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Punjab CM Amrinder Singh : कुप्रबंधन की शिकार कांग्रेस के पंजाब और देश में क्या हैं मायने ? क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह भर पायेगा पंजाब ?

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कैप्टन साहब की नाराजगी कांग्रेस के लिए नुकसानदेह होगी । कांग्रेस अगर देश में कमजोर हो रही है तो इसका मुख्य वजह प्रबंधन की कमजोरी व केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ का कमजोर होना व राजनीतिक कुप्रबंधन है । जैसा कि अमरिंदर सिंह ने बताया वो 2 सालों से राहुल गांधी से नहीं मिले सोनिया जी मामले के निपटाने में असमर्थ रहीं और मैं रोज दिल्ली नहीं जा सकता । इतने बड़े समयांतराल में सब कुछ सही किया जा सकता था लेकिन सरकार भी नहीं बच सकी।

जो भी हो बाहर से आने वाले व्यक्ति को अगर आवश्यकता से ज्यादे महत्व दिया जाता है तो पार्टी में पहले से विद्यमान लोग पार्टी में असहज होने लगते हैं। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि बाहर से आने वाले अपनी पूरी टीम लेकर आएं या फिर कम से कम पार्टी में 10 साल रहकर कार्य करें तो फिर वो लोगों से पूरी तरह जुड़ पाते हैं ।

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बीजेपी में बाहर से आने वाले बड़े नेता इसीलिए बीजेपी में सही तरह से फिट हो जाते हैं क्योंकि बीजेपी बाहर से आए नेताओं को तुरंत डिसिजन मेकिंग जिम्मेदारी नहीं देती है पहले उनका इंतहान लेती है फिर पास होने पर उन्हें आगे करती है। ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस सरकार गिराने से लेकर उपचुनाव जीताकर बीजेपी को मध्य प्रदेश में स्थापित करने तक मंत्रालय नहीं पा सके । वही हार असम में हेमंत विश्वा शर्मा के मामले में देखना पड़ा मेरा मतलब 5 साल से ज्यादा अग्नि परीक्षा देना पड़ा । और ये दोनों नेता बीजेपी में अपनी पूरी टीम के साथ आए जबकि कांग्रेस में दूसरे दलों से आए कीर्ति आजाद हों राजबब्बर हों या फिर नवजोत सिंह सिद्धू सभी आए और बड़े पदों पर बिना रिजल्ट दिए स्थापित हो गए । इसका नतीजा ये रहा कि पार्टी से बड़े स्तर पर लोग दूसरे दलों में गए ।

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आसन्न चुनाव के बीचोबिच पंजाब में उपजे इस राजनीतिक संकट में कांग्रेस के सामने जहां 3 चुनौतियां वहीं आम आदमी पार्टी के पास 2 अवसर हैं –
आप कांग्रेस के लोगों को बड़े स्तर पर जोड़कर सरकार का गठन कर सकती है।

मुख्य विपक्ष होने और आक्रामक प्रचार नीति के दम पर अगली सरकार भी बना सकती है वही जो 2013 में 33 दिन वाली दिल्ली की कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार जैसा कुछ फिर उसे मॉडल बनाकर जनता को बेचकर अपनी सरकार । वैसे आम आदमी पार्टी के लिए सरकार बना पाना काफी कठिन है क्योंकि कांग्रेस के पास 77 आप के पास 22 तो 18 शिरोमणि अकाली दल के विधायक हैं । आप व अकाली मिलें व कांग्रेस के कुछ विधायक तोड़ें तो ऐसा संभव हो सकता है ।

पर केजरीवाल को इस समय यह निर्णय तुरंत लेना होगा उनका चेहरा कौन होगा ? और सरकार बनाने के लिए अविलंब जोड़ तोड़ में लगना होगा ।

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हालांकि अब समय बहुत कम बचा है लेकिन कैप्टन साहब सब नई पार्टी बनाकर अपना राजनीतिक भविष्य तलाश सकते हैं । वैसे कहावत है बूढ़ा हाथी भी 9 लाख का । कैप्टन कांग्रेस को तोड़कर व 77 विधायकों को जोड़कर भी सरकार बचा सकते थे पर ऐसा उन्होंने नहीं किया, क्यों नहीं किया ? यह अबतक उजागर नहीं हुआ है ।

ऐसी गलती कांग्रेस पहली बार नहीं कर रही है हरियाणा में तंवर और हुड्डा के बीच द्वंद में 5 साल तक संगठनों का कोई ढांचा नहीं तैयार हो सका था और चुनाव आने तक किंकर्तव्यविमुढ की स्थिति बनी रही । और अंत में तंवर चले गए । हुड्डा अंत में अपनी पूरी ताकत झोककर भी सरकार नहीं बना सके ।

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कांग्रेस दिशाहीन स्थिति में प्रयास कर रही है इस वजह से बीजेपी के कमजोर होने पर भी कांग्रेस के आने की संभावना कम होती जा रही है । बीजेपी के कमजोर होने पर क्षेत्रीय दलों के आने की संभावना बढ़ेगी । उम्मीद है महंगाई बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर होने वाले चुनावों में राज्यों में फिर से क्षेत्रीय दलों की सरकारें बनेगी और केंद्र में गठबंधन की सरकारों का जमाना फिर से आएगा ।

कुल मिलाकर कांग्रेस अब पंजाब की सियासत में हासिए पर जा चुकीं है । इस राजनीतिक संकट में अकाली दल के लिए भी उभरने का अवसर मिलेगा ये उनपर निर्भर करता है कि वो कैसा और कितना प्रभावी रणनीति के तहत् राजनीतिक परिस्थितियों का फायदा उठाते हैं ।

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