IHM प्रिंसिपल पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, सुने जांच कर रहे डायरेक्टर का गैर जिम्मेदाराना जवाब

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जयपुर, 17 अगस्त। लगता है वसुंधरा सरकार अपने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ जांच करने के मामले में बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं है, शायद यही कारण है कि महीनों बीत जाने के बावजूद भी जयपुर स्थित टूरिज्म विभाग द्वारा संचालित होटल मैनेजमेंट संस्थान के प्रिंसिपल के. एस. नारायणन के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की फाइल कहीं दबकर रह गई है।

इस मामले में हमने संबंधित अधिकारियों से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने ढुलमुल जवाब देते हुए मामले को टाल दिया। मामले की जांच कर रहे पर्यटन विभाग में पदस्थ ज्वाइंट सेक्रेटरी राजेंद्र विजय से बात की तो उन्होंने कहा कि, कुछ दिन पहले ही उन्होंने फाइल सीनियर अधिकारी को फॉर्वर्ड कर दी है। जांच कब तक चलेगी, चलेगी भी या नहीं इसका कोई जवाब नहीं है, जबकि सारे सबूत चीख-चीख कर अपने साथ हुई ज्यादती की खुद दलील दे रहे हैं।

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हांलाकि, ये बात भी गौर फरमाने वाली है कि जांच कर रहे अधिकारी ज्वाइंट सेक्रेटरी राजेंद्र विजय खुद भी सवालों के घेरे में हैं, क्योंकि उनके विभाग से शासन-प्रशासन की सबसे अहम 46 फाइलें कुछ इस तरह से गायब हुई हैं कि मिलने का नाम ही नहीं है। ये फाइलें कब गायब हुईं, कैसे गायब हुईं किन परिस्थितियों में गायब हुईं, आसमान खा गया या धरती निगल गईं? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब न तो किसी के पास हैं और न ही कोई इस बारे में बात करने के लिए तैयार है।

बहरहाल, राजेंद्र विजय के मुताबिक उन्होंने प्रिंसिपल के. एस. नारायणन के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ी फाइल अपने उच्च अधिकारी को फॉर्वर्ड की है। इस बारे में जब हमने टूरिज्म विभाग के डायरेक्टर प्रदीप कुमार बोरार से संपर्क करने की कोशिश की तो शुरूआत में बकायदा उन्हें फोन गया। मिस्ड कॉल देखने के बाद भी उन्होंने फोन करने की जहमत नहीं उठाई।

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हांलाकि, इसके बाद भी उनसे कई बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन वसुंधरा सरकार के शासन में कुछ अधिकारी इतने व्यस्त हैं कि मानों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी न हों। खबर को पब्लिश करने से पहले भी उनसे संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन नेटवर्क इतना जालिम है कि हर शख्स को फोन लग रहा है सिर्फ टूरिज्म विभाग के डायरेक्टर को ही फोन नहीं लग रहा है।

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एक आखरी बार और उन्हें फोन किया गया। वक्त का तकाज़ा देखिए इस बार फोन लग गया लेकिन सवाल पूछने के बाद डायरेक्टर साहब इतने ज्यादा नाराज हो गए जैसे उनसे उनकी वसीयत की ही मांग कर ली हो। इस खबर के अंत में एक वीडियो है जिसमें आप टूरिज्म विभाग के अतिव्यस्त डायरेक्टर प्रदीप कुमार, जो इस वक्त छुट्टी पर चल रहे हैं उन्हें सुन सकते हैं। बातचीत के अंत में उन्होंने गरियाते हुए फोन को ऐसे रख दिया जैसे कोई मोहब्बत अचानक बेवफा हो गई हो। उनसे हुई बातचीत को आप नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक के बॉक्स में सुन सकते हैं।

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हांलाकि, बीते सप्ताह भी 9 (अगस्त 2018) टूरिज्म विभाग के अतिव्यस्त डायरेक्टर प्रदीप कुमार इस बारे में बातचीत हुई थी। इस दौरान उन्होंने अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए कहा था कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी ही नहीं है कि उन्हीं के विभाग में कार्यरत ज्वाइंट सेक्रेटरी राजेंद्र विजय की ओर से इंस्टिट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट के प्रिंसिपल के. एस. नारायणन के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों से जुड़ी कोई फाइल भेजी गई है।

एक दफ्तर की छत के नीचे एक फाइल पिछले 8 महीनों से ऐसे रेंग रही है जैसे मानों बारिश के बाद जलभराव के चलते दिल्ली की सड़कों पर लंबे जाम में गाड़िया रेंगती है। हर बात के लिए सीधे राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को ही दोषी ठहराना गलत है। ऐसा करना भी नहीं चाहिए, लेकिन जब उनके प्रशासनिक अधिकारी ही ऐसे मामलों में इतनी स्पीड से काम करते हैं जैसे नासा ने अंतरिक्ष में कोई रॉकेट लॉन्च कर दिया हो तो वसुंधरा सरकार की वाहवाही करना तो बनती है, और करना भी चाहिए।

यहां क्लिक कर सुने टूरिज्म विभाग के डायरेक्टर प्रदीप कुमार बोरार का जवाब-

प्रिंसिपल के एस नारायण पर फर्जी नियुक्ति सहित लगे हैं ये गंभीर आरोप 

1) होटल मैनेजमेंट संस्थान के प्रिंसिपल पर नियमों के विरुद्ध और बिना विज्ञापन दिए हुए ही लोगों की फर्जी नियुक्ति करने का आरोप लगाया गया है। साथ ही उन पर आरोप है कि इस मामले में उन्होंने बोर्ड ऑफ गवर्नेंस को भ्रमित किया है।

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2) प्रिंसिपल पर दूसरा आरोप है कि लाभान्वित होने के लिए उन्होंने अपने आप से ही खुदो का दो बार इन्क्रिमेन्ट कर लिया है। यह कौन सा नियम है जो कोई अधिकारी खुद ही वेतनवृद्धी या इन्क्रिमेन्ट कर ले।

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3) 200 किलो वजनी एक फोटो स्टेट मशीन संस्थान से रातों-रात ऐसे गायब हो जाती है जैसे कोई आत्मा गश्त करने शहर आई हो और फिर वापस कब्रिस्तान लौट गई हो। इन आत्मओं को न गार्ड देख सकते हैं न पुलिस। फोटो स्टेट मशीन भी आत्म बनकर ही गायब हुई जो आईएचएम की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों को नजर नहीं आई। बता दें कि इस मशीन की कीमत करीब 3,50,000 रुपये है। खास बात यह है कि इतने दिन बीत जाने के बावजूद भी आईएचएम प्रिंसिपल के.एस. नारायणन ने न तो इसकी जांच की जहमत उठाई न ही कोई कोई एक्शन लेने की जरूरत समझी।

4) माननीय जयपुर सेशन कोर्ट गायब हुई फोटो स्टेट मशीन के मामले में जांच के निर्देश दे चुका है लेकिन प्रिंसिपल साहब का रुतबा इतना ज्यादा है कि उन्हें माननीय कोर्ट के आदेशों की अवमानना का डर नहीं है। न तो उन्होंने कोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से लेने की जरूरत समझी और न ही इस पर कोई एक्शन लिया।

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5) प्राचार्या के एस नारायणन पर एक आरोप यह भी है कि उन्होंने अनियमित रूप से अपने चहेतें की नियुक्ति लेखाकार के पद पर की है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक लेखाकार के पद पर नियुक्त किए गए उनके ‘चहेते’ इस पद के लिए ओवर एज हैं। इस मामले में उन्होंने विभागीय पदोन्ती कमेटी को भी अंधेरे में रखा है।

6) प्रिंसिपल नारायणन पर यह भी आरोप है कि मिनिस्ट्री ऑफ टूरिज्म, भारत सरकार द्वारा जारी कैन्टीन के लिए 7 लाख रुपये का फंड आईएचएम के लिए आवंटित किया गया। इन पैसों से संस्थान में पढ़ाई करने वाले बच्चों के लिए कैंटिन बनवाई जानी थी लेकिन प्रिंसिपल साहब ने यह फंड खुद के उपयोग में ही ले लिया। खास बात यह है कि उन्होंने भारत सरकार को यूटिलिटी सर्टिफिकेट (UC) जारी करते हुए बताया कि कैंटिन बन गई है, बच्चें चाय-समोसा खा रहे हैं चिन्ता की बात नहीं है।

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7) इसके अलावा संस्थान में पढ़ने वाले छात्रों के लिए कैंटिन के निर्माण कार्य सहित कई अन्य चीजों में हेर-फेर और घोटाले के आरोप हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोप लगने के बावजूद भी प्रशासन कब इस मामले की जांच करेगा?

8) नियमों के मुताबिक, जिला अदालत, हाई कोर्ट और सेंट्रल एडमिन्स्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के सरकारी वकील की फीस 5,500 रुपये से 11,000 रुपये के बीच तय की गई है, लेकिन आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक प्रिंसिपल केएस नारायणन ने एडवोकेट पारस कुहाड की फर्म को एक मामले की सुनवाई के लिए 1 लाख रुपये अदा किए हैं।

9) प्रिंसिपल पर एक आरोप यह भी है कि घोर वित्तीय अनियमितताएं की हैं जैसे M/S मेसर्स राठौड़ इक्विपमेंट प्राइवेट लिमिटेड जयपुर से खराब और निम्न गुणवत्ता वाले किचन इक्विपमेंट (Kitchen equipment) खरीदें हैं। इन इक्विपमेंट की कीमत करीब 15 लाख रुपये है। होटल मैनेजमेंट में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए उपयोग में आने वाला रसोई का ये सामान इतनी घटिया क्वालिटी है कि साल दर साल खराब होता है जिससे हर बार इन इक्विपमेंट की रिपेयरिंग पर सरकार की जेब काट ली जाती है।

बहरहाल, जयपुर स्थित आईएचएम के प्रिंसिपल का कार्यकाल जितना लंबा है उससे ज्यादा लंबी फेहरिस्त उनके ऊपर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों की है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोप लगने के बावजूद भी उनके खिलाफ जांच की फाइल बीते 8 महीनों से टूरिज्म विभाग की एक ही छत के नीचे घूम रही है। इस मामले में इतना ज्यादा घालमेल समझ में आता है कि आप इस सोच में उलझ कर रह जाएंगे कि दाल में कुछ काला है या पूरी की पूरी दाल ही काली है।

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