Home » सरकारी आतंकवाद : मुस्लिम नौजवानों को फर्ज़ी मुक़दमों में फंसाना पुलिस का पुराना हथियार है

सरकारी आतंकवाद : मुस्लिम नौजवानों को फर्ज़ी मुक़दमों में फंसाना पुलिस का पुराना हथियार है

सरकारी आतंकवाद : मुस्लिम नौजवानों को फर्ज़ी मुक़दमों में फंसाना पुलिस का पुराना हथियार है
Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

इस देश में राजनैतिक कर्णधार अपने फ़ायदों के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हैं। पुलिस इतनी ज़्यादा मज़बूत हो चुकी है कि वास्तव में यह देश एक पुलिस राज्य बन चुका है। हर वैध-अवैध के मालिक कर्णधार ऐसे देश प्रेमी हैं जो वतन को बेचकर खा रहे हैं। हमारा देश भारत ही दुनियां का एक मात्र ऐसा देश है जहां बेगुनाह को जेल और अपराधियों कुर्सी दी जाती है। अपराधियों को रिहा कर बेगुनाहों को फर्ज़ी मुक़दमों में फसा कर जेल पहुंचा दिया जाता है। अधिकतर फर्ज़ी मुक़दमों का जाल इस देश के मुस्लिम नौजवानों पर ही डाला जाता रहा है।

पुलिस ऐसा क्यों करती है ? एक तो मुस्लमानों के ख़िलाफ़ उसके मनो-मस्तिष्क में कूट-कूटकर भरी गई नफ़रत और दुश्मनी, दूसरे अपनी अकर्मण्यता पर परदा डालने के लिए। पुलिस जब ये ग़ैर क़ानूनी काम करती है तो उसे सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त होता है।

ये सरकारी आतंकवाद है। ये सरकारी आतंकवाद कब समाप्त होगा, कैसे समाप्त होगा, इसपर विचार करने की ज़रूरत है। जब तक इस सरकारी आतंकवाद के प्रति गहन विचार-विमर्श नहीं किया जाएगा, देश में वास्तविक सुख-शान्ति और विकास एक सपना ही रहेगा। सरकार इस बात को जितना जल्दी समझ ले, उतना ही देश के हित में ये अच्छा क़दम होगा।

इसी कढ़ी में ताज़ा उदाहरण डॉ. कफ़ील ख़ान का है….

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पिछले साल दिसंबर में कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने के मामले में 29 जनवरी को डॉ. कफ़ील ख़ान को गिरफ़्तार किया गया था। 10 फरवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद रिहा करने के बजाय उन पर रासुका लगा दिया गया था।

1 सितंबर 2020 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले नौ महीने से उत्तर प्रदेश की एक जेल में बंद डॉ. कफील खान पर लगे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के आरोपों को हटाने और उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया ।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह आदेश डॉ. कफील की मां द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दी, जिसमें उन्होंने डॉ. कफील को गैरकानूनी तौर पर हिरासत में रखे जाने का आरोप लगाया था।

चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह खंडपीठ ने फिलहाल मथुरा जेल में बंद कफील खान पर लगे रासुका के आरोपों को हटाने का आदेश दिया। पीठ ने अलीगढ़ जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 13 फरवरी, 2020 को जारी हिरासत के आदेश और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उसकी पुष्टि को खारिज कर दिया। इसके साथ ही रासुका के तहत खान की हिरासत अवधि दो बार बढ़ाने को भी हाईकोर्ट ने गैरकानूनी घोषित किया है।

बीती 29 जनवरी को उत्तर प्रदेश के विशेष कार्य बल (एसटीएफ) ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ एएमयू में दिसंबर में कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने के मामले में डॉ. कफील को मुंबई हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया था। वहां वे सीएए विरोधी रैली में हिस्सा लेने गए थे।

READ:  जल, जंगल और ज़मीन को सहेजकर विकास की राह चल पड़ी हैं पहाड़ी महिलाएँ

इससे पहले साल 2017 में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुए हादसे के बाद डॉ कफील खान को इसका जिम्मेदार ठहराते हुए सस्पेंड कर दिया गया था। उन्हें 8 महीने से ज्यादा जेल में भी रहना पड़ा था। लेकिन उनके खिलाफ कोई भी पुख्ता सबूत कोर्ट में नहीं दिया गया। जिसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।

डॉ. कफील का मामला एक चर्चित मामला रहा है। अब आप सोचिए गर एक बेगुनाह डॉक्टर को पुलिस और सरकार मिल कर फर्ज़ी केस में फंसा कर 9 महीनों तक जेल में डाल सकती है, तब वे मुस्लिम नौजवानों का क्या हाल होता है, जिनके बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता। ऐसे हज़ारों मुस्लिम नौजवानों को पुलिस ने फर्ज़ी मुक़मदों में फंसा उनका पूरा जीवन एक अंधकार में डाल दिया ।

आतंकवाद के नाम पर फर्ज़ी मुक़दमों में फंसा कर इस देश की पुलिस ने हज़ारों बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों का जीवन ख़त्म कर डाला। 1993 में मुंबई बम ब्लास्ट मामले में बेगुनाह होते हुए भी एक दशक तक जेल की सज़ा काटने के बाद जब कोर्ट ने अब्दुल वाहिद शेख को बेहुनाह बताते हुए रिहा किया तो वो मानसिक तौर पर टूट चुके थे। ऐसे ही सैकड़ों बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों की दास्तान पर उन्होने ‘बेगुनाह कैदी’ नाम की एक बेहद ही चर्चित पुस्तक लिख डाली।

इस किताब में पुलिस का वो क्रूर चेहरा देखने के मितला, जो आपका क़ानून और न्याय व्यव्स्था पर से विश्वास ख़त्म ही कर देगा। इस किताब में उन्होंने बेहद ही आसान भाषा में समझाया है कि पुलिस किस-किस तरह मुस्लिम नौजवानों को फर्ज़ी मुक़दमों में फंसा कर उनके जीवन को अंधकार में ढकेल देती है। पुलिस थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कर आपका बयान लेती है और फिर शुर होती है जेल में पुलिस के यातनायों की कहानी। इस विषय को व्यापक स्तर पर समझने के लिय आपको किताब ‘बेगुनाह कैदी’  ज़रूर पढ़नी चाहिए।

वहीं इसी कड़ी में एक और चौकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है…

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने देश की जेलों में बंद कैदियों से जुड़े आंकड़े जारी किए हैं, जिनसे पता चलता है कि  जेलों में बंद दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों की संख्या देश में उनकी आबादी के अनुपात से अलग है जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और उच्च जाति से जुड़े लोगों के मामले में ऐसा नहीं है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019 के आंकड़ों से पता चलता है कि इन हाशिए पर खड़े समूहों में से मुस्लिम ऐसा समुदाय है, जिससे जुड़े जेल में बंद कैदी दोषियों के बजाय विचाराधीन अधिक हैं।

साल 2019 के अंत में देशभर की जेलों में कैद सभी दोषियों में से दलित 21.7 फीसदी हैं। जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में अनुसूचित जाति से जुड़े लोगों की संख्या 21 फीसदी है। 2011 के जनगणना के अनुसार देश में इनकी आबादी 16.6 फीसदी है। आदिवासियों के मामले में यह अंतर समान रूप से बड़ा है।

READ:  Taliban update :क्या सच में अखुंदजादा को उतार दिया गया मौत के घाट, मुल्ला बरादर को भी बनाया गया बंधक?

जेलों में बंद दोषियों में से अनुसूचित जाति से जुड़े लोगों की संख्या 13.6 फीसदी है, जिनमें से 10.5 फीसदी विचाराधीन कैदी हैं। 2011 की जनगणना में इनकी आबादी 8.6 फीसदी थी। 14.2 फीसदी की आबादी के साथ दोषी ठहराए गए मुस्लिमों की संख्या 16.6 फीसदी है लेकिन इनमें से 18.7 फीसदी विचाराधीन कैदी हैं।

पुलिस रिसर्च एंड डेवलेपमेंट के पूर्व ब्यूरो चीफ एनआर वासन का कहना है,

‘इन आंकड़ों से पता चलता है कि हमारी आपराधिक न्यायिक प्रणाली न सिर्फ धीमी है बल्कि इसमें गरीबों के खिलाफ मामले भरे पड़े हैं। जो लोग अच्छे वकील रख सकते हैं, उन्हें आसानी से जमानत मिल जाती है और न्याय भी मिल जाता है लेकि गरीब आर्थिक अवसरों की कमी की वजह से छोटे-छोटे अपराधों में ही फंसा रह जाता है।’

अब सवाल ये है कि डॉ.कफील जैसे चर्चित मामले हर बेगुनाह क़ैदी के नहीं बन सकते। आज भी देश की जेलों में हज़ारों मुस्लिम नौजवान बेगुनाह होते हुए भी सज़ा काट रहे हैं। न जाने कितने नौजवान दशकों जेल में रहे और बाद में कोर्ट ने उन्हें निर्दोष बताते हुए बरी किया। पुलिस का ये हथियार कोई नया नहीं है। पुलिस हमेशा से ही मुस्लिम नौजवानों को फर्ज़ी मुक़दमों में फंसा कर उन्हें मानसिक तौर से बीमार बनाती रही है।

हालही में दिसंबर में CAA-NRC में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन के बाद से जिस तरह पुलिस ने मुस्लिम नौजवानों को सीधी-सीधी गोली मार कर मौत के घाट उतारा उससे पुलिस और सरकार का असली चेहरा सबके सामने आया है। ख़ासकर कर के यूपी में सरकार और पुलिस दोनों ने मिलकर मुस्लिम नौजवानों पर फर्ज़ी मुक़दमों का एक अंबार लगा कर उनसे जेल भर दी है। आज भी हज़ारों नौजवान फर्ज़ी मुक़दमों में जेल में फंसे हुए हैं।

अब सवाल ये है कि क़ानून का मज़ाक बनाने वाली पुलिस और क़ानून का क़त्ल करवाने वाली सरकार को सरकारी आतंकवाद न कहा जाए तो क्या कहा जाए?

मध्य प्रदेश उपचुनाव: बीजेपी को हराने के लिए ये है कांग्रेस का मास्टर प्लान

Ground Report के साथ फेसबुकट्विटर और वॉट्सएप के माध्यम से जुड़ सकते हैं और अपनी राय हमें Greport2018@Gmail.Com पर मेल कर सकते हैं।