मायावती से गठबंधन न होना राहुल गांधी के कमज़ोर नेतृत्व का नतीजा है?

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न्यूज़ डेस्क।। राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों ही ये बात जानते हैं कि आगामी चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों को साथ लाए बिना कांग्रेस भाजपा को चुनौती नहीं दे पाएगी। गुजरात में हार और कर्नाटक में बमुश्किल सरकार बना पाने में कामयाब हुई कांग्रेस फिर भी सबक लेती नहीं दिखाई देती।

मप्र में मायावती से गठबंधन की ज़िम्मेदारी कमलनाथ को सौंपी गई थी लेकिन उनके पास पूरे अधिकार नहीं थे। मायावती मप्र के साथ राजस्थान में भी एक पैकेज डील चाहती थी। जिसके लिए सचिन पायलट और अशोक गहलोत तैयार नहीं थे। कमलनाथ मायावती को 40 से 30 सीटों पर मनाने में कामयाब हो गए थे लेकिन ऐनवक्त पर आए दिग्विजय सिंह के CBI वाले बयान ने सारा खेल बिगाड़ कर रख दिया। यहां पर राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े होते हैं। क्यों उन्होंने गठबंधन जैसे महत्वपूर्ण रणनीति की ज़िम्मेदारी खुद अपने हाथ में नहीं ली जबकि इस गठबंधन के केवल क्षेत्रीय नहीं राष्ट्रीय मायने हैं। क्यों राहुल गांधी आपने नेताओं को मनाने में कामयाब नहीं हो पाए? क्या राहुल गांधी का प्रभाव क्षेत्रीय छत्रपों पर नहीं है?

कर्नाटक में भी अगर कांग्रेस चुनावों से पहले ही JDS से गठबंधन करती तो सरकार बनाने के लिए इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। कांग्रेस के इस कमज़ोर रवैये का असर अन्य चुनावों पर भी पड़ेगा। उत्तरप्रदेश में रंग लाए गठबंधन से भी सपा और बसपा कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं। अगर समय रहते राहुल गांधी में फैसले लेने की क्षमता नहीं आई तो।