Research scholars across the country struggling with financial constraints due to not getting the fellowship

फेलोशिप न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे देश भर के रिसर्च स्कॉलर, कब सुध लेगी सरकार?

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वर्तमान समय में देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। जीडीपी दर अब तक की सबसे बड़ी गिरावट पर पहुंच चुकी है। देश में बेरोज़गारी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कोरोना संक्रमण के चलते लगे लॉकडाउन ने और बुरी स्थिति उत्पन्न कर दी है। इस बीच भारत में बीते छह महीने से हजारों रिसर्च स्कॉलर / शोछ छात्रों (Research Scholars of India) को उनकी फेलोशिप (Fellowship) नहीं मिली है। स्थिति यह हो गई कि नई तकनीक और नई चीज़ों पर शोध करने वाले छात्र जो अपनी रिसर्च के ज़रिए देश को उज्जवल भविष्य देने वाले थे वे अब दो जून की रोटी और मकान के किराए का भी जुगाड़ नहीं कर पा रहे हैं।

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देश के प्रतिशिष्ठित चिकित्सा संस्थान एम्स के रिसर्च स्कॉलर लालचंद्र ने एक समय में लाखों का सैलरी पैकेज ठुकरा कर अनिद्रा जैसी समस्या पर रिसर्च करने का रास्ता चुना और आज स्थिति यह है कि उनके पास अपने मकान का किराया देने का पैसा भी नहीं बचा है। लालचंद्र का कहना है कि पिछले छह महीनों से उन्हें फेलोशिप नहीं मिली है। देश में लालचंद्र अकेले नहीं है बल्कि तीस हज़ार से अधिक रिसर्च स्कॉलर्स जो अलग अलग संस्थानों से पीएचडी कर रहे हैं उनके पास अपना खर्च चलाने तक का पैसा नहीं बचा है।

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आर्थिक तंगी से जूझ रहे देश भर के रिसर्च स्कॉलर, बीते कई महीनों से नहीं मिली फेलोशिप

रिसर्च पर भारत में जीडीपी का 0.7 प्रतिशत खर्च होता है और इन शोधार्थियों को 31 हज़ार से लेकर 55 हज़ार तक फेलोशिप मिलती है जिससे उनका जीवन बसर होता है। लेकिन पिछले छह महीनों से आर्थिक तंगी झेल रहे इन रिसर्च स्कॉलर्स की कोई सुनने वाला नहीं है। यह स्कालर्स फेलोशिप ना मिलने की शिकायत को लेकर सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक विरोध जता चुके हैं लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। इनकी फेलोशिप अभी तक क्यों नहीं आई इस पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी खामोश है।

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फेलोशिप में वृद्धि के लिए क्यों हर बार सड़कों पर उतरते हैं रिसर्च स्कॉलर?

AIIMS के अलावा International Centre for Genetic Engineering and Biotechnology जैसे प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट में टीबी जैसी गंभीर बीमारी पर रिसर्च कर रहे रिसर्च स्कॉलर संदीप कौशिक भी फेलोशिप न मिलने की वजह से तंगी के दौर से गुजर रहे हैं। बची कुची सेविंग्स भी खत्म हो चुकी है। एक ओर रिसर्च का तो दूसरी ओर आर्थिक तंगी और पैसे न होने से जीवन यापन का दबाव। संदीप कौशिक का कहना है कि मार्च के बाद से मेरी फेलोशिप नहीं आई है। अब मुझे रूम रेंट देना है। जरूरत का कुछ सामान भी खरीदना है लेकिन पैसे नहीं है। दिमाग इन सब बातों से परेशान है। इसका असर मेरे रिसर्च पर पड़ रहा है।

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CSIR, ICMR, DST और DBP जैसे तमाम संस्थानों की रिसर्च कर रहे हजारों छात्रों को फेलोशिप नहीं मिल पाई है। एक ओर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई मौकों पर जय जवान-जय किसान और जय विज्ञान का नारा दे चुके हैं लेकिन वहीं दूसरी ओर जय विज्ञान की राह दिखाने वाले रिसर्च स्कॉलर तंगी के दौर से गुजर रहे हैं। इस बात पर दिया तले अंधेरा कहावत बिल्कुल फिट बैठती है।

सरकारी कर्मचारियों को वक्त पर तनख्वाह मिल जाती है, मिलनी भी चाहिए लेकिन बड़ा सवाल जिनके भरोसे देश का विज्ञान है उन रिसर्च स्कॉलर्स का क्या। उन्हें बीते छह महीनें क्यों फेलोशिप नहीं मिली। अब कब मिलेगी इसकी सुध लेने में न तो सरकारी बाबूओं को दिलचस्पी है न ही सरकार को।

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