनाव के पहले अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय एवं लोक-नीति द्वारा देश के बारह राज्यों में करवाए गए एक सर्वे के अनुसार देश की जनता के लिए पुलिस सबसे अविश्वसनीय संस्थाओं में से है। उसी सर्वे में जनता ने सेना को सबसे अधिक विश्वसनीय संस्था माना है। लेकिन इसके लिए पुलिस के ऊपर सारा दोष मढ़ देना पुलिस के साथ अन्याय होगा। लोकतंत्र में पुलिस का दायित्व आंतरिक सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, अपराध-नियंत्रण के साथ-साथ नागरिक के आत्मसम्मान की सुरक्षा का भी होता है। भारत में पुलिस के साथ अनेकों समस्याएं हैं जिनपर शायद ही कभी चर्चा होती है।

भारत में पुलिस व्यवस्था
पुलिस को आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारियों, जनता की अपेक्षाओं, नेताओं की मनमानियों, और असामाजिक तत्वों की कारस्तानियों के बीच घंटों काम करना पड़ता है, जिसमे समय की कोइ पाबंदी नहीं होती है। इसके साथ-साथ उनके ऊपर मीडिया और गैर-सरकारी संस्थाओं का भी दबाव होता है जो उनकी जवाबदेही तय करने के लिए कुछ हद तक ठीक भी है। भारतीय पुलिस बल की मौजूदा व्यवस्था भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 के द्वारा निर्देशित होती है। इसके अलावा कुछ और भी कानून हैं जिनसे पुलिस की प्रशासनिक व्यवस्था निर्देशित की जाती है। इन कानूनों में भारतीय दंड संहिता, 1862; भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872; और दंड प्रक्रिया संहिता, 1861 (सीआरपीसी) शामिल हैं। संविधान में पुलिस की जिम्मेदारी राज्यों पर है, लेकिन केंद्र के पास भी अपनी पुलिस होती है। कुछ राज्यों के भी अलग-अलग कानून हैं। केंद्र और राज्यों के बजट का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा ही पुलिस पर खर्च होता है।

चुनौतियों से जूझता पुलिस-तंत्र
पुलिस की समस्याओं को मुख्यतः दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है- संस्थागत और वैधानिक।
संस्थागत चुनौतियों की बात की जाए तो भारत में पुलिस बल की कमी पुलिस विभाग के लिए एक गंभीर चुनौती है। 2019 के डाटा के मुताबिक पुलिस की कुल स्वीकृत 25,95,435 संख्या में केवल 20,67,270 ही वास्तविक बल है। यानी लगभग पाँच लाख पद खाली पड़े हैं। हालांकि 2018 की तुलना में वास्तविक संख्या में 9।52 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन फिर भी यह संतोषजनक और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्रभावशाली कानून व्यवस्था बनाने के लिए प्रति लाख नागरिकों में 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए जबकि भारत जैसे विशाल देश में यह संख्या मात्र 158।22 है।


पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी केवल 8।98 प्रतिशत
जब भी महिलाओं के खिलाफ कोई अपराध होता है तो पुलिस की कार्यप्रणाली के ऊपर सवाल उठाए जाते हैं। लेकिन यह समस्या लैंगिक स्तर पर पुलिस में महिलाओं की भागीदारी की भी है, जिसमें पुलिस का रिकार्ड काफी खराब है। ब्युरो ऑफ पुलिस रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट (बीपीआरडी) की रिपोर्ट के अनुसार देश के पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी केवल 8।98 प्रतिशत ही है। अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए ज़रूरी धन का अभाव, कंप्युटर, वायरलेस डिवाइस, फोरेंसिक एक्सपर्ट एवं टेलीफोन कनेक्शन की कमी ऐसी है जिससे पुलिस को अक्सर ही दो-चार होना पड़ता है। कैग की रिपोर्ट से पता चलता है कि कई राज्यों में पुलिस के पास पर्यात हथियारों और वाहनों की भी भारी कमी है। यहाँ तक कि पुलिस के मूलभूत ढांचे के आधुनिकीकरण के लिए दिए जाने वाली धनराशि को भी आम तौर पर पूरा उपयोग में नहीं लाया जाता है। पुलिस को दी जा रही ट्रेनिंग का स्तर ऐसा कि अधिकांश पुलिसकर्मियों को न तो आवश्यक कानूनों और न ही जनता के अधिकारों की पर्याप्त जानकारी होती है।

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राजनीतिक कारणों के लिए पुलिस बलों का उपयोग
दूसरी समस्या है वैधानिक। देश का कानूनी ढांचा ऐसा है कि कई बार पुलिस को न चाहते हुए भी नेताओं के दबाव में पक्षपात करना पड़ता है। पुलिस की ड्यूटी की प्रकृति को देखते हुए इस बात की संभावना रहती है कि इसको मिली हुई शक्तियों का दुरुपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा, आईपीए की धारा चार के अनुसार, पुलिस न केवल अपने वरिष्ठ अधिकारी के प्रति, बल्कि कार्यपालिका के नियंत्रण में काम करती है। हालांकि दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की थी कि कार्यपालिका द्वारा इस शक्ति का दुरुपयोग किया जाता है, और मंत्रीगण व्यक्तिगत और राजनीतिक कारणों के लिए पुलिस बलों का उपयोग करते हैं। इसलिए विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि राजनीतिक कार्यकारिणी की शक्तियों का दायरा कानून के तहत सीमित किया जाना चाहिए।

पुलिस सुधार: एक अधूरा सा ख्वाब
भारत में पुलिस सुधारों की मांग बहुत पुरानी है और समय-समय पर अनेकों सरकारी एवं विधि आयोग इसको लेकर अपने सुझाव देते रहे हैं। लेकिन आपातकाल के बाद 1977 में देश में पहली बार सरकार ने पुलिस सुधारों की सिफारिश के लिए राष्ट्रीय पुलिस आयोग (एनपीसी) का गठन किया गया था। एनपीसी के बाद पुलिस सुधारों पर कई समितियां बनाई गईं। इनमें रिबेरो समिति (1998), पद्मनाभैया समिति (2000) और मलिमथ समिति (2003) प्रमुख हैं। एनपीसी की सिफारिशों को लागू करने के लिए 1996 में प्रकाश सिंह और एन।के। सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। कोर्ट ने 10 साल बाद 2006 में ऐतिहासिक फैसला सुनते हुए सरकार को सात निर्देश दिए। इनमें केंद्र एवं राज्यों को पुलिस के कामकाज के लिए दिशानिर्देश तय करने, पुलिस के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने, तैनाती और तबादलों का फैसला लेने और पुलिस के दुर्व्यवहार की शिकायतें दर्ज करने के लिए राज्य और जिला स्तर पर पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी (पीसीए) के गठन का आदेश शामिल था। न्यायालय ने यह भी अनिवार्य किया था कि मुख्य पुलिस अधिकारियों को मनमाने तबादलों और नियुक्तियों का शिकार न होना पड़े, इसलिए उनकी सेवा की न्यूनतम अवधि तय की जाए।

किसी भी एक राज्य ने अदालत के निर्देशों का पूरे तरीके से पालन नहीं किया
लेकिन राज्य इसको लेकर कितने गंभीर हैं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार न तो केन्द्रीय स्तर पर और न सभी राज्य या ज़िले स्तर पर पीसीए का गठन किया है। सिर्फ 12 राज्यों में यह राज्य और ज़िले, दोनों स्तर पर है। और वहाँ भी इनके काम करने में अनेकों दिक्कतें आ रही हैं। केवल महाराष्ट्र और त्रिपुरा ही ऐसे राज्य हैं जहां पीसीए को तय समय सीमा (90 दिन) के अंदर पुलिसकर्मी के खिलाफ आई शिकायत की जाँच पूरी करनी पड़ती है। सीएचआरआई के रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि केवल 18 राज्यों ने 2006 के बाद सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुरूप नए पुलिस एक्ट को पारित किया है। इसके अलावा बाकी राज्यों ने सरकारी आदेश/अधिसूचनाएं जारी की हैं लेकिन किसी भी एक राज्य ने अदालत के निर्देशों का पूरे तरीके से पालन नहीं किया है।

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जरूरत नए युग की पुलिस-व्यवस्था की
बदलते समय के साथ पुलिस की चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं। ऐसे में पुराने ढर्रे पर पुलिस को चलाना देश की आंतरिक सुरक्षा और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। देश की सुरक्षा और अपराधियों से लड़ने में कई पुलिसकर्मी भी जान गंवा चुके है, फिर चाहे वो कश्मीर में हो, पंजाब, झारखंड या छत्तीसगढ़ में। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नई दिल्ली में राष्ट्रीय पुलिस स्मारक की स्थापना करना पुलिस बल को प्रोत्साहित करने, एवं उनके बलिदानों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने की दिशा में एक सराहनीय कार्य है, जो बहुत पहले ही किया जाना चाहिए था। लेकिन वक़्त अब इससे भी आगे जा कर कुछ आमूलचूल बदलाव करने का है। इसके लिए राज्यों में पुलिस सुधारों को लागू करना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। संविधान के अनुसार पुलिस और ‘कानून-व्यवस्था’ राज्यों का विषय है इसलिए इसमें राज्यों की ज़िम्मेदारी और अधिक बन जाती है कि वे पुलिस सुधारों को लागू करें ताकि देश में कानून के राज को नए ज़माने की पुलिस, या कहें की ‘स्मार्ट पुलिस’ द्वार जनता के सहयोग और विश्वास के साथ स्थापित किया जा सके।

ताकि न्यायिक हिरासत में हुई मौत, बलात्कार जैसी घटनाओं को रोका जा सके
पुलिस के राजनीतिकरण को रोकने, पुलिस को पर्यात धन, ट्रेनिंग और आधारिक संरचना प्रदान करने एवं भारतीय दंड संहिता, पुलिस ऐक्ट जैसे औपनिवेशिक युग के कानूनों में संशोधन की आवश्यकता है ताकि पुलिस स्वतंत्र भारत के संविधान की मूल भावनाओं, चुनौतियों और सामाजिक वास्तविकताओं को दर्शा सके। पुलिस को मानवाधिकारों, विशेष रूप से महिला अधिकारों के प्रति और संवेदनशील बनाने की जरूरत है ताकि न्यायिक हिरासत में हुई मौत, बलात्कार जैसी घटनाओं को रोका जा सके जो पुलिस की साख पर बट्टा लगाती हैं। नागरिक-केंद्रित पुलिस की स्थापना किये बिना हम अपने लोकतंत्र को मज़बूत और सम्मिलित नहीं बना सकते हैं। जरूरत पुलिस और जनता दोनों के अधिकारों के रक्षा की है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू, नई दिल्ली) से अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पीएचडी कर रहे हैं।)