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ऑस्कर शिंडलर : हिटलर के कहर से 1100 यहूदियों की जान बचाने वाला शख़्स

Oskar Schindler
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कहानी ऑस्कर शिंडलर की : इतिहास हो या वर्तमान जब भी हिटलर का ज़िक्र किया जाएगा तो उसकी बर्बता की कहानियों का भी ज़िक्र ज़रूर होगा। इतिहास में अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात ज़ालिम हिटलर ने 8 लाख से अधिक यहूदियों को बड़ी ही क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया था।

हिटलर ने अपने शासनकाल में यहूदियों को मारने का फरमान जारी कर रखा था। हिटलर के इस आदेश का पालन करते हुए उसके सैनिक यहूदियों को मौत के घाट उतारने में पल भर भी नहीं सोचते थे। हिटलर के सैनिक यहूदी बस्तियों में घुसकर चुन-चुनकर यहूदियों को इतनी बर्बता से मौत के घाट उतारते थे कि इंसान की रूह कांप जाए।

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हिटलर द्वारा यहूदियों पर ढ़ाए जा रहे ज़ुल्म के समय वहां एक ऐसा भी इंसान भी हुआ, जो यूं तो ‘नाज़ी पार्टी’ का हिस्सा था, किन्तु इंसानियत उसके लिए नाज़ी पार्टी से बड़ी थी। उस शख्स ने अपनी जान जोखिम में डालते हुए करीब 1100 यहूदियों की मदद कर उन्हें मौत के चंगुल से बचाया ।

कौन था वो शख्स, जिसने ने 1100 यहूदियों को क्यों और कैसे बचाया ? आइए जाने…

उस शख्स का नाम ऑस्कर शिंडलर था । वो पेशे से एक उद्योगपति और नाज़ी था। ऑस्कर शिंडलर के नाम से मशहूर हुए इस शख्स का जन्म 8 अप्रैल 1908 को हुआ था। शिंडलर बचपन से ही एक होनहार व्यक्ति था। वो हिटलर से काफी प्रभावित था और हिटलर के साथ जुड़कर काम करने की इच्छा ज़ाहिर किया करता था। जब 1930 के आस-पास में हिटलर ने सत्ता की कमान संभाली तो पूरा आर्थिक- राजनीतिक परिदृश्य ही बदल गया। इसी के साथ ऑस्कर शिंडलर भी इसी क्रम का हिस्सा बन गया।

शिंडलर असल में हिटलर के आने के बाद बदली हुई परिस्थितियों का फायदा उठाना चाहता था। अपनी इस कोशिश में वह काफी हद तक सफल भी हुआ। अपने तेज़ दिमाग़ और शातिराना चालों के चलते वो नाज़ी पार्टी का सदस्य बनने में कामयाब रहा।

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चूंकि, उसे तेज़ी से आगे बढ़ना था और नाज़ी पॉवर का इस्तेमाल कर व्यापार फैलाकर पैसा बनाना था, इसलिए उसने धीरे- धीरे बड़े नेताओं और सैन्य अफसरों से संपर्क स्थापित करने शुरु कर दिए। इन्हीं संपर्कों के दम पर उसने ब्लैक मार्केट में कदम रखा और खूब मुनाफा कमाया। पैसे का इस्तेमाल कर उसने सैन्य अफसरों को अपना चंगुल में काफी मज़बूती से फंसा लिया था।

दूसरे विश्वयुद्ध में बदली ज़िंदगी

इसी बीच सितंबर 1939 में जर्मनी ने पोलैंड पर हमला करके दूसरा विश्वयुद्ध छेड़ दिया। कहते हैं बस यही वह समय था, जहां से ऑस्कर की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। इस युद्ध से मुनाफा कमाने के लिए वह अपनी पत्नी को छोड़कर क्रैकोव शहर आ गया। वहां जर्मन सेना के लिए बर्तन बनाने की बात कहकर वह एक यहूदी फैक्ट्री का मालिक बन गया।

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शुरुआत में उसके पास काम करने के लिए कम लोग थे, जिन्हें वह समय के साथ बड़ा चाहता था। इसी के तहत उसकी मुलाकात इजैक स्टर्न नाम के एक यहूदी अकाउंटेंट से हुई। स्टर्न ने उसको एक स्थानीय यहूदी बस्ती के बारे में बताया, जहां से उसे अपनी कंपनी के लिए मजदूर मिल सकते थे।

आस्कर शिंडलर के लिए यह अच्छी खबर थी, जिसकी मदद से वह अपने लिए ज्यादा कर्मचारी जुटाने में कामयाब हो गया। नाज़ी सेना यहूदियों की बस्तियों में बर्बता से क़त्लेआम कर रही थी । शिंडलर को ये पसंद नहीं आ रहा था। शिंडलर ने अपने यहूदी अकाउंटेंट की बात मानते हुए उन बस्तियों से मज़दूर निकाल कर अपनी फैक्ट्री में मज़दूर बनाकर रख लिए।

हिटलर का अत्याचार जब चर्म पर पहुंच गया

शुरुआत में शिंडलर ने यहूदी मजदूरों को इसलिए अपनी फैक्ट्री में रखा था, क्योंकि वे सस्ते थे। लेकिन,जैसे-जैसे वह उनके साथ काम करने लगा, उसे इनसे प्यार होने लगा। उसके अंदर का इंसान जाग गया। वो अपने मज़दूरों को नाज़ियों के हमलों से बचाने में मदद भी करने लगा।

वहीं, हिटलर का अत्याचार अपने चर्म पर पहुंच चुका था। यहूदियों को भेड़-बकरियों की तरह मौत के घाट उतारा जाने लगा। घरों में आग लगाकर बूढ़े यहूदियों को बेकार बताकर छत से फेंक कर मार दिया जाता या फिर गोली से उनकी हत्या कर दी जाती।

दिन दहाड़े बच्चियों और औरतों के साथ बलात्कार किए जा रहे थे। यही वजह थी कि शिंडलर को अब हिटलर खराब लगने लगा था, जिसकी नाजी पार्टी में शामिल होने के लिए उसने बहुत पापड़ बेले थे। हिटलर के इस अत्याचार को देख उसका हिटलर से मोह भंग हो गया था।

जब यहूदियों को निकालकर यातनागृहों में भेजने का मिला आदेश

सच तो यह भी था कि शिंडलर खुलेआम हिटलर से मुकाबला नहीं कर सकता था। यही कारण था कि उसने तय किया कि वह शांत रहते हुए ज्यादा से ज्यादा यहूदियों को अपनी फैक्ट्री में काम देगा।

इससे वह हिटलर की नज़रों से बच जाएंगे और वह उन्हें बचाने में कामयाब हो जाएगा। अपनी इसी योजना के तहत उसने यहूदियों को फैक्ट्री में काम देना शुरु कर दिया। वह भूल गया कि कोई यहूदी मजदूर फैक्ट्री में काम करने के काबिल है या नहीं।वह तो बस ज्यादा से ज्यादा यहूदियों को बचाने की कोशिश में था।

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इसी बीच हिटलर ने क्रैकोव शहर से यहूदियों को निकालकर यातनागृहों में भेजने का आदेश दे दिया। इसके चलते ऑस्कर की फैक्ट्री के मजदूरों को भी ट्रेन में लाद दिया गया। ट्रेन चलने ही वाली थी, तभी वह दौड़कर स्टेशन पहुंचा और एक नाज़ी ऑफिसर को यकीन दिलाया कि ये मजदूर उसकी फैक्ट्री और जर्मन सेना के लिए बहुत जरूरी काम कर रहे हैं।नजीजा यह रहा कि मजदूर छोड़ दिए गए।

जब 1944 में दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हुआ

1943 के  आते-आते नाजियों की क्रूरता और बहुत बढ़ गई थी। हिटलर का आदेश था कि यहूदियों को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया जाए। इसी उद्देश्य से क्रैकोव शहर के यहूदियों को प्लास्जोव नाम के श्रम कैंप में भेजा जाना था। इस काम के लिए एमन गोथ नाम के एक नाजी अफसर को नियुक्त किया गया था। ऑस्कर ने उससे संपर्क स्थापित किया और घूंस देकर अपनी फैक्ट्री के मजदूरों को श्रम कैम्प में जाने से बचा लिया।

1944 में दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हुआ। 9 मई 1945 को सोवियत रूस की सेना ने सारे लेबर और डेथ कैंप को मुक्त कर दिया। उधर हिटलर ने पहले ही खुद को गोली मार ली थी । साथ ही एमन गोथ को भी फांसी दे दी गई।

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इस तरह ऑस्कर शिंडलर शुरू में भले ही एक मुनाफाखोर उद्योगपति रहा हो, लेकिन अंत में आकर वह एक सच्चा इंसान हो गया। अपने मजदूरों को बचाने के लिए उससे जो बन पड़ा उसने वह किया। उसने अपना सर्वस्व बेचकर यहूदियों को बचाया। इसलिए आज भी यहूदियों द्वारा उसको पूजा जाता है।

9 अक्टूबर, 1974 को जर्मनी के हिल्डेशम में ऑस्कर शिंडलर का निधन हो गया। उनको जेरूसलम में सीयोन पर्वत पर दफनाया गया। इस तरह से सम्मानित होने वाले नाजी पार्टी के वो एकमात्र सदस्य हैं। यहूदी

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