न्यू ज़ीलैण्ड नरसंहार: नफ़रत की विचारधारा

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विचार। ललित कुमार सिंह

एक 27 साल का ऑस्ट्रेलियाई नागरिक “ब्रेंटों हरिसों” न्यू ज़ीलैण्ड के दो मस्जिदों में घुसता है और वहां मौजूद लोगो पर अंधाधुन गोलियां चला देता है और अपनी इस पूरी आतंकवादी गतिविधि को फेसबुक पर लाइव दिखाता है। अब आप ये ज़रूर सोच रहे होंगे कि आख़िर किस विचारधारा से प्रभावित होकर इसने कुछ ही देर में 50 के आसपास निर्दोष लोगो की हत्या कर दी। ये चरम दक्षिणपंथी विचारधारा का था, यानी अंग्रेजी में कहें तो “एक्सट्रीम राइट विंग”।

चरम दक्षिणपंथी जैसे फ़ासिस्ट होते हैं, फ़ासिस्ट विविधता को नहीं स्वीकार करते बल्कि उसकी जगह ये अपनी जाति को ही सर्वोपरि मानते हैं। इनका ये मानना है कि अगर दूसरे धर्म इनके देश में रहते हैं तो इनका धर्म उनकी विचारधारा से प्रभावित होगा। इस विचारधारा में दूसरी सभी जातियां और धर्मों से नफरत की जाती है।

जिस आतंकवादी ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया उसका ये मानना था कि केवल श्वेत यानी “व्हाइट” ही सबसे ऊपर हैं। इसके अलावा ये आतंकवादी मुस्लिम समुदाय, प्रवासी और यहूदी के खिलाफ विचार रखता था।
पूर्व में दुनियाभर में किये हमलो को अंजाम देने वाले कई आतंकवादियो से प्रभावित होकर इसने इस पूरी घटना को अंजाम दिया था। जैसे, राडोवान कराजिक, ये बॉसनिया का मुज़रिम है जिसपर नरसंहार का आरोप है। अन्डेर्स ब्रेविक, एक नॉर्वे का नागरिक जिसने इसी प्रकार कि विचारधारा से प्रभावित होकर 2011 में 77 लोगो पर गोलियां चलायीं थी।
उस आतंकवादी का ये भी कहना है की अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प “नयी श्वेत पहचान” का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यूरोप और अन्य पश्चिमी देशो में ऐसे चरम दक्षिणपंथी हमले साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। पश्चिमी देशो के धर्मनिरपेक्ष लोग इस्लाम आतंकवाद की बहुत बातें करते हैं। इस्लाम आतंकवाद का मतलब है जब कुछ लोग आतंकवाद को अंजाम देने के बाद कुरान की व्याख्या करते हुए अपने हमले को सही साबित करने की कोशिश करें। लेकिन वही धर्मनिरपेक्ष लोग चरम दक्षिणपंथी विचारधारा की वजह से हो रहे हमले पर बात करने को तैयार नहीं हैं। जर्मनी और फ्रांस में मस्जिदों पर हमले हुए, इसके अलावा ब्रिटेन में एक एमपी की चाक़ू से हत्या कर दी गयी। अमरीका में भी सिनागोग, यानी यहूदी समुदाय का प्रार्थना स्थल वहां हमला हुआ जिसमें ११ लोगो की मौत हुई।
ये श्वेत लोगो को बेहतर मानने वाली विचारधारा बहुत तेजी से पश्चिमी देशो में बढ़ रही है। और इस विचारधारा में पश्चिमी देशो के कई बड़े नेताओ के बयान भी ज़िम्मेदार हैं। जैसे डोनाल्ड ट्रम्प चाहते थे जो मुस्लिम्स अमरीका में काम करने के लिए आते हैं उनपर बन लगाया जाए। हंगरी के प्रधानमंत्री बार बार ये कहते हैं की क्रिस्चियन यूरोप को बचाने की आवश्यकता है। इटली के इम्पेरियर मिनिस्टर ये कहते हैं की प्रवासियों को बहार भगा दो। जिस तरह की भाषा ये बड़े नेता अपने बयानों में इस्तेमाल करते हैं, ये भी इस विचारधारा के इतनी तेज़ी से बढ़ने का एक कारण है। इसी वजह से इस्लाम या दूसरे समुदाय के लोगो पर पश्चिम देशों में आये दिन हमले बढ़ने पर हैं। कुछ पश्चिम देशों के राजनितिक दल अपने इन्ही चरम दक्षिण पंथी विचारो की वजह से जाने जाते हैं।

सवाल ये उठता है की इस विचारधारा और इससे होने वाली घटनाओं से कैसे बचा जाए? इससे निपटने के लिए एक ऐसी विचारधारा को बनाना होगा कि इस तरह की श्वेत केंद्रित विचारधारा केवल फासिस्ट विचारधारा का एक हिस्सा भर है। और इस घृणा का कोई भी वैज्ञानिक सबूत नहीं है। और एक ऐसा विचार लोगो तक पहुंचाया जाए कि इस विचारधारा की वजह से पूर्व में कई ऐसे हमले हुए हैं जिसमें निर्दोषों को अपनी जान बेवजह गवानी पड़ी है। जैसे द्वितीय विश्व युद्ध में इसी विचारधारा ने कई निर्दोष लोगो की जाने ली हैं। पश्चिम देशों में नेताओं को भी ऐसे नरसंहार रोकने लिए ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है। ऐसी घटनाएं मानवाधिकारों के एकदम खिलाफ़ हैं।