JNU के पूर्व छात्र अभिजीत बनर्जी को मिला अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार

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अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार का आज एलान किया गया. जिसमे जेएनयू के पूर्व छात्र रहे अभिजीत बनर्जी को ग़रीबी पर अध्य्यन के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया. उनके साथ उनकी पत्नी एस्थर डफ़्लो और माइकेल क्रेमर को भी इस पुरस्कार के लिए चुना गया है

अभिजीत बनर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है. उन्होंने साल 1988 में हार्वर्ड से पीएचडी डिग्री प्राप्त की . उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव के ‘2015 के बाद के विकास एजेंडे’ पर प्रख्यात व्यक्तियों के उच्च-स्तरीय पैनल में भी काम किया है. अभिजित बनर्जी ने ‘व्हाट द इकोनॉमी नीड्स नाउ (2019)’, ‘पूअर इकोनॉमिक्स (2011)’, ‘मेकिंग एड वर्क (2007)’ जैसे कई किताबों का लेखन किया है.

इस समय बनर्जी मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलिजी (एमआईटी) में फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल प्रोफेसर हैं. साल 2003 में उन्होंने अब्दुल लातिफ जमील पावर्टी एक्शन लैब (जे-पीएल) की स्थपना की थी. बनर्जी को अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेस का फेलो भी चुना गया था. अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार को आधिकारिक तौर पर ‘बैंक ऑफ स्वीडेन प्राइज इन इकोनॉमिक साइंसेस इन मेमोरी ऑफ अल्फ्रेड नोबेल’ के नाम से जाना जाता है.

जिन अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी एस्थर डफ़्लो को अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार मिला है उन्होंने अर्थव्यवस्था को लेकर मोदी सरकार की तीखी आलोचना की थी. दरअसल, अर्थव्यवस्था से जुड़े आँकड़ों के साथ घालमेल करने के आरोपों से भारत की विश्व स्तर पर साख को नुक़सान पहुँचने के ख़तरे का आगाह करते हुए समाज विज्ञान से जुड़े 108 विशेषज्ञों ने मार्च में एक बयान जारी किया था. इन विशेषज्ञों में अभिजीत बनर्जी और एस्थर डफ़्लो भी शामिल थे. उन्होंने पाया था कि जो आँकड़े सरकार के पक्ष में नहीं आ रहे थे उनको विवादास्पद मेथडलॉजी यानी तरीक़े अपनाकर संशोधित किया जा रहा था.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अर्थशास्त्र के नोबेल के लिए अभिजीत बनर्जी को चुने जाने पर ट्वीट कर कहा है कि वह उस जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हैं, जिसकी छवि काफ़ी ख़राब की गई.

मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने ट्वीट किया, यह जानकार खुश हुआ कि अभिजीत बनर्जी और एस्थर डफ्लो को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला है. वे इसके लिए पूरी तरह हक़दार हैं. अभिजीत उस जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हैं, जिसे काफ़ी बदनाम किया गया और उनके काम ने कई युाव भारतीय विद्वानों को प्रेरणा दी है.