देश को राम मंदिर नहीं, शिक्षा चाहिए

राम मंदिर नहीं, देश को स्वास्थ्य और शिक्षा की अधिक ज़रूरत

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9 नवंबर, 2019 को भारतीय उच्चतम न्यायालय का राम मंदिर के पक्ष में फैसला आने के बाद से राम मंदिर के निर्माण कार्य की आधारशिला रखने का इंतज़ार किया जा रहा था। आख़िर एक लंबे इंतज़ार के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रख दी है। 9 नवंबर 2019 को भारत के उच्चतम न्यायालय ने बरसों पुराने इस विवाद पर अपना फैसला सुनाते हुए अयोध्या में राममंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। अयोध्या में राममंदिर भूमि पूजन और मंदिर की आधारशिला रखे जाने के बाद, भाजपा को सत्ता तक लाने वाला ये आंदोलन कल फलीभूत हो गया।

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देश इस वक़्त एक बड़े आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। कोरोना वायरस संक्रमण तूफान की रफ्तार से फैल रहा है। देश में बेरोज़गारी अपने चर्म पर है। कोरोनाकाल में लगे एक लंबे लॉकडाउन के कारण अनगिनत लोग अवसात में जीवन जी रहे हैं। न जाने कितने लोगों ने लॉकडाउन के बाद नौकरी जाने के कारण आत्महत्या कर ली । देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से लाचार नज़र आती है।

राम मंदिर बनाने में इतनी जल्दबाज़ी क्यों ?

देश में पहले से ही अच्छी स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा व्यवस्था की कमी है। कोरोनाकाल में देश की शिक्षा व्यवस्था को बड़ी चोट पहुंची है। लगभग बीते 6 महीनों से देश के अधिकतर शिक्षण संस्थान बंद है। इस वायरस की वजह से देश की शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह से प्रभावित हुई है। कोरोना वायरस के चलते देश के अधिकतर शिक्षण संस्थानों ने ऑनलाइन कक्षाएं शुरु कर दी है। कई शिक्षण संस्थान परीक्षाओं का संचालन भी ऑनलाइन ही करा रहे है।

ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या सभी छात्र ऑनलाइन पढ़ाई कर पाएंगे या फ़िर ये ऑनलाइन पढ़ाई केवल गिने-चुने छात्रों के लिए ही है ? आज भी देश के अनेक क्षेत्रों में 4 जी इंटरनेट तो दूर सामान्य इंटरनेट की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। हमारे सामने इसका सबसे बड़ा उदाहरण जम्मू-कश्मीर है, जहां बीते कई वर्षों से लोग इंटरनेट से दूर कर दिए गए हैं। ऐसे में वे छात्र जो देश के ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं या दूर-दराज़ इलाकों में रहते हैं, वे ऑनलाइन पढ़ाई किस तरह कर पाएंगे ?

ऑनलाइन शिक्षा की स्थिति

कोरोना महामारी के बाद से देश की अर्थव्यवस्था अपने निचले स्तर पर है, जिसके कारण किसानों, श्रामिकों और अन्य कर्मचारियों को वेतन के आभाव से गुजरना पड़ रहा है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था की शुरूआत करना सरकार और शिक्षण संस्थानों की मजबूरी है। देश के लाखों विद्यार्थियों के पास डिजिटल डिवाइट होने की आशंकांए हैं, और वैसे भी ग्रामीण और शहरी छात्रों के बीच ज़मीन- आसमान का अंतर है। इसके अलावा देश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट तो दूर बिजली की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। फिर भी ऐसे में छात्र ऑनलाइन पढ़ाई कैसे कर सकेंगे ?

इसी वर्ष जून में केरल के मलप्पुरम जिले के वलान्चेरी में रहने वाली देविका बालाकृष्णन ने आत्महत्या कर दी। जिसका कारण घर में इंटरनेट की सुविधा का नहीं होना था। एशियनेट की रिपोर्ट के अनुसार, देविका को अय्यनकली छात्रवृत्ति मिली थी, लेकिन वह इंटरनेट की सुविधा ना होने के कारण से ऑनलाइन कक्षाओं में अपनी अनुपस्थिति को लेकर चिंतित थी।

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“प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन” की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 59 फीसदी युवाओं के पास कम्प्यूटर का ज्ञान नहीं है। इसी के साथ, लगभग 64 फीसदी युवाओं ने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल ही नहीं किया है।

नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के आंकड़ों के अनुसार, भारत में केवल 23.8 फीसदी घरों में ही इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। शहरी इलाकों में इंटरनेट की सुविधा 42 फीसदी है, जबकि ग्रामीण इलाकों में 14.9 फीसदी है। केवल आठ फीसदी घरों में ही इंटरनेट और कम्प्यूटर दोनों की ही सुविधाएं उपलब्ध हैं। पूरे देश में 78 फीसदी लोगों के पास मोबाइल की सुविधा है, लेकिन इसमें भी ग्रामीण इलाके शहरी इलाकों की तुलना में पीछे है।

स्वास्थ्य सेवा के हालात

कोरोना वायरस ने भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता की असलियत सामने रख दी है। भारत में कोरोना वायरस के मामले दिन- प्रतिदिन बढ़ते जा रहे है। पिछले दो दिनों से भारत में अमेरिका से भी ज्यादा कोरोना मामले सामने आए है। इसी बीच देश के कई अस्पतालों में बेड, पीपीई और डॉक्टरों की कमी से संबंधित कई खबरें सामने आ चुकी है। वहीं, भारत अपनी जीडीपी का केवल 1.28 प्रतिशत ही स्वास्थ्य पर खर्च करता है।

नेशनल हेल्थप्रोफाइल प्रोफाइल -(NHP) 2019 के जारी किए गए आकड़ों के मुताबिक, भारत ने सार्वजनिक रुप से अपने सकल घरेलू उत्पाद (2017-18) का केवल 1.28 फीसदी ही स्वास्थ्य पर खर्च किया है, यानी प्रति व्यक्ति पर स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च मात्र 1,657 रुपये ही हुआ है।

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वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन(WHO) के अनुसार, भारत में 1,000 लोगों के इलाज के लिए एक डॉक्टर उपलब्ध है, और 11,500 से अधिक लोगों के लिए एक सरकारी डॉक्टर मौजूद है। इसके अलावा, शहरी और ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य सेवाओं में भारी अंतर है।

नेशनल हेल्‍थ प्रोफाइल(NHP) के आकड़ों के अनुसार, दक्षिण पूर्व एशिया के 10 देशों में से भारत केवल बांग्लादेश से ही आगे है। स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भारत अपने पड़ोसी देशों, जैसे श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशिया और नेपाल से भी कम खर्च करता है। तो विकसित देशों जैसे अमेरिका, जापान और फ्रांस की स्वास्थ्य सेवाओं के समाने भारत की स्वास्थ्य सेवा शून्य के सामान है।

Written By Kirti Rawat, She is Journalism Graduate from Indian Institute of Mass Communication, New Delhi.

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