मैं हमेशा 'कार्ल सगान' की तरह एक लेखक बनना चाहता था..लेकिन अंत में सिर्फ़ ये पत्र लिख पा रहा हूं!

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ग्राउंड रिपोर्ट । नेहाल रिज़वी

तीन साल पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। रोहित की मौत के बाद देशभर में काफ़ी विरोध हुआ था। पीएम मोदी को भी इसका विरोध झेलना पड़ा था। रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला अपनी मौत के बाद जातीय आधार पर होने वाले अन्याय और भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष का एक ऐसा चेहरा बन कर उभरे थे जिसने पूरे देश में जातीय आधार पर होने वाले भेदभाव के ख़िलाफ लोगों में आवाज़ उठाने का साहस पैदा कर दिया। आज भी वो संघर्ष का चेहरा बने रहते हैं।

रोहित की आत्महत्या के बाद हैदराबाद सहित देश भर में कई विश्वविद्यालों में विरोध प्रदर्शन हुए थे।  26 साल के रोहित हैदराबाद विश्वविद्यालय के रिसर्च स्कॉलर थे और उन्हें विश्वविद्यालय प्रबंधन ने हॉस्टल से निष्कासित कर दिया था। इसके बाद उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के बैनर से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। वे आंध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले के ग़रीब परिवार से थे।

रोहित रोज़ी रोटी जुटाने वाला इकलौता व्यक्ति था

रोहित अपने परिवार के लिए रोज़ी रोटी जुटाने वाला इकलौता व्यक्ति था। विश्वविद्यालय से मिलने वाले पैसे में से कुछ हिस्सा वह घर अपना मां को भेजा करता था। रोहित की मौत के बाद रोहित की मां ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि, “मेरा बेटा इसलिए मरा क्योंकि कुछ ताक़तवर लोगों ने अपनी ताक़त का ग़लत इस्तेमाल करते हुए उसके ख़िलाफ़ षड्यंत्र किया।”

रोहित पढ़ाई में हमेशा से आगे था। उसके लेखन से उसकी क़ाबिलियत का अंदाजा भी होता है। वो एक लेखक बनना चाहता था। अपने शानदार अकादमिक करियर के चलते ही उन्हें यूजीसी की जूनियर फ़ेलोशिप और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए दी जाने वाली राजीव गांधी नैशनल फ़ेलोशिप मिला करती थी। उन्होंने विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर को अपने लिखे पत्र में कहा था कि दलित छात्रों के कमरे में एक रस्सी मुहैया करानी चाहिए। उन्होंने उससे पहले ये भी लिखा था, “हम लोगों को इस तरह अपमानित करने की जगह नामांकन के समय ही हमें ज़हर दे देना चाहिए।”

उनके एक दोस्त डी प्रशांत ने मीडिया को बताया था कि रोहित इसलिए भी परेशान था क्योंकि तमाम विरोध प्रदर्शनों का वाइस चांसलर पर कोई असर नहीं हो रहा था और रोहित को उसकी निम्न जाति का एहसास दिलाया जा रहा था।

क्या घटना हुई थी ?

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन और आरएसएस के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के बीच मारपीट की एक घटना हुई थी। रोहित के साथ विश्वविद्यालय से निलंबित सी. सेशैया इस मामले की शुरुआत के बारे में बताते हैं, “तीन अगस्त को कैंपस में विरोध प्रदर्शन के दौरान झगड़ा हुआ था। एबीवीपी के सदस्यों ने हम पर तब हमला किया जब हम मुज़फ़्फ़रनगर दंगों पर बनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म पर बैन लगाए जाने का विरोध कर रहे थे।

इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच बिठाई। इस बीच आरएसएस के नेता तथा स्थानीय सांसद और केंद्रीय मंत्री बंदारु दत्तात्रेय ने स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर मामले में कार्रवाई करने का अनुरोध किया। स्मृति ईरानी ने विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर को एक के बाद एक कई पत्र लिखकर कार्रवाई करने को कहा।

सेशैया इसके लिए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को भेजे गए राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के पत्र को ज़िम्मेदार मानते हैं जिसमें इन छात्रों पर वीसी से कार्रवाई करने की मांग की गई थी। इस घटना के बाद तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी जहां कहीं भी गईं, उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। संसद में उनके भाषण का जमकर विरोध हुआ था। इस घटना के बाद हुए पहले मंत्रिमंडल के फेरबदल में उनका विभाग बदल दिया गया। विरोध के कारण मोदी मंत्रिमंडल के किसी मंत्री के हटने का ये एकमात्र मामला था।

रोहित वेमुला का वो आख़री ख़त जिसे पढ़ने के बाद लोगों को एहसास हुआ कि देश ने एक अच्छा विद्वान खो दिया।

आप जब ये पत्र पढ़ रहे होंगे तब मैं नहीं होऊंगा। मुझ पर नाराज़ मत होना। मैं जानता हूं कि आप में से कई लोगों को मेरी परवाह थी, आप लोग मुझसे प्यार करते थे और आपने मेरा बहुत ख़्याल भी रखा। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। मुझे हमेशा से ख़ुद से ही समस्या रही है। मैं अपनी आत्मा और अपनी देह के बीच की खाई को बढ़ता हुआ महसूस करता रहा हूं। मैं एक दानव बन गया हूं। मैं हमेशा एक लेखक बनना चाहता था। विज्ञान पर लिखने वाला, कार्ल सगान की तरह। लेकिन अंत में मैं सिर्फ़ ये पत्र लिख पा रहा हूं। मुझे विज्ञान से प्यार था, सितारों से, प्रकृति से, लेकिन मैंने लोगों से प्यार किया और ये नहीं जान पाया कि वो कब के प्रकृति को तलाक़ दे चुके हैं। हमारी भावनाएं दोयम दर्जे की हो गई हैं। हमारा प्रेम बनावटी है। हमारी मान्यताएं झूठी है। हमारी मौलिकता वैध है बस कृत्रिम कला के ज़रिए यह बेहद कठिन हो गया है कि हम प्रेम करें और दुखी न हों।

एक आदमी की क़ीमत उसकी तात्कालिक पहचान और नज़दीकी संभावना तक सीमित कर दी गई है। एक वोट तक। आदमी एक आंकड़ा बन कर रह गया है। एक वस्तु मात्र। कभी भी एक आदमी को उसके दिमाग़ से नहीं आंका गया। एक ऐसी चीज़ जो स्टारडस्ट से बनी थी। हर क्षेत्र में, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, मरने में और जीने में। मैं पहली बार इस तरह का पत्र लिख रहा हूं। पहली बार मैं आख़िरी पत्र लिख रहा हूं। मुझे माफ़ करना अगर इसका कोई मतलब न निकले तो। हो सकता है कि मैं ग़लत हूं अब तक दुनिया को समझने में। प्रेम, दर्द, जीवन और मृत्यु को समझने में। ऐसी कोई हड़बड़ी भी नहीं थी। लेकिन मैं हमेशा जल्दी में था। बेचैन था एक जीवन शुरू करने के लिए। इस पूरे समय में मेरे जैसे लोगों के लिए जीवन अभिशाप ही रहा। मेरा जन्म एक भयंकर दुर्घटना थी। मैं अपने बचपन के अकेलेपन से कभी उबर नहीं पाया। बचपन में मुझे किसी का प्यार नहीं मिला।

क्या आत्मरक्षा की आढ़ में ‘सेलेक्टिव किलिंग’ कर रही यूपी पुलिस ?

इस क्षण मैं आहत नहीं हूं। मैं दुखी नहीं हूं। मैं बस ख़ाली हूं। मुझे अपनी भी चिंता नहीं है। ये दयनीय है और यही कारण है कि मैं ऐसा कर रहा हूं। लोग मुझे कायर क़रार देंगे। स्वार्थी भी, मूर्ख भी। जब मैं चला जाऊंगा। मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता लोग मुझे क्या कहेंगे। मैं मरने के बाद की कहानियों भूत प्रेत में यक़ीन नहीं करता। अगर किसी चीज़ पर मेरा यक़ीन है तो वो ये कि मैं सितारों तक यात्रा कर पाऊंगा और जान पाऊंगा कि दूसरी दुनिया कैसी है।

आप जो मेरा पत्र पढ़ रहे हैं, अगर कुछ कर सकते हैं तो मुझे अपनी सात महीने की फ़ेलोशिप मिलनी बाक़ी है। एक लाख 75 हज़ार रुपए। कृपया ये सुनिश्चित कर दें कि ये पैसा मेरे परिवार को मिल जाए। मुझे रामजी को चालीस हज़ार रुपए देने थे। उन्होंने कभी पैसे वापस नहीं मांगे। लेकिन प्लीज़ फ़ेलोशिप के पैसे से रामजी को पैसे दे दें। मैं चाहूंगा कि मेरी शवयात्रा शांति से और चुपचाप हो। लोग ऐसा व्यवहार करें कि मैं आया था और चला गया। मेरे लिए आंसू न बहाए जाएं। आप जान जाएं कि मैं मर कर ख़ुश हूं जीने से अधिक।

यूपी पुलिस ने कहा,”आप एक हिंदू हैं, फिर आपकी दोस्ती मुसलमानों के साथ क्यों है?”

‘छाया से सितारों तक’ उमा अन्ना, ये काम आपके कमरे में करने के लिए माफ़ी चाहता हूं। अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन परिवार, आप सब को निराश करने के लिए माफ़ी। आप सबने मुझे बहुत प्यार किया। सबको भविष्य के लिए शुभकामना। आख़िरी बार जय भीम।

मैं औपचारिकताएं लिखना भूल गया। ख़ुद को मारने के मेरे इस कृत्य के लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं है। किसी ने मुझे ऐसा करने के लिए भड़काया नहीं, न तो अपने कृत्य से और न ही अपने शब्दों से।ये मेरा फ़ैसला है और मैं इसके लिए ज़िम्मेदार हूं। मेरे जाने के बाद मेरे दोस्तों और दुश्मनों को परेशान न किया जाए।

रोहित वेमुला जैसे छात्र आने वाले समय में भी मिलेंगे।

रोहित जैसे छात्र किस खालीपन को महसूस कर रहे हैं। ये हमारे समाज की एक ऐसी कमजोरी को उजागर करता है जिस पर यदि गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो आने वाली नस्लों में हम ये कभी न भरने वाला खालीपन हमेशा हमेशा के लिए छोड़ देंगे।

एक पीएचडी स्कॉलर की बातों से अंदाजा लगाइए कि उसके भीतर एक अविकसित बच्चा भी है। उसके भीतर एक अतिविकसित ज्ञानी भी है। ये दोनों ही स्थितियां बहुत खतरनाक हैं और इन पर ध्यान नहीं दिया तो कई और रोहित आपको आने वाले समय में भी मिलेंगे।

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