sahir ludhiyanvi sher o shayri

साहिर लुधियानवी: जिसने अपनी शायरी में दर्द को दर्द का एहसास कराया!

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एक बेहद मशहूर ओ माअरूफ़ शायर और नग़मा निगार साहिर लुधियानवी साहब ने 59 बरस की उम्र में ही दुनिया को छोड़ दिया था । साल 1980 में हरकत-ए-क़ल्ब रुक जाने से दुनिया को अलविदा कह गए।

कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है.. मैं पल दो पल का शायर हूं.. पल दो पल मेरी कहानी है.. अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं.. ऐसे दिलकश नग़में लिखने वाले शायर की आज बरसी है। भले ही साहिर साहब आज हमारे बीच न हो मगर उनके लिखे नग़मों और शेरों ने आज भी उनको हमारे बीच ज़िंदा कर रखा है।

हर एक दौर का मज़हब नया ख़ुदा लाया

करें तो हम भी मगर किस ख़ुदा की बात करें

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साहिर का जन्म 8 मार्च 1921 में पंजाब राज्य के लुधियाना में एक जागीरदार परिवार में हुआ। लाहौर और बंबई उनकी कर्म भूमी रही। साहिर के पिता एक धनी व्यक्ति थे, लेकिन उनके जीवन में माता-पिता दोनों का प्यार नहीं लिखा था। माता-पिता के अलगाव के बाद वो अपनी मां के साथ रहे और उनकी मां के जीवन के दुख और संघर्ष ने साहिर के जीवन पर एक गहरी छाप छोड़ी।

ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है

क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम

साहिर जिनके प्यार में अमृता प्रीतम दीवानी हो गई थीं। साहिर नाम है। अपनी  मां से बेपनाह मोहब्बत करने वाला तो कहीं माशूक़ों का दिल तोड़ने वाला साहिर। साहिर लुधियानवी जितने बड़े शायर हैं उतना ही बड़ा कद उनका बतौर गीतकार भी है। उन्होंने समाज से लेकर मुहब्बत तक हर विषय पर लिखा है और लोग साहिर के लिखे गीतों को आज भी गुनगुनाते हैं।

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तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम

ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम

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साहिर जिनके प्यार में अमृता प्रीतम दीवानी हो गई थीं। शब्‍दों के जादूगर ही थे साहिर। गम के नगमे साहिर ने इतनी शिद्दत से रचे हैं मानो अश्‍कों को स्‍याही बनाया हो। अमृता प्रीतम ने अपनी किताब ‘रसीदी टिकट ‘ में अपने इश्क़ को तफ़्सील से बयां किया है। साहिर और अमृता दोनों अलहदा शख़्सियत के इंसान थे। दोनों शायरी के उस्ताद पर जहां साहिर ने अमृता से अपना इश्क़ दुनिया के सामने ज़ाहिर नहीं किया, वहीं अमृता ने कुछ भी न छुपाते हुए ईमानदारी और हिम्मत दिखाई है।

फिर खो न जाएँ हम कहीं दुनिया की भीड़ में

मिलती है पास आने की मोहलत कभी कभी

उन्होंने बेबाकी से अपने साहिर के प्रति इश्क़ को ज़ाहिर किया है। ‘साहिर घंटों बैठा रहता और बस सिगरेटें फूंकता रहता और कुछ न कहता। साहिर का हर इश्क़ अधूरा ही रहा। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना था कि वे जानकर इश्क़ को अधूरा छोड़ देते थे जिससे अपनी शायरी में दर्द पैदा कर सके।

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मोहब्बत तर्क की मैं ने गरेबाँ सी लिया मैं ने

ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैं ने

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में

कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने

उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है

कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैं ने

बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदो

बहुत दुख सह लिए मैं ने बहुत दिन जी लिया मैं ने

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