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कोरोना से ठीक हुए मरीज़ के एक बूंद खून की कीमत 3 लाख चार हज़ार रुपए

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Ground Report | News Desk

कोरोनावायरस (Covid-19) का कोई टीका अब तक बाज़ार में नहीं आया है। इज़रायल ने कृतृिम एंटीबॉडी (Israel Antibody) बनाने का दावा ज़रुर किया है लेकिन अभी तक इस पर ज़्यादा जानकारी हासिल नहीं हुई है। देश और दुनिया में प्लाज़्मा थेरैपी (Plasma Therapy) का इस्तेमाल कोरोना संक्रमितों को ठीक करने में किया जा रहा है। इस थेरैपी में कोरोना से ठीक हो चुके मरीज़ों के प्लाज़मा से कोरोना संक्रमितों का इलाज किया जाता है। पूरी दुनिया में इसको लेकर होड़ मची हुई है। इसी का लाभ उठाकर कई बायोटेक कंपनियां मुफ्त का प्लाज़मा लाखों रुपए में बेच रही हैं। प्लाज़मा में मौजूद एंटीबॉडी से महामारी के कई गंभीर मरीज़ ठीक हो चुके हैं।

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न्यूयॉर्क टाईम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्लाज़्मा में एंटीबॉडी जितनी ज़्यादा होगी, उसकी कीमत भी उतनी ही ज्यादा होगी। कई वैश्विक कंपनियां रक्त के नमूनों को मुंहमांगी कीमत पर बेच रही हैं। कैलिफोर्निया की कैटर बायोकनेक्ट ने खून की एक बूंद 26 हज़ार 6 सौ रुपए से 3 लाख 4 हजा़र रुपए तक बेची हैं। भारतीय कंपनी एडवी केमीकल ने एक नमूने के 50 हज़ार डॉलर यानी 3 लाख 80 हज़ार रुपए तक वसूले हैं। ब्रिटेन की स्कॉटिश कंपनी टिश्यू सॉल्यूशन नें एक ब्लड सैंपल के लिए 70 हज़ार रुपए तक लिए हैं।

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दुनियाभर में कोरोना से ठीक हो चुके मरीज़ मुफ्त में ही अपना प्लाज़्मा दान करते हैं लेकिन बायोटेक कंपनियां इसका फायदा उठा रही हैं और मुफ्त के सैंपल को लाखों में बेच रही हैं। कैंटर बायोकनेक्ट, एडवी जैसी कंपनियों ने मुनाफा कमाने से इंकार किया है। कैंटर का कहना है कि डोनर को खोजने , सैंपल जांच , सुरक्षा और उसे लाने-ले जाने में काफी खर्च आता है। मुंबई की बायोटेक कंपनी एडवी केमिकल ने महंगे दाम में प्लाज़मा बेचे जाने से इंकार किया है।

दुनियाभर के वैज्ञानिक बड़े पैमाने पर एंटीबॉडी टेस्ट तैयार करने में जुटे हैं। इससे सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियों को अनुमान लगाने में मदद मिलती है कि उनके क्षेत्र में कितने संक्रमित होंगे और लॉकडाउन की अभी कितनी और ज़रुरत होगी। मांग बढ़ने के साथ पैदा हुई किल्लत की वजह से इन कंपनियों की चांदी हो गई है।

भारत में कई राज्य प्लाज़्मा थेरैपी से मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी लोगों से प्लाज़्मा दान करने का आग्रह किया था। निज़ामुद्दीन मरकज़ के जमातियों ने भी अपना प्लाज़्मा दान किया था। आपको बता दें कि आईसीएमआर ने प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल पर राज्यों को आगाह किया है क्योंकि यह तकनीक पूरी तरह कारगर नहीं है और इसके कई साईड एफेक्ट भी हो सकते हैं।

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