अंबवा की छांव संतोष जैन संतु

संतोष जैन ‘संतु’ द्वारा रचित ‘अंबवा की छांव’ हर हाल में चलना सिखाती है

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संतोष जैन ‘संतु’ मध्यप्रदेश के सीहोर शहर के जाने-माने कवियों में से एक हैं। सीहोर जिले की आष्टा तहसील में आने वाले रोलागांव में एक किसान घर में उनका जन्म हुआ। नौकरी के लिए उन्हें अपना गांव छोड़ शहर आना पड़ा लेकिन अपनी रचनाओं और कविताओं में उन्होंने अपने गांव और संस्कृति को ज़िंदा रखा। वर्ष 2011 में प्रकाशित हुए उनके काव्य संग्रह ‘अंबवा की छांव’ को पढ़कर यह महसूस किया जा सकता है।

अंबवा की छांव

संतोष जैन संतु अपने काव्य संकलन ‘अंबवा की छांव’ के बारे में बताते हुए कहते हैं कि मेरी रचनाएं मां सरस्वती के चरणों में श्रद्धा सहित चरण वंदना है, जिसने बुद्धी दी, ज्ञान दिया और मेरी लेखनी को शक्ति प्रदान की। सहज, सरल, सरस और स्वाभाविकता मेरी जीवन शैली है। जैसा दिखता हूं वैसा ही हूं, जो घटता है देखता हूं, अनुभव करता हूं वही लिखता हूं।

शहर की भीड़भाड़, भागमभाग से मन घबराया तो लिखा, मुझे अपना गांव, अपना बचपन याद आया तो लिखा, भीड़ में कोई अपना सा दिखा तो लिखा। किसी ने उपेक्षा की, किसी ने गले से लगाया, किसी ने आंसू दिये किसी ने मुस्कान, कभी खुशी कभी गम, कभी धूप कभी छांव रुके नहीं पांव निरंतर चलता रहा। हर हाल में खुश रहकर जिया, लिखा जीता रहूंगा लिखता रहूंगा चलता रहूंगा।

जो लिखा वह लेखन की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है या नहीं मैं नहीं जानता, मैं तो इतना जानता हूं कि मैने जो लिखा वह सच है और सच बोलने में लिखने में संकोच क्यों? भय कैसा?

मैं उस नन्हें बालचित्रकार की भांति हूं जो अभी ठीक से तूलिका भी नहीं पकड़ पाता किंतू कागज़ पर रंग बिखेरने का प्रयास अवश्य करता है। मैं लेखन के क्षेत्र में अभी पहली कक्षा का विद्यार्थी ही हूं।

आड़ी टोढ़ी लकरें, बेतरतीब बिखेरे हुए रंग, अव्यवस्थित शब्द संयोजन, बंतुकी तुकें, काव्य सौंदर्य एवं शिल्प से विरक्त स्वांतः सुखाय लेखन ही मेरा रचना संसार है। अंबवा की छांव में यह सब देखने को मिलता है।


चलना ही ज़िंदगी है, यही जीत हार है

-संतोष जैन ‘संतु’

‘अंबवा की छांव’ से कुछ कविताएं

मातृ वंदना

आन-मान बुद्धि ज्ञान तू ही प्राण है।

माँ तू हमारी लेखनी तू ही कृपाण है।।

हम लड़े जिए मरे स्वदेश के लिएहमारी एक-एक सांस देश के लिए

हम देश के भविष्य भूत वर्तमान हैमाँ तू हमारी लेखनी तू ही कृपाण है ।।1।।

सुपंथ पर बढ़े चलें माँ इच्छा शक्ति देसमर्पण के गीत लिखे श्रद्धा भक्ति दे।।

सुर-ताल छंद मधुर कंठ तेरा गान है।

माँ तू हमारी लेखनी तू ही कृपाण है।

डरते नही माँ भारती के लाल काल सेपुण्य धरा धूल धरे नित्य भाल पे।

रगों में प्रवाहित रुधिर का तू उफान है।

माँ तू हमारी लेखनी तू ही कृपाण है।

कुर्बान जाओ तुम

मेरे वतन के नौजवानो जाग जाओ तुमआग जो लगी है चमन में बुझाओ तुममन्दिर मस्जिद में उलझ कर ना तुम रहो ।इंसानियत ही धर्म है इसके लिए लड़ो ।।

प्रेम एकता के मधुर गीत गाओ तुम। आग जो लगी है चमन में बुझाओ तुम ।।1।।

दे रही आवाज़ तुम्हे माता भारती। धरोहरे बचाओ यह रह-रह पुकारती।। भारत की आन-बान पे कुर्बान जाओ तुम। आग जो लगी है चमन में बुझाओ तुम ।।2।।

आज आ गया है वक्त देश भक्ति का। दुश्मन को तुम करा दो ज्ञान अपनी शक्ति का।। वक्त ना गवाओ रण में कूद जाओ तुम। आग जो लगी है चमन में बुझाओ तुम।।3।।

माँ की तरफ हाथ उठे कोई तो फोड़ डालनाबुरी नज़र उठे कोई तो फोड़ डालना।। दूध ना लजाओगे सौगंध खाओ तुम।आग जो लगी है चमन में बुझाओ तुम ।।4।।

मॉं

तू धरती व्योम समंदर है। दुनिया में सबसे सुंदर है।।

प्यारी-प्यारी भोली सूरत। माँ तू है ममता की मूरत।। प्रभु में तुझमें क्या अंतर है। दुनिया में सबसे सुंदर है।।1।।

तेरे आँचल की छांया में।तेरी ममता की माया में।। कुदरत का जादू मन्तर है। दुनिया में सबसे सुंदर है।।2।।

मीठी-मीठी लोरी गाना ।थपकी दे-दे दुलराना।। माँ का आशीष निरंतर है। दुनिया में सबसे सुन्दर है।।3।।

हौले-हौले चल

दुनिया की भीड़ से तू बच के निकल। नन्हे-नन्हे पाँव तेरे होले-होले चल।।

यह दुनिया स्वारथ का मेला। झूठ की नगरी सत्य अकेला।।धरम भटकता निर्जन वन। नन्हे-नन्हे पाँव तेरे होले-होले चल।।

पाप धरा पर है गहराया। मानव पर दानव का साया। है प्रभु देना बुद्धि-बल। नन्हे-नन्हे पाँव तेरे होले-होले चल।।

शान्ति का पाठ पढ़ाता भारत। विश्व गुरु कहलाता भारत।।ज्ञान की गंग रहे अविरल। नन्हे-नन्हे पाँव तेरे होले-होले चल।।

गौरव गान हिमालय गाता। मन्त्र मुग्ध सुर-पुर ललचाता ।।चन्दन माटी अमृत जल।नन्हे-नन्हे पाँव तेरे होले-होले चल ।।

जीवन झूठ झमेले में

जीवन झूठ झमेले में।खो मत जाना मेले में।।

कौन है तू क्या काम है तेरा। सोचना बन्धु अकेले में ।।1।।

क्या लाया है क्या दे जाएगा। क्यों उलझा है धेले में।।2।।

कोड़ी-कोड़ी माया जोड़ी। रह जाएगी थेले में।।3।।

सुन्दर काया पर इतराया। बह जाएगी रेले में।।4।।

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लंबी है डगरिया

लंबी है डगरिया चल-चल-चल। बीते रे उमरिया पल-पल-पल।।

कल आने वाला सूरज देखा नही देखा।कौन जाने भाग्य विधी का लेखा।। सत्कर्मो से होगा धर्म प्रबल। बीते रे उमरिया पल-पल-पल।।1।।

भोग विलास व्यसन दल-दल। छोड़ झूट पाप कपट छल-छल।। दुनिया के माया जाल से निकल। बीते रे उमरिया पल-पल-पल।।2।।

मातृ भूमि का कर्ज उतारें।अपना जीवन आप सवारें।। सन्तो सा हृदय हो सहज सरल। बीते रे उमरिया पल-पल-पल ।।3।।

मेरी कल्पना

त्वेश याआवेश

अमित जटिलता

अर्क सा तमतमाता

तुम्हारा रुप

अशांत मुख पर

शशि सी शीतलता

ढूंढती

उजड़ बाग की

पग डण्डी पर

भटकती

सुमनो सी अभिराम

स्वच्छ सांझ-सी

खिली-खिली

मेरी कल्पना !

और तुम ?

पिंजरे का पंछी

हो स्वतंत्र

उड़ गया

खुले आकाश में

पंख लहुलुहान हो गये

टकराकर

जंग लगी

लोहे की सलाखों से

रो दिया

विवशता पर

सीमितता पर

भूला थामै मर्यादित हूं

मेरी कुछ सीमाएं है

हाँ

मै एक पिंजरे का पंछी हूँ !

सांझ

हो चली है सांझ बन्धु ।

चल चले निज धाम बंधु ।।

पंक्षियों की कलरवो में।

गौ धुली पैगाम बन्धु।।

अपने अंबर से मिलन को।

कर रही श्रृंगार अवनि।।

अंक में दिन को समेटे।

कर रही अभिसार रजनी।।

आगया चन्दा पिलाने।

चांदनी के जाम बन्धु।।1।।

द्वार पर पलके बिछाये।

जोहती है बाट रमणी।।

आ गई सागर किनारे।

हो गई है पार तरणी।

झूम कर मल्लाह गाये।

मीठे-मीठे गान बन्धु।।2।।

सावन

रिम-झिम रिम-झिम सावन बरसे।

घिर-घिर आए कारे बदरा।

उमड़-घुमड़ चहुं दिश ते आये

मोहे सताये कारे बदरा।।1।।

घम-घम-घम-घम मेघा गरजे।

चम-चम-चम-चम बिजुरी चमके।।

धक-धक होये मोरो जियरा।

काहे डराये कारे बदरा।।2।।

पिया मिलन को प्रेयसी तरसे।

विरहणी के नयना बरसे।।

बहि-बहि जाये मोरो कजरा।

रास न आये कारे बदरा।।3।।

बल खाती नदियां नाव न रोको।

चंचल हिलोरिया राह न रोको।

परले पार मोरो हियरा।

मोहे न भावे कारे बदरा।।4।।

बसंत (गीत)

घूंघट के पट खोल कोईनयनो की भाषा बोले।

गीत लिखूं मै नया कोईजब कंगना खन-खन बोले।

धरती की धानी चूनर अंबर के मन भाई।

अंग अंग छाया बसंत ले यौवन अंगड़ाई।।

ऋतु संदेश ले पवन बावली दिन-दिगंत डोले।

गीत लिखूं नित नया कोईजब कंगना खन-खन बोले।।1।।

प्रेम पिपासु पिया की पाती छुप-छुप कर खोले।

खोले भेद हिया का चंचल चितवन हौले-हौले।।

संभल-संभल कर चले गोरीपायलिया रुन-झुन बोले।

गीत लिखूं नित नया कोईजब कंगना खन-खन बोले।।2।।

केशरिया होली

प्रीत धुनी-धुन मधुर कंठनी कोयलिया बोली।

मदमाता फागुन ले आया कोशरिया होली।।

भीगा तन-मन गोरी का, भीगी अंगिया चोली।

रंग लाज का नयनों में, गालों पर प्रेम रंगोली।।

श्याम रंग में रंगी राधिका, कान्हा संग डोली।

मदमाता फागुन ले आया केशरिया होली।।1।।

रस रंग बरसे अंबर से धरती की चूनर भीगे।

झूमें नाचे गाये मानव देवों के मन रीझे।।

ऋतु ने मंद बयारों मं समरस की मद घोली।

मदमाता फागुन ले आया केशरिया होली।।2।।

सुंदरता की परिभाषा

नख से शिख तक, शिख से नख तक,

रस छंद बन्द कविता भाषा।

तुम सुन्दरता से भी सुन्दर,

हो सुन्दरता की परिभाषा।।

तुम उपमा चाँद सितारों की,

या उपमा चाँद सितारे है।

तुम हो ऋतु-यौवन का वर्णन

करती गुणगान बयारे है।

भौरों की चाहत सुमन सही

तुम हो सुमनों की अभिलाषा।

तुम सुन्दरता से भी सुन्दर

हो सुन्दरता की परिभाषा।।1।।

तुम कौन सुन्दरी मौन-मौन,

क्यों रुप छुपाती आँचल में।

भीगी वसुधा सौंधी सुगंध

हो दिव्य कल्पना जिज्ञासा।

तुम सुन्दरता से भी सुन्दर

हो सुन्दरता की परिभाषा।।2।।

अंबवा की छांव

चाँद आरसी में चाँदनी संवरती है।

सूनी-सूनी रातों में कल्पना मचलती है।।

चटख रही कलियां भंवर ने ली सुधियां

महक रही बगिया चहक उठी चिड़िया।

सुमन के अंगना में तितली थिरकती है

सूनी-सूनी रातों में कल्पना मचलती है।।

नदी-नद ताल कहां, पत्तियों की नाव कहां

संगी साथ गांव कहां,

अंबवा की छांव कहां 

जहां चौपालो पे समता पलती है।

सूनी-सूनी रातों में कल्पना मचलती है।।

किसने तान छेड़ी कैसी स्वर माया।

किसने हवाओं में आँचल लहराया।।

कौन मेरे हिय में कविता रचती है।

सूनी-सूनी रातों में कल्पना मचलती है।।

संगी साथी गांव कहां, अंबवा की छांव कहां

सुंदरता की परिभाषा

नख से शिख तक, शिख से नख तक,

रस छंद बन्द कविता भाषा।

तुम सुन्दरता से भी सुन्दर,

हो सुन्दरता की परिभाषा।।

तुम उपमा चाँद सितारों की,

या उपमा चाँद सितारे है।

तुम हो ऋतु-यौवन का वर्णन

करती गुणगान बयारे है।

भौरों की चाहत सुमन सही

तुम हो सुमनों की अभिलाषा।

तुम सुन्दरता से भी सुन्दर

हो सुन्दरता की परिभाषा।।1।।

तुम कौन सुन्दरी मौन-मौन,

क्यों रुप छुपाती आँचल में।

भीगी वसुधा सौंधी सुगंध

हो दिव्य कल्पना जिज्ञासा।

तुम सुन्दरता से भी सुन्दर

हो सुन्दरता की परिभाषा।।2।।

अंबवा की छांव

चाँद आरसी में चाँदनी संवरती है।

सूनी-सूनी रातों में कल्पना मचलती है।।

चटख रही कलियां भंवर ने ली सुधियां

महक रही बगिया चहक उठी चिड़िया।

सुमन के अंगना में तितली थिरकती है

सूनी-सूनी रातों में कल्पना मचलती है।।

नदी-नद ताल कहां, पत्तियों की नाव कहां

संगी साथ गांव कहां,

अंबवा की छांव कहां 

जहां चौपालो पे समता पलती है।

सूनी-सूनी रातों में कल्पना मचलती है।।

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किसने तान छेड़ी कैसी स्वर माया।

किसने हवाओं में आँचल लहराया।।

कौन मेरे हिय में कविता रचती है।

सूनी-सूनी रातों में कल्पना मचलती है।।

रंग रुप उड़ने वाला

भूले से दिल किसी का दुःखाना नही हुजूर।

अपनो से दर्द दिल का छुपाना नही हुजूर।।

जितने करीब थे तुम उतने हुए हो दूर।

यादे संभाले रखना भुलाना नही हुजूर।।

रंग रुप उड़ने वाला यौवन भी ढलेगा।

दो दिन की ज़िंदगानी अच्छा नही गुरुर।।

न हमने पी रखी है न तुम नशे में हो।

क्यों घूमती ज़मीं है किस चीज़ का सुरुर।।

किस बात पर खफ़ा हो किस बात का है गम।

जरा खिलखिला के हँस दो एक बार तो हुजूर।।

तन्हाई साथ रहना (गज़ल)

कहना नही किसी से तू ही राज़दार है।

तन्हाई साथ रहना तुझपे एतबार है।।

मेहमान की तरह खुशी आकर चली गई।

दुःख दर्द कहा जाएंगे बचपन के यार है।।

शामिल है फितरतों में तेरी साथ छोड़ना।

मै जानता हुं फिर भी तेरा इन्तज़ार है।।

जीने का हुनर धीरे-धीरे सीख जाउंगा।

यादों अभी न जाना मुझे तुमसे प्यार है।

सबको दिखाके राह मै खुद भटक गया

चलना ही जिंदगी है यही जीत हार है ।।

पश्चिमी हवा

किससे कहूं कैसे कहूं हैरानगी मेरी।

सबको लगे हरी-भरी वीरानगी मेरी।।

पश्चिमी हवा में सांस  ले रहा हूं मैं।

न जाने कहां खो गई है सादगी मेरी।

आस्था के दीप आंधिया बुझा गई।

भटक रही है पत्थरों में बंदगी मेरी।

सहला रही है आलपिनें उंगलियों के घाव।

कागजों में खो गई है जिंदगी मेरी।।

उनके ठहाके ले गये मुस्कान छीनकर।

खुशियाँ तलाशती रहीं दीवानगी मेरी।।

आदिवासी जीवन

घुटने-घुटने कीचड़ गले-गले है पानी।

आदिवासी जीवन अलिखित है कहानी।।

टूटे है दरवाजे खुली है खिड़कियां।

नीरद के बजे बाजे चमकती है बिजलियां।।

छतों की चक्षुओं से टपक रहा है पानी।

आदिवासी जीवन अलिखित है कहानी।।

निर्वस्र नंगे पांव जंगलों मे घूमते है।

भूःख के सताये जीविका ढूंढते है।।

निर्मोह जुल्म ढाती ग्रीष्म की जवानी।

आदिवासी जीवन अलिखित है कहानी।।

मुस्कराना झूमना बजाना नाचना।

गीतों का इनके दर्द क्या समझेगा जमाना।

भगोरे बजार लाये संध्या बड़ी सुहानी।

आदिवासी जीवन अलिखित है कहानी।।

योजनाएं बनाना छोड़ मेरे देश के नेता।

सहते है जुल्म ये तू कुछ नहीं देता।।

इनके लिये है सारी दुनिया की बेगानी।

आदिवासी जीवन अलिखित है कहानी ।।

स्वर्ण चिरैया

स्वर्ण चिरैया कथा पुरानी।

सुनो सुनाऊं में नई कहानी।

कई रानीयों का एक राजा।

कोई खीचे पगड़ी कोई पजामा।।                  

बैठी हुक्म चलाए पटरानी।

सुनो सुनाऊं मै नई कहानी।।

झूठे वादे सौगंध खाले।

एक दूजे पर पंक उछाले

भदरंगे रंग रंगी राजधानी।

सुनो सुनाऊं मै नई कहानी।।

दुराचरण घपले घोटाले।

झूठ फरैबी धन्धे काले।

मौन है सच सो गई जवानी।

सुनो सुनाऊं मै नई कहानी।।

देवालय वीरान पड़ा है।

न्यायालय में राम खड़ा है।

रावण राज करे मनमानी।

सुनो सुनाऊं मै नई कहानी ।।

बे मेलों का मेल

कुट्टी चुप्पी खो-खो कैसा बेमेलों का मेल।

राजनीति बन गई रे बच्चों का खेल।।

अगड़े पिछड़ गये पिछड़े बिछुड़ गये।

दलितों को रौंद नेता आगे निकल गये।

दिलों को दिलों से दूर दिया है धकेल।

राजनीति बन गई बच्चों का खेल।।1।।

चाहे जब सरकार गिराये चाहे जब मतदान।

माली हालत देश की हो गई है बेजान।।

जाग जाओ सुधि जनों डाल दो नकेल।

राजनीति बन गई रे बच्चो का खेल।।2।।

सब कुछ डकार गये अब क्या गोबर खाएंगे।

मतदाता के पास कौनसी  सूरत लेकर जायेंगे।।

गांव बोले न बोले बयरा बोले रे पटेल।

राजनीति बन गई रे बच्चो का खेल।।3।।

गद्दारो के आगे सारा देश गूंगा है।

भारत के सपूतों को क्या सांप सूंघा है।।

भूत का साया है या लागी रे चुड़ैल।

राजनीति बन गई रे बच्चो का खेल।।4।।

टेंशन…..? नो मेंशन

ज्यादा खर्च कम कमाई बढ़ता कर्ज हाथ न पाई।

बेटी घर में बहु पराई फर्ज ही फर्ज हाय महंगाई

क्या हुआ भाई ? रूठी लुगाई।

टेन्शन………….? नो मेन्शन………….।।1।।

कपड़े तंग उघड़े अंग पश्चिमी रंग बुद्धि पर जंग।

मर्यादा भंग सब है चंग क्यों हो दंग नाचो संग।

क्यों रोती माई ? 

लज्जा आई ?टेन्शन………….? नो मेन्शन………….।।2।।

भागम भाग भीड़ भाड़ मारा मारी

छीना छपटी लूटपाट भ्रष्टाचारी।

घुटन प्रदूषण शोषण विघटन सांट गांठ

षड़यंत्र दुर्घटनाए दुराचरण।

बिना दवाई नींद नहीं आईटेन्शन………….? नो मेन्शन………….।।3।।

प्रतिस्पर्धा पैसा पैसा स्वार्थी मानव हाय ये कैसा

झूठे नाते कलुषित भाव जलन इर्ष्या मनमुटाव।

मारल डाऊन ईगो हाईटेन्शन………….? नो मेन्शन………….।।4।।

झूठ फरेबी धन्धे काले भाई भतीजे जीजी साले।

सुरा सुन्दरी जुआ सट्टा चिलम धुआं।

कहीं पे फाके कहीं मलाईटेन्शन………….? नो मेन्शन………….।।5।।

धरम भ्रष्ट सम्मान नष्ट जनता त्रस्त नेता मस्त।

धक्का मुक्की जोड़-तोड़ खींचा तानी कुर्सी दौड़।

तू-तू मै-मै रोज लड़ाईटेन्शन………….? नो मेन्शन………….।।6।।

कांक्रीट के जंगल सर्वत्र अमंगल घरों में

झगड़े बाहर दंगल।

नीयत बुरी चाकू छुरी बम गोली खून की होली।

कैसे हो भाई बी पी हाई ?

टेन्शन………….? नो मेन्शन………….।।7।।

धांय-धाय रेप मर्डर सांय सांय सहमा शहर।

बिजली गुल अंधेरा घुप सब चुप गुप चुप।

हैवानों को हया न आई

टेन्शन………….? नो मेन्शन………….।।8।।

कुछ देखा भाई अन्धा हूँ सुना तो होगा बहरा हूँ।

खोल दे पोल कुछ तो बोल लंगड़ा लूला गूंगा हूँ।

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ओढ़ रजाई सोजा भाई

टेन्शन………….? नो मेन्शन………….।।9।।

हाड़ मांस के तंतु

भन्तु-  लेकिन किन्तु परन्तु हाड़ मास के तन्तु।

आज की आवाज़ सुन भोले-भाले सन्तु।।

भावनाए छोड़ दे रिश्ते-नाते तोड़ दे।

दुनिया के वैभव अपनी तरफ मोड़ दे।

कठोर बनाले मन तू भोले-भाले सन्तु।।1।।

किस दुनिया में जीता है,तू जो जीता है वह बीता है।

दूसरो के आंसू पोंछता है, अपने आंसू पीता है।

काहे घटाए तन तू, भोले-भाले सन्तु।।2।।        

होने दे अपनी बीबी को टीबीपड़ोसन से पूछ जुकाम कैसा है।

यहां रिवाज़ ही कुछ ऐसा है ,यार उसके पास पैसा है।

बनजा थोड़ा दुर्जन तू, भोले –भाले सन्तु।।3।।

पैसे की दुनिया में पैसा है प्यार ।पैसा औजार है, पैसा हथियार।

स्वार्थी मानव बन तू भोले-भाले सन्तु।।4।।

खा गया गौमाता का चारा, देख लालू कितना प्यारा।

कभी जेल मे कभी रेल में कितना मजा हैइस खेल में।

आदर्श कर दफ़न तू , भोले भाले सन्तु।।5।।

अन्धेरे का डर दिखा खोल दे उजाले की दुकान।

बेईमानी की नींव पर बनाले मक्कारी का मकान।

समाज में बढ़ाले वजन तू भोले-भाले सन्तु।।6।।

सब कुछ लुटाके तू ने क्या पाया है।

माया के पास माया है तेरी दुर्बल काया है।

तेलगी सुखराम बन तू भोले-भाले सन्तु।।7।।

छोड़ एकड़ की अकड़ पैसा दांत से पकड़।

फसल फिसल जाएगी ये गरीबी तुझे निगल जाएगी।

करले कुछ जतन तू भोले-भाले सन्तु ।।8।।

सन्तु – भोलो को भरमाता है उल्टी बात बताता है।

प्यार बांटने वालो को नफरत की राह दिखाता है।

दुष्ट दानव भन्तु नहीं डिगेगा सन्तु।।9।।

मेरी पत्नी मेरे बच्चे भोले भाले मन के सच्चे।

मित्र मोहल्ला गांव ये मेरालोग यहां के कितने अच्छे।

मेरे मन से निकल तू , नही डिगेगा सन्तु।।10।।

मिस्टर भन्तु अबके होली बहुत सजाऊंगा।

ईधन की मारा मारी है मै तुझे जलाऊंगा।

गन्दी नाली के जन्तु , नही डिगेगा सन्तु ।।11।।

शिक्षा का महल बनाओ

अक्षर की ईट लगाकर , शिक्षा का महल बनाओ।

विद्या के दीप जलाकर, अंधियारा दूर भगाओ।।

सपना हो यह सच्चा, शिक्षित हो हर बच्चा।

गांव-गांव, नगर-नगर शिक्षा की हो चर्चा।।

जन-जन को लिखना सिखाओ जन-जन को पढ़ना सिखाओ।

विद्या के दीप जलाकर, अंधियारा दूर भगाओ।।1।।

उत्तम धन शिक्षा प्रगति का द्वार है।

वाणी के प्रसाद पर सबका अधिकार है।।

अशिक्षा अभिशाप मिटाओ अंगूठा अब न लगाओ।

विद्या के दीप जलाकर,अंधियारा दूर भगाओ।।2।।

कोयल की कूह-कूह अंबवा की डाल पे।

अ आ इ ई उ ऊ शाला उद्यान में ।।

ए ऐ ओ औ अं अः वर्णों का हार बनाओ।।3।।

सागर की लहरों- सा नदियों की कल-कल सा।

प्राथमिक शिक्षा मिशन भौरों की गुन-गुन सा।।

प्रतिभा के सुमन खिलाकर धरती की गोद सजाओ।

विद्या के दीप जलाकर अंधियार दूर भगाओ।।4।।

दुनिया गोल-गोल है

माया बेटी पसंद है कहे दुल्हे का बाप ।

संबंधी माया दो मुझे दहेज लेना पाप।

पाप का बाप लोभ है ।।

पहले दुल्हन का पिता वर की मांग भरे ।

दुल्हा राजा बाद में वधु की मांग भरे।

यह बढ़ती मांग रोज है ।।

पाकर दुल्हन चांद सी, रोटी – सी फूली सास ।

सहमें सासू नाम से बहू की फूले सांस ।

कांपता रोम-रोम है ।।

पहली रजनी ही पिया पैंच में जो फंसा जाये ।

जीवन भर अर्धांगिनी कन कौवे सा उड़ाय ।

अनूठी प्रेम डोर है ।।

अपनी बारी आय जब सब पलटी खा जाय ।

सौ-सौ चूहे मार कर बिल्ली हज को जाय ।

यह दुनिया गोल- गोल है ।।

मुक्तक

प्रीत मीत गीत रीति रास लेखनीमन शरीर प्राण हर एक सांस लेखनी ।।अनल समीर नीर कंट धार पर चले । पर्वत की शिखाओं से करे बात लेखनी ।।


मन सुमन सुमन मन अर्पित ।तन मन धन मृदु भाव समर्पित।।स्वप्न प्रश्न प्रिय-प्राण चढ़ाऊं। मातृभूमि सर्वस्व समर्पित ।।


हमारे गीत माँ तुम्हारे हैं। ख्वाब अरमान सब तुम्हारे हैं। देश की है अमानत हर धड़कन। भारती लाल हम तुम्हारे हैं ।।


आस्था कमजोर है बीमार है। श्रद्धा वृद्धा की तरह लाचार है।। देवालय में देवता सहमा हुआ। दानवों से मानवी आचार है।।


उसकी धरती उसका अंबर है। मोह माया का जग समन्दर है।। मृत्यु से भय तुझे है क्यों जीवन । “वो” बावुल का “ये” पिया घर है।


धरती ने सजाया है आंगन। रस बरसेगा आज गगन । हर्षित तन मन ऋतु बसंत। माँ सरस्वती वन्दन वन्दन।


दर्द जब हद से गुजर जाता है। गीत बन कागज पे उभर आता है ।। गीत की तकदी रवाह क्या कहना ।लय बन अधरों पे सवर जाता है।

तू खिल जाए

खुशियां तेरे भाग में आये, सारे गम मुझको मिल जायें।

पथ के कांटे मै चुन लूंगातुझको बस मंजिल मिल जाये।

मै पतझड़ हूं झड़ जाने दे, मेरी तमन्ना तू खिल जाये।

मै निर्बल क्या तेरा सम्बल,प्रभु से तुझको बल मिल जाये।


इति 
रुठना है तुम्हे रुठो मै मनाता रहूंगा।

तराने प्यार के यूं ही सदा गाता रहूंगा।

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