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देश में एक साथ चुनाव चाहते हैं PM मोदी… जानिए आखिर कितना संभव है ये

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नई दिल्ली, 11 जुलाई। 

इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि “एक देश एक चुनाव” के मुद्दे पर लगभग सभी दल बंटे हुए हैं। विधि आयोग के परामर्श के दौरान नौ दलों ने ये  कहकर इसका विरोध किया कि एक साथ चुनाव होना संविधान के सिद्धांतो के खिलाफ और अव्यवाहरिक है। जबकि चार राजनितिक दलों ने इसका समर्थन किया है। बीजेपी अभी इस पर विचार कर रही है, जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही इसकी पैरवी की थी। अपनी चुप्पी के बाद कांग्रेस ने अब इसका विरोध करना शुरू कर दिया है।

देखा जाए तो एक साथ चुनाव होने के कई फायदे भी हैं, जैसे चुनावों में होने वाले खर्च में कमी आएगी और सरकारें चुनावी प्रचार में लगाने वाले समय को सरकार चलाने में लगा पाएंगी। लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है की एक साथ चुनाव होना वास्तविक रूप से थोडा मुश्किल होगा। कई राजनितिक दलों का कहना है कि खबरों की रफ़्तार वाले इस समय में, राष्ट्रीय मुद्दो को राज्य के मुद्दो से ऊपर तवज्जों मिलेगी, और इसका उलटा भी संभव है।

विधानसभा और लोकसभा के चुनावों का साथ होने से कार्यकाल बढ़ाया या घटाया भी जा सकता है। एक साथ चुनाव होने की इस प्रक्रिया को दो समूहों में बांटा जा सकता है। जैसे 2019 के आसपास जिन राज्यों में चुनाव होने हैं उनके चुनाव 2019 में हों और 2024 में 2024 में चुनाव हों।

अगर कभी सदन में अविश्वसनीय प्रस्ताव की स्थति आती है तो प्रस्ताव रखने वाले दल को इसका विकल्प देना चाहिए कि आगे सरकार कौन, कैसे और कितने समय के लिए बनाएगा। और अगर मध्य कालीन चुनाव होते हैं, तो चुनी हुई सरकार को पांच वर्ष की जगह शेष समय के लिए ही सरकारी बनानी पड़ सकती है।

अभी इसकी स्थिति काफी धुंधली सी है। लेकिन चुनावों में भ्रष्टाचार और काले धन से निजात पाने के लिए “एक राष्ट्र एक चुनाव” के अलावा भी कई और तरीके निकाले जा सकते हैं।

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