कश्मीर के पत्रकारों के लिए पत्रकारिता जिंदगी और मौत का मामला है

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पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। पत्रकारिता वैसे भी खतरे का काम है, ऐसे में जम्मू और कश्मीर के पत्रकारों के लिए यह जिंदगी और मौत का मामला हैं। समय- समय पर, जम्मू और कश्मीर के पत्रकारों और पब्लिकेशन्स को प्रशासन द्वारा सवालों के घेरे में खड़े कर दिया जाता हैं। अब केंद्र शासित प्रदेशों के लिए नई मीडिया नीति के कारण, जम्मू और कश्मीर के पत्रकारों के लिए यह काम और भी मुश्किल होने वाला है। इस नीति का उद्देश्य “मीडिया में सरकार के कामकाज को नियमिता से दिखाना है।”

इस नीति के मुताबिक अब केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ही यह तय कर सकेगा कि “कौन सी खबर फर्जी है और कौन सी अनैतिक या एंटी नेशनल। अब प्रशासन इसके आधार पर ही पत्रकार या मीडिया संस्थान के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी। किसी भी मीडिया संस्थान के खिलाफ इसके आधार पर सरकारी विज्ञापन पर रोक लग सकती है और पत्रकार को एंटी नेशनल ठहराया जा सकता है। आगे की कार्रवाई के लिए, उनसे जुड़ी सूचनाएं सिक्योरिटी एजेंसीज को सौंप सकते है।”

नए बने केंद्र शासित प्रदेशों के पत्रकारों के समुदाय ने इस नीति की भारी आलोचना की हैं। 23 वर्षीय आकाश हसन जो घाटी में पिछले पांच सालों से फ्रीलांस पत्रकारिता कर रहे है वो कहते है कि “नई मीडिया नीति बिना रीढ़ की हड्डी है। यह स्वतंत्र पत्रकारिता का गला घोटने का प्रयास है।”

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हसन के अलावा 32 वर्षीय उमर शाह जो की साउथ एशियन इंटर प्रेस सर्विस में पत्रकार है। उनके भी इस नीति के बारे में इसी प्रकार के विचार है। वह बताते है कि “इस पूरी नीति के तहत सरकार ने कश्मीर में स्वतंत्र पत्रकारिता को कानूनी पिंजरे में रखा है।”

पिछले एक साल से, कई पत्रकारों को गैर- कानूनी गतिविधियां संशोधन एक्ट (UAPA) के अंर्तगत नोटिस और गिरफ्तार किया गया हैं।

कश्मीर प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष, मोअज़ाम मोहम्मद ने द वायर से बात करते हुए कहा कि “5 अगस्त के बाद, सरकार ने सबसे पहले संचार के सभी माध्यमों को बंद कर दिया, जिसकी वजह से प्रेस लगभग मर गया और पत्रकार अच्छे से रिपोर्ट भी नहीं कर पाए। अब नई मीडिया नीति का ऐलान कर दिया है, जो कि साफ तौर पर स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति और भाषण का उल्लंघन करती है। इस नीति के पीछे का मकसद साफ है कि सरकार जम्मू और कश्मीर की प्रेस को खत्म करना चाहती है।”

कश्मीर घाटी में पत्रकारिता पहले से काफी मुश्किलों भरी रही है। हसन कहते है कि “कश्मीर में रिपोर्टिंग करना मेरे लिए पहले दिन से ही मुश्किल है। समय- समय पर पुलिस अधिकारी हमें या हमारे परिवार के सदस्यों को फोन करके हमारे बारे में पूछते है। सिर्फ सरकार ही संपादकीय नीति को नियंत्रित नहीं करती, बल्कि उग्रवादी भी करते हैं। हालांकि यह सिर्फ पत्रकारों के लिए ही खतरा नहीं है, बल्कि उनके साथी और स्थानीय लोगों के लिए भी हैं।”

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30 वर्षीय मो. आदिल (बदला हुआ नाम) जो कि स्थानीय अख़बार के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ संस्थान के लिए फ्रीलांसिंग करते है। वह बताते है कि “मैं 2017 से इस क्षेत्र में कार्यरत हूँ, मैंने अपने साथी पत्रकारों से काफी दवाब देखा है। मेरे लिए मेरे ही जिले से रिपोर्टिंग बहुत मुश्किल है क्योंकि मैं आसानी से टारगेट में आ जाता हूँ। इसी कारण से, मैं स्थानीय रिपोर्ट नहीं करता हूँ। इस नई मीडिया नीति से काम और भी मुश्किल हो गया है।”


उन्होंने एक घटना का जिक्र किया कि “अंतर्राष्ट्रीय संस्था के लिए उन्होंने दक्षिण कश्मीर में हुई हिंसा पर एक स्टोरी की थी, जिसके बाद उसके घर की तलाशी ली गई थी।


वह बताते है कि “एक रात मैं अपने घर से लगभग 200 मीटर दूर खड़ा था। मैंने एक बड़ी गाड़ी को उस रोड़ पर जाते देखा। वर्दी पहने कुछ लोग गाड़ी से उतर कर मेरे घर की ओर गए। बाद में मुझे मेरे दोस्त का फ़ोन आया। जिसने बताया कि वो लोग पहले ही उसके घर की तलाशी ले चुके है और उसका लैपटॉप और मोबाइल वो अपने साथ ले गए। अब वो मुझसे मेरा पासवर्ड मांग रहे है।”

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“मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की। वो स्टोरी मैंने उनके कमांडर से बात करने के बाद ही कवर की थी। लेकिन वो व्यक्ति मुझ पर गुस्सा करने लगा और बोला कि मैं ही कमांडर हूँ। अगले दिन मैंने अपने एडिटर से बात की और उसके बाद अधिकारियों ने मेरा फ़ोन और लैपटॉप वापिस किया।”

आदिल उस तलाशी के बारे में बोलते है कि “मेरे जिले से मैं एकमात्र रिपोर्टर हूँ, इसलिए मुझे निशान बनाया गया। आर्टिकल 370 के हटने के बाद मैं दो- तीन रातों तक नहीं सो पाया। मुझे डिप्रेशन से निकल कर दोबारा काम करने में डेढ़ महीने लगे।”

आदिल ने लैंडलाइन की सेवा शुरू नहीं होने तक काम नहीं किया।

उमर शाह बताते है कि “इंटरनेट हमारे लिए लक्ज़री है। लॉकडाउन और संचार पर प्रतिबंध की वजह से पत्रकारों के लिए काम करना मुश्किल हो गया था। अब 2 जी की सेवा शुरू हो गई है, लेकिन यह नई मीडिया नीति स्वतंत्र पत्रकारिता को खत्म करने की कानूनी पहल है।”

Written By Kirti Rawat, She is Journalism graduate from Indian Institute of Mass Communication New Delhi.

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