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अक्षय उर्जा का वैश्विक केंद्र बनने की दिशा में बढ़ता भारत

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लेखक- राजेश पाठक
अपने मुख्यमंत्री रहते हुए पहले गुजरात में, फिर केंद्र में प्रधान मंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने अक्षय उर्जा के क्षेत्र में जो पहल करी है उसके लिए देश उनका जितना ऋणी रहे उतना कम है. देश में जिस प्रान्त में अक्षय उर्जा पर सर्वाधिक काम हुआ है वो है गुजरात. यहाँ के पाटण जिले के चारण गाँव में ५००० एकड़ पर देश का सबसे बड़ा सौर-उर्जा सयंत्र स्थापित किया गया है, जिसकी ५०० मेघावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता है. राज्य के ही मेहसाणा जिले में नहर के ऊपर ७५० मीटर की लम्बाई में सौर पेनल स्थापित किये गए हैं, जो देश में ही नहीं पूरी दुनिया में एक मिसाल है. इसने दिखाया है कि किस प्रकार अलग से जमीन का प्रावधान किये बिना सौर-उर्जा पैदा की जा सकती है, और साथ ही नहर का वाष्पीकरण को सीमित किया जा सकता है

भारत में पवन उर्जा से प्राप्त कुल विद्युत क्षमता १९००० मेघावाट है, जिसमे अकेले गुजरात का हिस्सा ३,१४७ मेघावाट है. इसका बड़ा श्रेय जाता कच्छ के समुद्री किनारों से लगे लगभग १६०० की.मी. पट्टी पर स्थापित सेकड़ों पवन उर्जा चक्कीयाँ. यही वो क्षेत्र है जहां सन २०१४ में दुनिया की सबसे ऊंची १२० मी. पवन चक्की सुजलोन कंपनी द्वारा स्थापित की गयी थी। सुजलोन कंपनी के संस्थापक पूना के श्री तुलसी तांती का किस्सा बड़ा रोचक है। उन्होंने अपने छोटे से पारिवारिक वस्त्र व्यवसाय के लिए एक पवन उर्जा सयंत्र बनवाया तो उस अनुभव से उन्होंने अपने अन्य परिचितों के लिए भी ऐसे सयंत्र बनवाना प्रारंभ कर दिए। धीरे-धीरे इस कार्य का विस्तार होता चला गया और आज २५००० करोड़ की बिक्री वाली कंपनी के रूप में सुजलोन हमारे सामने है। इसका आज २० देशों में कारोबार है, और विश्व में अग्रणी पवन उर्जा कंपनी के रूप में जानी जाती है

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अक्षय उर्जा का लाभ कृषि और किसान को कैसे पहुँचे इस पर अब सरकार का ध्यान कुछ ज्यादा दिखने लगा है। इसलिए पहले से ही चल रही ‘कुसुम’ [किसान उर्जा सुरक्षा उत्थान महाअभियान] योजना के अंतर्गत किसानों द्वारा सोलर पंप खरीदने पर सब्सिडी ३०% से बढ़ाकर ६०% कर दी गयी है. ये सब्सिडी राज्य और केंद्र सरकारें मिलकर वहन करेंगी। इतना ही नहीं किसान को सोलर-पंप की लागत का शुरू में केवल १०% ही वहन करना पड़ेगा, बाकी भुगतान उसे बैंक से लोन के रूप में प्राप्त हो जायेगा. सोलर-इकाई एक बार स्थापित हो जाने के बाद उससे प्राप्त अतरिक्त विद्युत अगर किसान बेचना चाहे तो उसे खरीदने पर विद्युत वितरण कंपनी को सरकार पांच साल तक अपनी ओर से अलग से ५०पैसा प्रति यूनिट प्रोत्साहन राशी के रूप में देगी। डीज़ल और विद्युत संचालित पंप की जगह सोर-पंप की ओर आकर्षित करने के लिए सरकार की अगले १० वर्षों में ४८,००० करोड़ रूपए व्यय करने की योजना है.इतना ही नहीं सोर-उर्जा से प्राप्त विद्युत की क्षमता २८,२५० मेघावाट बढ़ाने का भी सरकार का लक्ष्य है, जिसमें अगले १० साल के लिए १.४ लाख करोड़ का प्रावधान किया गया है. इसके अंतर्गत किसान अपनी बंजर पड़ी भूमि पर सोर- विद्युत सयंत्र स्थापित कर सकते हैं।


अक्षय-उर्जा को लेकर की गयी इस अभूतपूर्व पहल पर विश्व प्रसिद्ध उर्जा विशेषज्ञ, नरेंद्र तनेजा का क्या कहना है देखें-‘ भारत में अक्षय उर्जा [सौर,पवन] का युग दरअसल दो साल पहले शुरू हुआ. २०१४ में सौर उर्जा का उत्पादन ३००० मेघावाट था, जिसमें गुजरात की हिस्सेदारी १००० मेघावाट से अधिक थी. आज इसका उत्पादन बढ़कर ६००० मेघावाट हो चुका है। विकासशील देश भारत से प्रेरणा ले रहें हैं. सोलर टैरिफ[शुल्क] जो कभी १२ से १६ रूपए था वह घटाकर ४.५० कर दिया है.इस प्रकार पिछले दो साल में अक्षय उर्जा के क्षेत्र में हुई पहल की वजह से भारत आने वाले दशकों में उर्जा स्वतंत्रता हासिल कर पायेगा, और आयातित तेल पर उसकी निर्भरता ख़त्म हो जायेगी. ऐसा अनुभव हो रहा है कि केंद्र सरकार भारत को अक्षय उर्जा का वैश्विक केंद्र बनाने की सोच रही है. उसके लिए जरूरी उपकरण, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है. सन २०२२ तक अक्षय उर्जा से १.७५ लाख मेघावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है.’