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सत्ता के लिए सब मंज़ूर

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हफीज़ सईद के पक्ष में अपना वोट बर्बाद ना करके पकिस्तान की जनता ने ये जतला दिया कि भले ही भारत में उसके जैसे जेहादियों के प्रति सहानुभूति रखने वालों की कमी ना हो, पर वे उनके द्वारा शासित होने का जोख़िम नहीं उठा सकते जबकि बिना सत्ता के उन्होंने इस्लाम के नाम पर उनका जीना दूभर कर रखा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि चुनाव में नकार दिए जाने के बाद भी देश को उनके कुकर्मों से राहत नहीं मिल पाई है। गिलगिट-बाल्टिस्तान में हाल में जो हुआ वो इसका एक नमूना है, जबकि इस इलाके में लड़कियों को शिक्षा से दूर रखने के लिए आतंकियो ने उनके लगभग 20 स्कूलों को आग के हवाले कर दिया। और तो और बलोचिस्तान क्षेत्र के डलबादिन में चीनी इंजिनियरों को ले जाने वाली बस पर एक आत्मघाती हमले को भी अंजाम दिया जा चुका है। वैश्विक स्तर पर भी पकिस्तान को विश्व-समुदाय का विश्वास प्राप्त करने के लिए अभी लम्बा सफ़र तय करना होगा। इसका ताजा उदाहरण न्यूजीलैंड के साथ पाकिस्तान में होने वाले क्रिकेट-मैच को लेकर सामने आया है। न्यूजीलैंड क्रिकेट-बोर्ड ने १५ साल बाद पाकिस्तान का दौरा बहाल करने के अनुरोध को सुरक्षा कारणों से ख़ारिज कर दिया है।

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वैसे ये घटनाएँ उन ‘सेक्युलर’बुद्धिजीवीयों की आँखें खोल देने के लिए काफी हैं जो पाकिस्तान पहुंचकर भारत के तथा-कथित गिरते लोकतांत्रिक हालातों पर व्याख्यान झाड़ते रहते हैं। इतना ही नहीं ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ और ‘कश्मीर की आज़ादी’ के नाम पर जिनकी आँखों में पाकिस्तान के सपने तैरते रहते हैं उनके लिए भी देश के प्रतिष्ठित अंग्रजी अखबार की खबर देखने लायक है-‘ हिंसा की धमकी देकर मीडिया को [आंतकियों ने] अपने वश में कर रखा है। पाकिस्तान के अग्रणी समाचार-पत्र ‘डान’ के बारे में लिखते हुए पत्रकार-लेखक अहमद रशीद बीबीसी वेबसाइट पर लिखते हैं: “ डान को अपने पत्रकारों को मिलने वाली धमकियाँ, उनके साथ होने वाले उत्पीढ़न और समाचार-पत्र का वितरण करने वाले हाकरों पर लगने वाले प्रतिबन्ध का सामना करना पड़ रहा है; उसके विज्ञापनदाताओं को चेताया जा रहा कि वे अपने उत्पादों के प्रचार-प्रसार को डान में करने से दूर रहें.’–खालिद अहमद, सलाहकार संपादक,न्यूज़वीक पाकिस्तान [इंडियन एक्सप्रेस जुलाई १४, २०१८]

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और जहां तक सवाल भारत का है यहाँ की सेक्युलर पार्टियां जिस तरह से देश में मौजूद कट्टर मजहबी शक्तियों को खुश करने के लिए कोई मौका नहीं छोड़ रहीं हैं उसको देखकर तो ये लगता है कि पाकिस्तान में हाफिज सईद को भले ही चुनावों में धूल चाटनी पड़ी हो, पर भारत में उसे ये पार्टियां मायूस नहीं होने देंगी। कोई बड़ी बात नहीं कि उनके बीच उसे अपने-अपने पाले में खींचने की होड़ लग जाये।