उस ‘राम मोहम्मद’ वाले उधम को वे भी याद कर रहे हैं, जो एक भी ‘राम मोहम्मद’ को देखना नहीं चाहते

Ram Mohammed Udham remembering Jallianwala Bagh
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उसने जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल फ्रेंसिस ओ’ ड्वायर को लंदन जाकर गोली मारी थी। उन्हें 31 जुलाई, 1940 को फांसी दी गई, उन्हीं उधम का आज 82वां शहादत दिवस है।

Priyanshu | New Delhi

उन्हें सब याद कर रहे हैं। जिस उधम ने भारतीय समाज की एकता के लिए अपना नाम बदलकर ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ रख लिया था, जो भारत के तीन मुख्य धर्मों का प्रतीक था। उसे वे भी याद कर रहे हैं, जो एक भी ‘राम मोहम्मद’ जैसी सोच रखने वाले को देखना नहीं चाहते।

जिस सेक्युलरिज्म की चाहत उधम सिंह की थी और जो उनके वारिस हैं, ये शेखुलर बताकर उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। और जब उनसे ‘उजाले की बात करोगे तो खफा हो जाएंगे क्योंकि वे उल्लू हैं, अंधेरा उनकी मिल्कियत है।’

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लल्लनटॉप के लिए जागृतिक ने लिखा है, ‘उधम सिंह जीते जी भले आजाद भारत में सांस न ले सके, पर करोड़ों हिंदुस्तानियों के दिल में रहकर वो आजादी को जरूर महसूस कर रहे होंगे।’

उधम सिंह करोड़ों भारतीयों के दिल में हैं, इसमें कोई संदेह नहीं लेकिन वो ‘आजादी’ भी महसूस कर रहे होंगे, इसमें संदेह है। शुक्र है उन्हें आजादी का स्वाद चखने का मौका नहीं मिला। वरना ‘भड़काऊ भाषण’ देने जुर्म में किसी जेल में होते।

पाकिस्तान में अनवर मसूद ने हबीब जालिब के लिए कहा है। भारत का कोई अनवर मसूद उनके लिए कहता, ‘सलाखों के पीछे सारी कौम को उधम कैदी नजर आता है। सलाखों के सामने उधम को सारी कौम कैदी नजर आती है।’

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