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राजेश पायलट : कोठी में दूध बेचने से लेकर मंत्री बनने तक का सफ़र

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Ground Report । News Desk

राजेश पायलट जिन्हें राजेश प्रसाद सिंह बिधूरी के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय राजनेता और भारत सरकार के मंत्री रहे। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का एक हिस्सा थे और लोकसभा में 2 साल तक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। राजनीति में आने से पहले वह वायुसेना में पायलट भी रहे ।

राजेश पायलट का व्यक्तित्व

राजेश पायलट का जन्म 10 फरवरी 1945 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के एक वायदपुरा नामक गांव में हुआ था। उनका जन्म निर्धन परिवार में हुआ था। 10 वर्ष की आयु में ही वह स्कूल जाने के साथ-साथ सुबह 4:00 बजे उठकर गाय और भैंसों को चारा खिलाते थे । वह बड़ी-बड़ी कोठियों में दूध भी देने जाया करते थे। आपको जानकर आश्चर्य होगा उनकी शिक्षा जिस स्कूल में हुई वह एक इंग्लिश मीडियम था। यह एक बहुत बड़ी बात है कि उस समय इंग्लिश मीडियम स्कूल भी हुआ करते थे। स्कूली शिक्षा पूर्ण होने के बाद राजेश जी वायुसेना में पायलट के रूप में कार्य करने लगे।

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कुछ समय बाद राजेश को लगा कि उन्हें समाज सेवा करनी चाहिए इसीलिए उन्होंने राजनीति में कदम रखने की ठानी। उस वक्त जब वह अपना इस्तीफा देने गए तो उनका इस्तीफा वायुसेना में स्वीकार नहीं किया गया था। इसी कारण उन्हें उस वक्त के भारत के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पास जाना पड़ा उनही के आदेश के बाद ही राजेश का इस्तीफा स्वीकार किया गया। राजेश पायल़ ने सन 1980 में लोकसभा चुनाव लड़ने की पहल करी।

राजनीति में रखा पहला क़दम

राजेश पायलट ने राजनीति में कदम रखने के लिए सबसे पहले इंदिरा गांधी के पास गए, पर इंदिरा गांधी ने उन्हें राजनीति में ना आने की सलाह दी। राजेश पायल़ के हौसले बुलंद थे वह फिर भी राजनीति में ही आना चाहते थे उन्होंने इंदिरा जी से सिफारिश भी करी। कुछ समय बाद राजेश पायलट को संजय गांधी ने राजनीति में प्रवेश के लिए बुला ही लिया।

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सबसे पहले राजेश पायलट ने भरतपुर से कांग्रेस पार्टी की ओर से चुनाव लड़ा। राजेंद्र पायलट ने जब चुनाव लड़ने के लिए रजिस्ट्रेशन कराने गए तो वहां के लोगों ने उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। फिर संजय गांधी के कहने पर राजेंद्र प्रसाद जी ने अपना नाम राजेंद्र पायलट किया। चुनाव के बाद राजेंद्र पायलट सांसद बने फिर सन 1984 में राजीव गांधी के दौर में उन्हें भूतल राज्यमंत्री बनाया गया। बाद में कश्मीर के राजा नरसिम्हा राव ने उन्हें कश्मीर का इंचार्ज भी बनाया था। कहा जाता है कि कश्मीर में अगर किसी की सुनी जाती थी तो सिर्फ राजेश पायलट की।

कुछ यूं हुआ ज़िंदगी के सफर का अंत

राजेश पायलट के बढ़ते कदमों को अभी देश के लिए बहुत कुछ करना था परंतु मात्र 55 वर्ष की आयु में एक सड़क हादसे में उनकी अकाल मृत्यु हो गई। उस समय वह गाड़ी खुद ही ड्राइव कर रहे थे। ऐसे नेता ने ना सिर्फ अपने जीवन में उन्नति दर उन्नति करी व आम लोगों को सीख भी दी कि अगर हमारे हौसले बुलंद हो तो हम कुछ भी कर सकते हैं।

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