पुलवामा शहीद: कोई परिवार बेच रहा सब्ज़ी.. कोई भुखमरी के कगार पर तो कोई काट रहा सरकारी दफ्तरों के चक्कर

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न्यूज़ डेस्क, नई दिल्ली | पिछले साल 14 फरवरी को भारत मां के 40 सपूत कश्मीर के पुलवामा में शहीद हो गए थे। केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के 44 जवान एक आत्मघाती हमले का शिकार हो गए थे। पूरा देश शहीदों के ग़म में डूब कर रोया था। दुनियां के अन्य देशों ने भी इस हमले के बाद दुख ज़ाहिर किया था। सेना को राजनीति में न घसीटने की गरिमापूर्ण परंपरा तोड़कर जिन्होंने सेना को चुनावी मुद्दा बनाया, उन्होंने आज तक इन शहीदों के लिए क्या किया?

शहीद के परिवार वाले अब कहां और किस हालत में हैं?

उस समय भारत में लोकसभा चुनाव का प्रचार भी अपने चर्म पर था। इस हमले के बाद लोग सरकार से बदले की मांग करने के लिए सड़कों पर निकल आए। पीएम मोदी भी जवाबी कारवाई करने की बात करने लगे । बालाकोट एयर स्ट्राइक हुई और बीजेपी ने लोकसभा चुनाव प्रचार में राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाया और हर मंच पर पोस्टर लगाकर शहीदों के नाम पर वोट मांगने लगी। भाजपा के अधिकतर नेता चुनावी रैलियों में शहीद के परिवार वालों को मंच पर बिठाकर सहानुभूति की आढ़ में वोट बटोरने में लग गए । भाजपा भारी बहुमत से सत्ता में फिर से क़ाबिज़ हो गई।

एक साल बीते पर यूपी सरकार ने नहीं निभाया वादा

पुलवामा हमले में इलाहबाद के महेश यादव ने देश के नाम अपनी जान कुरबान की थी। उस वक्त सभी नेता, अधिकारी और अन्य लोग शहीद के परिवार के साथ खड़े थे। सरकार ने वादों की लंबी लिस्ट भी शहीद के परिवार को थमा दी थी। यूपी को मुख्यमंत्री योगी ने भी पुलवामा के नाम पर अधिकतर मंच से वोट मांगे थे। अंजू देवी का कहना है कि सरकार के सब दावे खोखले हैं। हिंदुस्तान की रिपोर्ट कहती है कि परिवार भुखमरी के कगार पर है। शहीद के पिता राजकुमार का कहना है कि शहीद के नाम पर राजनीति तो की गई लेकिन परिवार के लिए जो भी वादे किए गए, वह एक साल पूरा होने के बाद भी पूरे नहीं हुए।

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शहीद कौशल की बूढ़ी मां दफ्तरों के चक्कर लगा रही हैं।

इसी तरह आगरा के जवान कौशल कुमार रावत भी इस हमले में शहीद हुए थे। शहीद की मां सुधा कहती हैं कि उन्हें न तो केंद्र सरकार से कोई मदद मिली, न ही किसी और ने कोई मदद की। कोई उनका हाल पूछने तक नहीं गया। जब बेटे की अंतिम यात्रा निकली थी, तब बड़े-बड़े अधिकारी, नेता आए थे। सबने बड़े-बड़े वादे किए थे। लेकिन कोई वादा पूरा नहीं हुआ। योगी सरकार ने 25 लाख रुपये देने का वादा किया था लेकिन आज तक कौशल के परिवार को कोई मुआवजा नहीं दिया गया। शहीदों को लेकर जितने वादे किए गए सब झूठे साबित पड़ते हैं कि एक साल में भी सरकार उन शहीदों के परिवारों तक मदद नहीं पंहुचा पायी।। शहीद कौशल की बूढ़ी मां सुधा रावत आंख में आंसू भरे दफ्तरों के चक्कर लगा रही हैं।

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शहीद की पत्नी बेच रही सब्ज़ी

झारखंड के गुमला जिले के रहने वाले विजय सोरेंग भी इस हमले में शहीद हुए थे। लेकिन उनका परिवार काफी कठिनाईयों के बीच जी रहा है। शहीद की पत्नी विमला देवी परिवार को पालने के लिए सब्जी बेचने का काम कर रही हैं। उनकी शुक्रवार को एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें वह सड़क किनारे बैठी सब्जी बेच रही थीं। शहीद की पत्नी की ये तस्वीर एक ट्विटर यूजर ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को टैग करते हुए ट्वीट की थी।


बीते अक्टूबर में आरटीआई से पता चला कि इन 40 शहीदतों से 40 परिवार उजड़े थे। उन परिवारों में से सिर्फ 12 को राज्यों की तरफ से नौकरी की पेशकश की गई। केंद्र ने इन्हें कुछ नहीं दिया। पुलवामा हमले के बाद मारे गए जवानों के परिवारों को आर्थिक मदद पहुंचाने के लिए एक राहत कोष बना था “वीर भारत कोर”। आरटीआई से पता चला कि अगस्त 2019 तक इस कोष के फंड में कुल 258 करोड़ रुपये जमा थे।

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कोई नहीं जानता कि इस पैसे का सरकार ने क्या किया?

इसी तरह पुलवामा में शहीद हुए अधिकतर जवानों के परिवार वाले बेसहारों की तरह ज़िन्दगी जीने को मजबूर हैं। सरकार ने चुनाव में हर जगह शहीदों पर हुए इस हमले को चुनाव के में इस्तेमाल किया और चुनाव जीता। इन परिवार वालों को सरकार ने अब तक वादों के सिवा कुछ न दिया। कोई पैसे के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है, तो कोई मुआवज़े के लिए सरकार दफ्तरों के चक्कर।

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