परवीन शाकिर : वो शायरा जिसने अपनी शायरी में बीवी, मां और एक औरत के मतलब को समझाया..

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Ground Report | Newsdesk

परवीन शाकिर ने अपनी शायरी में ज़िंदगी के अलग-अलग मोड़ों को लय दी है। उनकी कविताओं में एक लड़की के ‘बीवी’, ‘मां ‘ और एक ‘औरत’ तक के सफ़र को साफ़ देखा जा सकता है। वह ज़ाहिर तौर एक बीवी के साथ मां भी हैं, शायरा भी और रोज़ी कमाने वाली औरत भी।

मां होने के अनुभव पर तो कई महिला कवियों ने कलम चलाई है लेकिन पिता होने के अपने अनुभव पर किसी पुरुष कवि की नज़र नहीं पड़ी है। उन्होंने वैवाहिक प्रेम के जितने आयामों को छुआ है उतना कोई पुरुष कवि चाह कर भी नहीं कर पाया है।  शायरी की दुनिया पर मर्दाना हुकूमत हमेशा रही। हमारी गुफ्तुगू में जब कभी कोई बात हुई तो मीर, ग़ालिब, इकबाल, फैज़, मजाज़, जोश, साहिर जैसे नामों का ही बोलबाला रहा। 

परवीन ने लेखन की शुरुआत में ग़ज़ल और नज़्म दो सूरतों में लिखना शुरू किया। इसके साथ साथ अखबारों में कॉलम लिखने में उनकी दिलचस्पी थी और अंग्रेजी अध्यापिका होने की वजह से अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में लिखना उन्हें अच्छा लगता था। शुरुआत में उन्होंने अपना तख़ल्लुस (शायरी में इस्तेमाल किया जाने वाला उपनाम) ‘बीना’ इस्तेमाल किया। परवीन शाकिर को अपनी नज़्मों और गज़लों से बेपनाह मक़बूलियत हासिल हुई।

परवीन शाकिर का जन्म पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के कराची शहर में 24 नवंबर 1952 को हुआ था। परवीन शाकिर ने 1966 में अपनी मैट्रिकुलेशन, 1968 में इंटरमीडिएट, 1970 में बीए (ऑनर्स) और 1972 में कराची विश्वविद्यालय से एमए (अंग्रेजी) किया। 1982 में उन्होंने सीएसएस पास किया और पूरे पाकिस्तान में दूसरी रैंक हासिल की।

परवीन शाकिर ने दो स्नातक डिग्री हासिल की, एक अंग्रेजी साहित्य में और दूसरी भाषा विज्ञान में। उन्होंने अतिरिक्त रूप से बैंक प्रशासन में डिग्री ली। वह सिविल सेवा में शामिल होने से पहले सीमा शुल्क विभाग में लंबे समय तक प्रशिक्षक थीं। 1986 में उन्हें इस्लामाबाद में फेडरल ब्यूरो ऑफ राजस्व के दूसरे सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था।

परवीन की शायरी का खुले दिल के साथ स्वागत हुआ। उसकी असमय मृत्यु के बाद भी आज उन्हें उर्दू की सबसे बेहतरीन और एक खास शायरा माना जाता है। वह स्वाभाविक रूप से संवेदनशील और रचनात्मक कल्पना की धनी थीं। परवीन ने बहुत ही कम उम्र में लिखना शुरू कर दिया था और उनमें फ़ैज़ और फ़राज़ की झलक ज़रूर मिलती है लेकिन वह उनकी नकल नहीं करतीं।

अपनी शायरी में औरतों को अलग मुक़ाम दिलाने वाली यो शायरा 1994 में हमेशा के लिए खामोश हो गईं। कितना छोटा सा सफर है ये, और इसमें अगर उसकी शायरी पर बात की जाए तो उसकी उम्र 20-25 साल से ज्यादा नहीं लगती। आज परवीन शाकिर तो नहीं मगर उनकी शायरी के ज़रिए हम उनको महसूस कर सकते हैं।