दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट ने दिल्ली दंगों में पुलिस की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

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  • दिल्ली पुलिस द्वारा पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किए गए एक हलफ़नामे में कहा है कि अब तक उन्हें ऐसे सबूत नहीं मिले हैं जिनके आधार पर दिल्ली दंगों में बीजेपी नेता कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर ने किसी को ‘भड़काया’ हो या दिल्ली में दंगे करने के लिए उकसाया हो।
  • रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने ये हलफ़नामा एक याचिका के जवाब में पेश किया जिसमें उन नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की बात कही गई है जिन्होंने जनवरी-फ़रवरी में विवादित भाषण दिया था।
  • दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने दिल्ली दंगों से सम्बंधित फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की 130 पन्नों की एक रिपोर्ट भी दिल्ली सरकार को सौंपी है जिसमें ये दावा किया गया है कि दिल्ली दंगों में भाजपा के नेताओं के भाषण ने भड़काने का काम किया है। इस रिपोर्ट में दंगे में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल खड़ा किया गया है।

दंगे में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल खड़ा किया गया है

आयोग ने 9 मार्च को एम आर शमशाद, एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया के नेतृत्व में एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई थी जिसके तहत कमेटी को 23 – 27 फरवरी 2020 के दौरान नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाली हिंसा की जांच करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। कमेटी ने तत्काल अपनी जांच शुरू कर दी थी लेकिन लॉकडाउन के कारण जांच प्रभावित रही। कमेटी ने जून में दोबारा अपना कम शुरू किया और 27 जून को अपनी 130 पेज की रिपोर्ट कमीशन को सौंपी।

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फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा कर प्रभावितों से मुलाक़ात की, सबूत इकठ्ठा किए और धार्मिक स्थलों को होने वाले नुकसान का मौके पर सर्वे भी किया। दिल्ली माइनॉरिटी कमीशन और फैक्ट फाइंडिंग कमेटी दोनों ने दिल्ली पुलिस से एफआईआर की कापियां और गिरफ्तारियों की जानकारी हासिल करना चाहे लेकिन दिल्ली पुलिस ने किसी को भी कोई जानकारी नहीं दी।

भाजपा नेताओं ने हिंसा के लिए लगातार उकसाया

दिसंबर 2019 से फरवरी 2020 तक दिल्ली विधान सभा चुनाव अभियान के दौरान भाजपा के नेताओं ने CAA विरोधी प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध हिंसा के लिए उकसाने के लिए बहुत से भाषण दिए। रिपोर्ट में उनके भाषणों का भी उल्लेख है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 23 फरवरी 2020 को मौजपुर में कपिल मिश्रा के भड़काऊ भाषण के बाद नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के विभिन्न इलाकों में हिंसा भड़क उठी। अपने भाषण में मिश्रा ने जाफराबाद में प्रदर्शनकारियों को ज़बरदस्ती हटाने की बात की थी। जनता को ये धमकी उस समय के डिप्टी कमिश्नर पुलिस नॉर्थ ईस्ट श्री वेद प्रकाश सूर्य की मौजूदगी में दी गई थी।

दंगों में पुलिस की भूमिका

कमेटी ने जांच में बहुत से ऐसे साक्ष्य पाए जो पुलिस की निष्क्रियता का सुबूत हैं। पुलिस के सामने हिंसा फ़ैल रही थी। इमरजेंसी नंबर पर बार-बार फोन करने के बाद भी पुलिस मौके पर नहीं पहुंची। ये भी आरोप है कि पुलिस हिंसाग्रस्त इलाके में गश्त कर रही थी लेकिन जब मदद मांगी गई तो उन्होंने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि उनको आदेश नहीं मिला है।

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पुलिस ने ग़ैरक़ानूनी भीड़ को हटाने, हिंसा करने वालों को रोकने और उन्हें गिरफ्तार करने के अपने अधिकार का भी इस्तेमाल नहीं किया। प्रभावितों से मिलने वाले साक्ष्य बताते हैं कि एफआईआर दर्ज करने में या तो देर हुई या उनपर कार्रवाई नहीं की गई। पुलिस ने गंभीर मामलों में भी दर्ज एफआईआर में कोई कार्रवाई नहीं की। इस तरह के बहुत से आरोप हैं जो कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साझा किया है।

धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया

इस रिपोर्ट में 11 मस्जिदों को निशाना बनाए जाने का भी ज़िक्र किया गया है।इसके साथ ही एक दर्गाह और एक कब्रिस्तान को भी हिंसक भीड़ ने निशाना बनाया है।हमलावरो ने मुस्लिम इबादतगाह, मस्जिद और स्कूलों को भी नुकसान पहुंचाया। कुरआन को भी जलाया गया। हालांकि ये भी साक्ष्य हैं की मुस्लिम पड़ोसियों ने हिन्दू मंदिर की हिफाज़त की।

महिलाओं से अभद्रता

रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र है कि मुस्लिम महिलाओं की पहचान को निशाना बनाया गया। उनके बुर्के और हिजाब उतार दिए गए। पुलिस फ़ोर्स के साथ हिंसक भीड़ ने धरना स्थल पर हमला किया, अपशब्द कहे और धक्का मुक्की की। पुलिस ने महिलाओं पर इस हमले को ‘आज़ादी’ कहा।

पूर्वनियोजित और संगठित हिंसा

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र किया है कि हिंसा पूर्वनियोजित थी और भीड़ कारोबार को लूट रही थी। गवाहों ने कमेटी को बताया कि भीड़ ‘जय श्रीराम’ के नारे लगा रही थी। इसके साथ ही ‘हर-हर मोदी’, ‘मोदी जी, काट दो इन मुल्लों को’ और ‘आज तुम्हे आज़ादी देंगे’ आदि नारे लगाए गए। मुस्लिम दुकानों और घरों को लूटा गया। गाड़ियों में आग लगा दी गई।

फैक्ट फाइंडिंग टीम ने बहुत से सुझाव भी दिए हैं

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में ये सुझाव दिया है कि सरकार इसकी जांच के लिए पांच सदस्यी कमेटी गठित करे जिसका नेतृत्व हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज करें। कमेटी सभी शिकायतों पर एफआईआर दर्ज करे। प्रभावितों के बयान रिकॉर्ड कराए जाएं। दिल्ली सरकार अपनी स्कीम के तहत गवाह और प्रभावितों की सुरक्षा को सुनिश्चित करे।प्रभावितों को क़ानूनी मदद दी जाए। प्रभावितों की क़ानूनी मदद के लिए ट्रायल कोर्ट के वकीलों की टीम बनाई जाए। नेताओं के भड़काऊ बयानों को लेकर ठोस क़दम उठाए जाएं।

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