भारतीय महिला

प्रतिभा पाटिल, भारतीय महिला और सामाजिक नेतृत्व

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शिवाषीश तिवारी
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भारतीय समाज को पुरुष प्रधान समाज माना जाता है। बहुत हद तक सच्चाई भी यही है। अगर ऐसा नहीं होता, तो समाज में बेटियों की यह स्थिति नहीं होती, जो दुनियाभर में है। यहां नाकारात्मक होने की जरूरत नहीं है। महिलाओं की सभी देशों में आजादी दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। पर वह आजादी इतनी नहीं है कि कोई भी पुरुष, वर्तमान की महिला आजादी से अकार्षित हो या उस आजादी को स्वयं के लिए लेना पसंद करे। यह बहुत चिंतनीये है। साथ में सवाल यह भी है कि महिलाओं को पूर्ण आजादी के लिए अभी और कितना संघर्ष करना पड़ेगा। उनके इस संघर्ष में, उनसे क्या-क्या छीना गया है और अभी क्या-क्या छीना जाना बाकी है। उनकी इस लड़ाई में कौन साथ होगा। कितने लोग उनके खिलाफ लड़ेंगे। और सबसे प्रमुख बात, यह कैसी आजादी होगी।

इस आजादी में कोई झंडा होगा। यदि होगा, तो उसे कौन, कैसे, कब और कहां फहरायेगा। यदि कभी ऐसा हुआ, तो भाषण में क्या कहा जाएगा। यह हम पुरुषों को अच्छे से केवल सोच बस लेना चाहिए। जो भी कोई इस भाषण को दे रहा होगा क्या, वह अलग-अलग भाषाओं में लिखे गए श्रृंगार रस को भी याद करेगा। यदि हां, तो ऐसी कितनी महिलाएं होगीं, जो वियोग श्रृंगार को याद करेगीं क्योंकि ज्यादातर महिलाओं का वियोग अत्याचार से उत्पंन हुआ है। सही वियोग श्रृंगार तो बहुत कम होगा। माना वियोग श्रृंगार पर भी चर्चा होगी।

पर उस महिला आजादी के दौर में कितनी महिलाएं स्वीकार करेंगी कि वियोग श्रृंगार भी होता था क्योंकि उनके पास जो इतिहास होगा, उसमें महिलाओं पर हुए अत्याचार की भरमार होगी। इसे तथ्यात्मक करने के लिए वर्तमान के आंकड़े गिनाएं जाएंगे। यह आंकड़े सच्चाई बताएंगे। यदि कोई पुरुष इसे नकारने की कोशिश करेगा, तो वह महिलाएं कहेंगी कि आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। उनका यह तर्क भी आज के पुरुषवादी समाज के नेताओं से ही आएगा क्योंकि लगभग हर चुनाव महिला आजादी और महिला सुरक्षा के नाम पर ही लड़ा जाता है। हर नेता चाहे वह पक्ष का हो या विपक्ष का महिलाओं के मुद्दे पर अपनी सुविधा के अनुसार तर्क और आंकड़े गिनाता है, और बाद में कहता है कि आंकड़े तो कभी झूठ नहीं बोलते।

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इस सब से हट कर, हमें यह भी सोचना चाहिए कि महिला आजादी की नायक कौन बनेंगी। वह महिलाएं जिन्होंने अपने समय में व्यवस्था के बड़े-बड़े राजनैतिक पदों को सुशोभित किया। यदि इस दृष्टि से आजाद हिन्दुस्तान के परिपेक्ष्य में कहा जाएगा, तो ऐसे कई नाम मिल जाएंगे। इन नामों में प्रमुख हैं- प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, प्रथम महिला राज्यपाल सरोजनी नायडू, प्रथम महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी और प्रथम महिला लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार आदि। हम बात करते है प्रतिभा पाटिल की जीवन यात्रा पर क्योंकि आज उनका जन्मदिन भी है।

उनसे महिलाओं को क्या मिला, क्या सीखा। भारतीय शासन व्यवस्था के शीर्ष पद पर पहुँचने वाली प्रतिभा पाटिल का जन्म जलगाँव के निकट ‘नदगाँव’ ग्राम में 19 दिसम्बर, 1934 को हुआ था। इनके पिता वकील थे। प्रतिभा पाटिल की नदगाँव से महामहिम राष्ट्रपति तक की यात्रा इतनी आसान भी नहीं रही, जितनी बताई जाती है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने बहुत संघर्ष किया, यह संघर्ष महिला होने के कारण और अधिक बढ़ जाता है। उनके करियर की शुरुआत वकालत के पैतृक करियर से हुई। वह मात्र 27 वर्ष की आयु में जलगांव से विधायक चुनी गई।

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सन- 1967 से 1972 तक, उन्होंने शिक्षामंत्री के रूप में सेवा दी। इस दौरान उन्हें शिक्षा, स्वास्थ और ग्रामीण विकास से संबंधित कई कार्य किये. 2004 में वह राजस्थान की राज्यपाल बनी, और 2007  को भारत के 12 वें राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला। इससे पहले उन्होंने महाराष्ट्र सरकार में शहरी विकास और आवास तथा राज्यसभा की उप-सभापति, महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष, राष्ट्रीय शहरी सहकारी बैंक संस्थाओ की निदेशक, भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ परिषद की सदस्य रह चुकी हैं।

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उन्होंने महिलाओं व बच्चों के कल्याण और समाज के उपेक्षित वर्गों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, सामाजिक न्याय की दृष्टि के साथ शासकीय योजनाओं के माध्यम से। उन्होंने नेत्रहीन और अन्य शारीरिक विकलांग बच्चों के लिए जलगांव में एक औद्योगिक प्रशिक्षण स्कूल भी स्थापित किया है। बहुजन औऱ पिछड़ वर्गे के बच्चों के लिए विशेष रूप से स्कूल स्थापित किया। इन्हें अमरावती में कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना का श्रेय भी मिला है।

प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रपति रहते हुए सर्वाधिक विदेश यात्राएं की, जिसके लिए उन पर कई तरह के आरोप लगाए गए। इसके अलावा भी यदि उनकी अब तक की सम्पूर्ण यात्रा को देखा जाए, तो महिला होने के कारण जरूरत से ज्यादा आरोपों-प्रत्यारोपों का सामना करना पड़ा।

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रजिया सुल्तान से लेकर इंदिरा गांधी और उमा भारती, जय ललिता से लेकर मायावती तक सभी को सामान्य से ज्यादा लांक्षनों का इसलिए सामना करना पड़ा क्योंकि वह महिला हैं। यही कारण है कि एक ही समय में इंदिरा गांधी और विजयाराजे सिधिंया को राजनीति में अपने ही लोगों का विरोध झेलना पड़ा। बाद में भले ही कुशल नेतृत्व देने में सफल रहती। पर एक ही समय में, एक ही दल में और एक ही पद पर दो अलग महिला बैठती हैं, उमा भारती और वशुंधरा राजे। पर उमा भारती सफल नहीं हो पाती है।

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इससे एक और बात स्पष्ट होती है कि महिला होना और वंचित परिवार से होना, आज के समाज में भी गुनाह से कम नहीं है। सभी जानते हैं कि राजनीति में महिलाओं को कैसे खाना पूर्ति के लिए पदों से नबाजा जाता है। ग्राम पंचायत, नगर पालिका, विधानसभा, संसद से लेकर बड़े पदों को उन्नत करने वाली महिलाओं का अधिकतर प्रतिनिधित्व परिवारिक जन करते हैं। लेकिन हमनें कभी नहीं देखा होगा कि किसी पुरुष नेता का प्रतिनिधित्व परिवार की महिला कर रही है। यदि ऐसे उदाहरण हैं भी, तो न के बराबर। इस सब के बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र की महिलाओं ने आम महिलाओं के लिए काफी हद तक दुनिया खोली है, और दिन-प्रतिदिन खुलेगी।

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