और जब अमृता के साहिर को डाकुओं ने बंधक बना लिया था….

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व्यक्ति विशेष। 25 अक्टूबर यानी उर्दू के मशहूर शायर – गीतकार साहिर लुधियानवी की पुण्यतिथि है। इस दौरान हम आपको बताने जा रहे हैं साहिर से जुड़े एक महत्वपूर्ण किस्से के बारे में …लेकिन उससे पहले आपको बता दें, दरअसल साहिर की जिदंगी में जिस तरह अमृता कविता बनके आईं वैसे ही अमृता के लिए साहिर अफसाना निगार के तौर पर अपनी वसीयत छोड़ गए। अमृता और साहिर की बात निकलेगी तो शायद शब्द कम पड़ जाएंगे पर दोनों की बात खत्म नहीं होगी।

असल में हम जिस किस्से की बात कर रहें हैं वो साहिर की जिंदगी और उनके कद को दर्शाता है कि एक शायर डाकुओं के जीवन पर भी अपना प्रभाव छोड़ सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक साहिर एक बार अपनी कार से लुधियाना जा रहे थे। मशहूर उपन्यासकार कृष्ण चंदर भी साथ थे।

मध्यप्रदेश के पास डाकू मान सिंह ने उनकी कार रोककर उसमें सवार सभी लोगों को बंधक बना लिया। लेकिन जब साहिर ने उन्हें बताया कि उन्होंने डाकुओं की जिंदगी पर दो गाने लिखे और फिल्म मुझे जीने दो के वो दोनों गाने हैं। इसके बाद साहिर और उनके साथियों को डाकुओं ने सम्मान के साथ जाने दिया।
ये 10 बातें जो साहिर के बारे में जानना जरूरी है…

  1. 1. साहिर का जन्म पंजाब के जागीरदार घराने में हुआ था।
  2. 2. साहिर का असली नाम अब्दुल हई था। शायरी के लिये नाम साहिर रख लिया
  3. 3.साहिर की शिक्षा लुधियाना के ‘खालसा हाई स्कूल’ में हुई।
  4. 4. साल 1943 में उन्होंने ‘तल्ख़ियां’ नाम से अपनी पहली शायरी की किताब प्रकाशित करवाई।
  5. 5 साहिर लुधियानवी का जन्म साल 1921 में 8 मार्च को हुआ था
  6. 6 बतातें हैं कराची में एक भारतीय गायक को सुनने के लिए पहुंचे थे 58 हजार लोग ।
  7. 8.  साहिर अपने गीत के लिए लता मंगेशकर को मिलने वाले पारिश्रमिक से एक रुपया ज्यादा लेते थे।
  8. 9 गीतकार साहिर ने जब लिखना शुरू किया तब ‘इकबाल, फैज, फि‍राक जैसे बेहतरीन शायर अपनी बुलंदी पर थे।
  9. 10 .तीन दशक तक हिंदी सिनेमा को गीतों से सराबोर करने वाले साहिर लुधियानवी 59 साल की उम्र में 25 अक्टूबर 1980 को निधन हो गया।
  10. कॉलेज के दिनों में ही वे अपने शेर और शायरी के लिए मशहूर हो गए थे

 

ताउम्र साहिर से मोहब्बत करने वाली साहित्यकार  अमृता प्रीतम (कोरा काग़ज) में साहिर के आखिरी वक्त में लिखती हैं….

पच्चीस और छब्बीस अक्टूबर की रात दो बजे जब फ़ोन आया कि साहिर नही रहे तो पूरे बीस दिन की उस रात , उस रात में मिल गयी, जब में बल्गारिया में थी डॉक्टरों ने कहा था कि दिल की तरफ से मुझे खतरा है और उस रात मैंने नज्म लिखी थी “अज्ज आपणे दिल दरिया दे विच्च मै आपणे फुल्ल प्रवाहे” अचानक मै आपने हाथों की और देखने लगी कि इन हाथों से मैंने अपने दिल के दरिया में अपनी हड्डियां प्रवाहित की थी, पर हड्डियां बदल कैसे गयी ? यह भुलावा मौत को लग गया कि हाथों को ?

और साहिर कहते रहे……….
मै जिन्दा हूं ये मुश्तहर कीजिये
मिरे कातिलों को खबर कीजिये ।। ##सहिर