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घटिया सोच ने दिया बलात्कार को जन्म

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देखो कितने कितने छोटे कपड़े पहन रखी है, शर्म लाज तो बेच खाई है, इसके मां बाप ने कुछ संस्कार ही नहीं दिए हैं, देखी कैसे मुंह चला रही है पराए घर जाएगी तो जला के मार दी जाएगी, बेटियों को चुप ही रहना चाहिए, तुम चुप रहो घर के मर्द बात कर रहे हैं ना !!!

और भी बहुत कुछ, जो शायद बयां करना इतना आसान नहीं है। लोग अक्सर इन शब्दों में नारी को आंकने की चेष्टा कर जाते है, या इन शब्दों के माध्यम से उसे बांधने का साहस कर जाते है। जबकि अक्सर हम लोगों को कहते हुए पाते हैं कि अरे जब छोटे कपड़े पहनेंगी तो बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं तो सामान्यतः होंगी ही होंगी। या एक महान औधे पर बैठे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के शब्दों में कहें तो “अगर कोई महिला बहुत कम कपड़े पहन रही है तो इसका असर होगा, इसका पुरुषों पर असर होगा.” वहीं बात करें तीरथ सिंह रावत की तो उन्होंने भी रिप्ड जींस पर भड़काऊ बयान देने से अपने हाथ पीछे नहीं लिए।

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कपड़ों को बताया बलात्कार का कारण

ज्यादातर रेप विक्टिम से ये सवाल अमूमन कर ही दिया जाता है कि तुमने कपड़े क्या पहने थे जिसका जवाब बेल्जियम की इस प्रदर्शनी में साफ देखने को मिला था जिसके लिए कथन कुछ इस प्रकार हैं :
रात में जीवित बचे लोगों द्वारा पहने जाने वाले कपड़ों के विवरण से दोहराया गया, पजामा, ट्रैकसूट, यहां तक कि एक बच्चे की माई लिटिल पोनी शर्ट जैसी वस्तुओं की विशेषता, कपड़ों को पीड़ितों के रूप में निर्दोष दिखाती है।

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बेल्जियम का संग्रहालय देता है इस सोंच को मुंहतोड़ जवाब

प्रदर्शनी के पीछे संगठन, मोलेनबीक की रोकथाम सेवा, ने “हमारे सबसे व्यापक बलात्कार संस्कृति मिथकों में से एक के लिए एक ठोस प्रतिक्रिया बनाने” के लिए प्रदर्शनी खोली क्योंकि “यह विश्वास कि कपड़े या जो कोई ‘बलात्कार का कारण बनता है’ पहनने के लिए बेहद हानिकारक है। बचे।”
प्रदर्शनी के साथ, संगठन यह साबित करना चाहता है कि किसी व्यक्ति के पहनावे को बलात्कारी द्वारा कभी भी कम करने वाली परिस्थिति या उकसावे के रूप में नहीं देखा जा सकता है।

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सोच के देखिए क्या इस प्रदर्शनी के द्वारा समझाए गई बात कहीं से गलत है? और अगर सही है तो हम आज भी बहु के घूंघट करने पर आज भी जोर डालते हैं। हम क्यूं नही कहते की पर्दा और अदब सिर्फ निगाहों से होता है यूं घूंघट या हिजाब डालने से तो बुरी नजरों से बचा जाता है।

सोच कर देखिए कि अगर लड़कियों का खुद के लिए आवाज उठाना गलत है तो दूसरों का उन्हे चुप कराना सही कैसे? अगर लड़के का मन बहलाने के लिए दोस्तो से मिलना जायज है तो लड़कियों का अपनी मां से बात करना गलत कैसे?

एक महान इंसान ने कहा है कि एक महिला की सबसे बड़ी दुश्मन खुद एक महिला ही है। क्यूंकि पुरुष भले ही शाम को 6 बजे तक घर न लौटने पर ताना न मारें मगर घर की एक न एक महिला सदस्य को आप ये कहते जरूर पाएंगे कि उनका तो आधे से ज्यादा समय पैर घर से बाहर ही रहता है।
खैर, ये दोतरफा जिंदगी को जब हम मिलाकर देखेंगे तो बस एक ही चीज मिलेगी विनाशकाल!! इसलिए समाज को बदलने से पहले खुद में बदलाव लाओ और सोच को बदलो क्यूंकि सोच नहीं तो नई खोज नहीं।
इस सोच से कुछ खास सोचने का प्रयास करिए तब तक हम अपनी सोच को विराम देकर आपकी अच्छी सोच की कल्पना करते हैं।

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