पार्टी के बढ़ते वर्चस्व को बनाए रखना कांग्रेस की बड़ी चुनौती, केसीआर के थर्ड फ्रंट की भूल से भाजपा को मिलेगा सीधा फायदा !

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कार्तिक सागर समाधिया। भोपाल

हाल ही में हुए पांच विधानसभा चुनाव में देश के तीन बड़े राज्यों में कांग्रेस की वापसी ने सिद्ध कर दिया है कि भाजपा का कांग्रेस मुक्त चुनावी नारा पांच साल के भीतर जनता ने नकार दिया है लेकिन कांग्रेस को इन राज्यों की जीत से सीख भी लेनी होगी कि बड़े राज्यों में पार्टी की वापसी जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की तरफ इशारा है। उन वादों को पूरा करना है जिसे कांग्रेस ने अपनी रैलियों में जनता से किए, साथ ही इस उम्मीद को बनाए रखने के लिए कांग्रेस को लगातार जनता से संवाद और भरोसा कायम करना होगा।

कांग्रेस के पास अब सबसे बड़ी चुनौती जनता का पार्टी के तरफ विश्वास बनाए रखना है जिस वजह से बाकि आगामी लोकसभा- विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपना जीत का ग्राफ बढ़ा सके। भाजपा के साढ़े चार साल के कार्यकाल पर अगर नजर डाले तो जनता की उम्मीदों पर खरा न उतर पाना है जिसकी वजह से पिछले लोकसभा में कांग्रेस से मोहभंग होकर जनता ने मोदी की भाजपा पर भरोसा जताया था, सबसे बड़ी मुश्किल पैदा कर सकती है। लेकिन सरकार के अंतिम कार्यकाल तक जनता अब अपने विशलेषात्मक नजरिए के तहत वोट कर रही है।

छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस पार्टी का जीत का अंतर भी बीजेपी से बिल्कुल करीब का है। कुछ सीटों के गणित की बदौलत ही कांग्रेस राजस्थान और मध्यप्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब हो पाई है। वहीं अगर लंबे अंतराल के बाद कांग्रेस को एक साथ तीन बड़े राज्यों में सरकार बनाने का मौका मिला है तो उसे जनता में अपना विश्वास दृढ़ करना होगा यही पार्टी की पहली चुनौती और प्राथमिकता होनी चाहिए। वहीं देश की पुरानी पार्टी होने के नाते बुनायादी मुद्दों के तहत जनता से सीधा संपर्क साधाने में सक्षम है। दरअसल, 2014 में विकास के मुद्दे पर सत्ता में आई मोदी सराकार 2019 आते धर्म की राजनीति और अपने कुछ आर्थिक बुनियादी गलत फैसलों से बुरी तरह घिर गई। लगातार किसानों और युवाओं की समास्याओं को अनदेखा कर मोदी सरकार ने जनता का विश्वास खोया ही है। पिछले कुछ विधानसभा चुनाव से भी स्थिति साफ नहीं रही कि मतदाता आगामी लोकसभा में किस पार्टी पर अपना विश्वास जताएगा। वहीं कांग्रेस राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद तीन राज्यों के सफल नतीजों से वापस अपने पैरों पर खड़ी नजर आ रही है।

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वहीं अब आगामी लोकसभा को ध्यान में रखते हुए गठजोड़ की राजनीति पर ध्यान दिया जाए तो हमें तीन चीजों पर नजर डालनी होगी। पहली मोदी सरकार का पांच साल का कार्यकाल जिससे जनता खुश है या नहीं। दूसरा कांग्रेस और अन्य दलों का यूपीए (यूनियन अपोजिशन फ्रंट) कितना जनता के बीच प्रभावशाली और आगामी लोकसभा में जीत तय करने और जनता का भारोसा कायम कर सरकार बनाने में कामयाब होगा । वहीं तीसरा केसीआऱ का क्षेत्रीय दल को मिलाकर तीसरे विकल्प के तौर पर किया जाने वाला गठजोड़ कितना मायने रखेगा। अगर केसीआर क्षेत्रीय दल के साथ मिलकर बीजेपी और कांग्रेस को चुनौती देने की सोच रही है तो उसे उन क्षेत्रिय दल के नेताओं की महत्वांकक्षाओं  पर भी काबू पाना होगा।

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हम पहले बात कर लेते हैं कि कांग्रेस की तीन राज्यों की सफलता के बाद बढ़ते वर्चस्व को ध्यान में रखते हुए बीजेपी को अपना आगामी एजेंडा जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए। बीजेपी को अपनी राजनीतिक शैलियों और मुद्दों में भी बदलाव करने की जरूरत है। अगर बीजेपी अभी भी एक वर्ग की राजनीति को अपना हथियार बनाकर जनता के बीच जाएगी तो उसको भारी असफलता झेलनी पड़ सकती है। क्योंकि वर्गीकरण की राजनीति से अब जनता ऊब सी गई है।

वहीं बीजेपी जनता के सामने उन मुद्दों को लेकर जाए जिससे वो यह विश्वास दिला सके सरकार जनता के लिए प्रतिबद्ध है। बीजेपी सरकार के पास अपनी कुछ सफल योजनाओं की फेहरिस्त भी जिसे वो जनता को विश्वास दिला सकती है। दूसरी ओर मोदी सरकार को अपने कार्यकाल की असफलताओं का ध्यान रखना होगा और उसके लिए जनता के सामने स्वीकार करना होगा। क्योंकि मोदी सरकार वादों और योजनाओं के अधिकतर हिस्से कुछ खास करती नजर नहीं आई है। पार्टी को व्यक्तिवाद की राजनीति से भी ऊपर उठना जरूरी होगी।

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वहीं अगर अब देखें तो कांग्रेस को एक प्रतिवद्ध योजना और साथ ही क्षेत्रीय दल के सफल गठजोड़ के साथ मैदान में उतरना होगा। क्योंकि अगर देखा जाए तो कई बड़े क्षेत्रीय दल कांग्रेस के साथ आते दिखाई दे रहे हैं जिसमें टीडीपी, बसपा, सपा और दक्षिणी पूर्वी राज्य के क्षेत्रीय दल शामिल हैं और खुद कांग्रेस एक राष्ट्रीय दल है।

वहीं अगर केसीआर की थर्ड फ्रंट की बात करें तो उससे कोई साफ स्पष्ट अनुमानित नतीजा दिखाई नहीं देता सिवाय बीजेपी के फायदे के, अगर केसीआर सोच रही है कि थर्ड फ्रंट के आधार पर देश के दो सबसे बड़े राष्ट्रीय दलों को टक्कर दी जा सकती है तो शायद लोकसभा के 6 महीने पहले यह कवायद मात्र गलत फैसला ही साबित होगा। क्योंकि हिन्दी भाषी इलाकों में अपनी बिना मजबूत छवि के बल पर चुनाव लड़ना और जीतना मुश्किल है।

इस गठजोड़ से यूपीए को भारी नुकसान और एनडीए समर्थित दल को सीधा फायदा पहुंचेगा। समय रहते इस तरह का फैसला कांग्रेस और बाकि 2019 में लोकसभा सरकार बनाने का सपना देख रहे क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी भूल ही साबित होगी।

डिस्क्लेमर : यह लेखक के निजी विचार हैं। इस लेख में बताई गई सूचना, तथ्य या व्यक्त किए गए विचार GroundReport.in के नहीं हैं और न ही इसके लिए GroundReport.in उत्तरदायी है।