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Raja Ram Mohan Roy: राजा राम मोहन रॉय के जीवन की 2 घटनाओं में छिपा है उनके व्यक्तित्व का राज

raja ram mohan roy Sati Pratha
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Raja Ram Mohan Roy: राजा राम मोहन राय एक प्रसिद्ध समाज सुधारक थे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महिलाओं के बारे में सोचा और उस पर कानून बनाकर सती प्रथा जैसी कुप्रथा को खत्म किया। राजा राम मोहन रॉय (Raja Ram Mohan Roy) का जन्म 22मई 1722 को बंगाल के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना भी की। ऐसे तो यह सती प्रथा को खत्म करने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन आजादी से पहले इन्होंने कई आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई। साथ ही साथ बालविवाह, कुप्रथा, आडंबर को खत्म किया। उनके जीवन में घटी कुछ घटना उनके व्यक्तित्व के बारे में बताती हैं।

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भाभी को सती होते देखना
राजा राम मोहन राय अपनी भाभी के बहुत चहेते देवर थे। वे उनकी हर जरूरत का ध्यान रखते थे और भाभी भी उनका बहुत ध्यान रखती थीं। उनके जीवन में एक समय ऐसा आया कि राजा राम मोहन राय के बड़े भाई की मौत हो गयी। उन्हें नहीं पता था कि जो भाभी उन्हें सबसे ज्यादा प्यार करती हैं वो अपने पति को खो देने पर समाज के ठेकेदारों की तरह की प्रथाओं के चलते ज़िंदा जला दी जाएंगी।

जब राजा राम के भाई की मृत्यु हुई तो वह इंग्लैंड में थे। उसी समय सतीप्रथा अपने जोरों-शोरों पर थी। उनकी भाभी सती नहीं होना चाहती थीं, लेकिन कुछ धर्म के ठेकेदारों ने उनको जिंदा जलाने में कोई कसर नही छोड़ी। जब राजा राम मोहन राय विदेश से वापस आये तो उन्हें अपनी भाभी का लिखा एक खत मिला। उसके बाद से ही राजा राम मोहन राय ने समाज के ऐसे ठेकेदारों के खिलाफ आंदोलन करना शुरू कर दिया। तभी से वे सती प्रथा खत्म करने, विधवा पुनर्विवाह के लिए काम करने पर मजबूर हुए। गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक की मदद से उन्होंने 1929 में सती प्रथा के लिए कानून बनवाया।

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अंग्रेज कलेक्टर को देसी व्यक्ति से बुरा व्यवहार करने पर लगवाई फटकार

ये बात उस समय की है जब ईस्ट इंडिया कंपनी का 1808 से 1809 के बीच शासन चल रहा था। एक बार राम मोहन राय पालकी पर सवार होकर गंगाघाट से भागलपुर शहर की ओर जा रहे थे तभी घोड़े पर निकले सैर के लिए कलेक्टर सामने आए। पालकी में पर्दा लगा था जिसकी वजह से राम मोहन राय कलेक्टर को देख नहीं पाए और आगे निकल गए।

यह देखकर अंग्रेज कलेक्टर आग बबूला हो गए। इस बात को अपना अपमान समझकर उन्होंने पालकी रुकवा ली। राम मोहन ने अपनी सफाई दी लेकिन अंग्रेजियत के रौब की वजह से कलेक्टर कुछ सुनने को तैयार नहीं थे। राम मोहन समझ गए कि यह विनम्रता काम नहीं आ रही तो फिर कलेक्टर के सामने ही पालकी में चढ़े और आगे बढ़ गए।

राममोहन राय ने 12 अप्रैल 1809 को गवर्नर जनरल लार्ड मिंटो को कलेक्टर की शिकायत कर अपने अपमान के बारे में चिट्ठी लिख बताया कि किसी अंग्रेज अधिकारी को, उसकी नाराजगी का कारण कुछ भी हो, किसी देसी प्रतिष्टित व्यक्ति को इस प्रकार बेइज्जत करने का हक नहीं है। यह एक ना सह पाने जितनी सजा के बराबर है।

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गवर्नर जनरल ने उनकी शिकायत को सुना और कलेक्टर से रिपोर्ट करने को कहा। कलेक्टर ने राममोहन राय की शिकायत झूठी बताई पर उसपर भरोसा न करके जांच कराई गई। उसके बाद न्यायिक सचिव ने कलेक्टर को फटकार लगाई की आगे से कभी देसी लोगों से बेवजह वाद-विवाद न करे।

बस ऐसे ही हमेशा अपने स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया और देश की सेवा करते करते 1833 में 27 सितंबर को इंग्लैंड के बरिस्टल में ही मेनेंजाइटिस से पीड़ित होकर राजा राम मोहन की मत्यु हो गयी, और वहीं उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया।

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