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डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 70 साल पहले ‘2019’ के लिए कही थी ये बात…

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कोमल बड़ोदेकर

आज पूरा देश 70वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। सड़कें, गली, मोहल्ले, चौराहे, सरकारी, गैर सरकारी संस्थान में तिरंगे की चमक और और राष्ट्र भक्ती गीतों की गूंज है। आजादी के तीन साल बाद 26 जनवरी 1950 देश में लागू हुए संविधान ने न सिर्फ दलितों, मुस्लिमों, सिखों, हिन्दुओं, महिलाओं और सभी वर्गों के लोगों को समानता का अधिकार दिया।

संविधान निर्माता डॉ. भीम राव अंबेडकर ने लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार देते हुए कहा था, 26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभास के जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हमें समता मिलेगी पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमें विषमता मिलेगी।

उन्होंने आगे कहा, राजनीति में हम ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ और ‘एक वोट-एक मुल्य’ के सिद्धांत को अपनाएंगे, लेकिन अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता पायेंगे क्योंकि वहां हमारी सामाजिक संरचना के अनुरूप हम ‘एक व्यक्ति-एक मूल्य’ के सिद्धांत को खारिज करते हैं।

उन्होंने आगे कहा, यदि हम लंबे समय तक समतामूलक समाज की ओर नहीं बढ़ेंगे, तो हमारा राजनीतिक गणतंत्र भी लंबे समय तक कायम नहीं रह पायेगा। यदि लोकतंत्र ‘एक व्यक्ति-एक मूल्य’ के सिद्धांत की स्थापना करता हैं तो समाज की राजनैतिक संरचना के साथ आर्थिक संरचना का स्वरुप भी सहज, निश्चित किया जा सकता हैं।

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70 साल पहले देश को संविधान सौंपते हुए बाबा साहेब ने देश के सामने अपनी दूरगामी सोच को सामने रखा था जिसका परिणाम हम अब अपने आस-पास देखते हैं। अपने भाषण के दौरान उन्होंने जिस आर्थिक असमानता की बात की थी उस असमानता को इस तस्वीर के जरिए बखूबी समझा जा सकता है।

उत्तर प्रदेश स्थित प्रयागराज (इलाहाबाद) में चल रहे कुंभ महोत्सव में ली गई इस तस्वीर को ‘आर्थिक दृष्टी’ से देखें तो एक गरीब संत, बेहतर स्थिति में नजर आ रहे बच्चे से दक्षिणा की अपील करते दिख रहे हैं लेकिन बच्चे के हाव-भाव चिंतित और परेशानी वाले हैं।

बहरहाल, यह सिर्फ एक तस्वीर मात्र है जो देश में फैली इस आर्थिक असानता को बयां करती है। हम हर दिन अपने आस-पास न जाने ऐसी कितनी ही जिन्दगियों को देखकर नजरअंदाज कर जाते हैं, और ‘एक व्यक्ति-एक मूल्य’ की अवधारणा को खारिज करते हुए समस्या की मूल जड़ से मुंह मोड़ जाते हैं। यही स्थिति सामाजिक स्तर पर लागू होती है।