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जब मीडिया ‘सरकारी भोंपू’ बन भौके, तब Trolley Times जैसे अख़बार ज़रूरी

ट्रॉली टाइम्स
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जब प्रेजेंट टाइम में पत्रकारिता का टाइम खराब चल रहा हो, बड़े बड़े टाइम्स पत्रकारिता छोड़कर दलाली कर रहे हो तो ऐसे में ट्रॉली टाइम्स जैसे न्यूज़ पेपर लॉंच होना ही था। टिकरी बॉर्डर पर किसानों के लिए ट्रॉली टाइम्स न्यूज़ पेपर लॉंच किया गया है। करीब 60 लोगों की टीम जिस में ज्यादा से ज्यादा आर्टिस्ट हैं इस पेपर को लॉंच किये हैं। चार पन्ने की पंजाबी और हिंदी भाषा में छप रही इस पेपर की शुरुवात 18 दिसंबर को हुई जब सुबह सुबह 2000 कॉपी किसानों के बीच बांटा गया। धीरे धीरे इसका सर्कुलेशन बढ़ेगा। एक पेपर के लिए पांच रुपया के करीब खर्चा आ रहा है। पेपर के लिए किसी से कोई डोनेशन नहीं लिया जा रहा है। इस पेपर से जुड़े लोग खुद अपने पैसे से यह पेपर छाप रहे हैं। इस पेपर का टाइटल सुरमीत मावी ने रखा है। सुरमीत मावी आर्टिस्ट हैं।

कई लोगों के मन में यह सवाल आ रहा होगा कि ट्रॉली टाइम्स नाम क्यों रखा गया। ट्राली मतलब ट्रेक्टर की ट्राली और ट्रेक्टर किसानों से जुड़ा हुआ है। इस पेपर के लिए किसी बड़े दफ्तर में मीटिंग नहीं हुई थी। ट्रेक्टर के ट्राली में बैठकर इस पेपर की रूपरेखा बनाया गया। सबसे बड़ी सवाल है यह पेपर क्यों शुरू किया गया? जब देश में इतने सारे न्यूज़ पेपर और न्यूज़ चैनल हैं तो इस पेपर की क्या जरूरत थी ? जरूरत थी क्यों कि न्यूज़ चैनल और न्यूज़ पेपर वालों की फर्जीवाड़ा को रोकने के लिए यह पेपर शुरू किया गया ताकि किसान आंदोलन को लेकर सही खबर किसानों तक पहुंच सके। आजकल न्यूज़पेपर और न्यूज़ चैनल किस हद तक पहुंच गए हैं यह सब को पता है। इनकी दादागिरी और गुमराह करने वाली खबर समाज को गुमराह कर रहा है।

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इव पेपर की सदस्य वीर सिंह ने बताया कि स्टेज पर जो घोषणा होती है वो सब किसानों तक नहीं पहुंच पाती है। अगले दिन जब न्यूज़ पेपर के जरिये किसान पढ़ते हैं तब तक इसकी रूपरेखा बदल जाती है यानी सही खबर के जगह गुमराह करने वाली खबर किसानों की सामने होती है।

किसानों के पास सही जानकारी पहुंचाने के लिए यह पेपर काम करेगी। इस के पेपर के अंदर रोड मैप भी होगा कि मेडिकल कैम्प कहाँ पर है, लंगर कहाँ पर है, बेड कहाँ पर है,बुक स्टोर कहाँ पर है ताकि किसान आसानी से वहां पहुंच सके। कुल 60 लोगों की टीम है। टीम के 8-10 लोग फंडिंग कर रहे हैं।। यह टीम पेपर के साथ साथ सफाई और अनुशासन का भी ध्यान रखता है। इस टीम ने “सांझी साथ” के नाम मे एक स्कूल भी वहां खोला है । इस स्कूल में 70 के करीब बच्चे पढ़ रहे हैं। किसानों के बच्चे के साथ साथ लोकल बच्चे भी पढ़ रहे हैं।

देखिये किसान आंदोलन के दौरान कितना कुछ नई चीज सामने आ रही है। IT सेल को चुनौती देने के लिए किसानों ने अपना IT सेल बनाया है। अब किसान अपना डिजिटल स्पेस बना रहा है।किसान एकता मोर्चा के नाम से ट्विटर अकाउंट भी खुल गया है ताकि इस एकाउंट के जरिये लोगों के पास सही खबर पहुंच सके। किसान को सिर्फ सरकार से  नहीं फेक न्यूज़ और फेक खबरों के खिलाफ भी लढना पड़ रहा है।

लुधियाना के भावजीत सिंह  और उनकी दोस्तों ने ट्रेक्टर टू ट्विटर के नाम से भी एक ट्विटर अकाउंट ख़ोला है । गलत खबरों को चुनौती देने के लिए यह ट्विटर अकाउंट 28 नवंबर को ख़ोला गया है। 17000 के करीब लोग इस एकाउंट को फॉलो कर रहे हैं। किसान अब ट्रेक्टर के साथ साथ ट्विटर का भी इस्तेमाल करने लगा है

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यह सब बास एक शुरुआत है। न्यूज़ पेपर और न्यूज़ चैनल वालों की दादागिरी धीरे धीरे खत्म होगी। पेड पत्रकारिता भी खत्म होने वाली है। जब युवा अपना न्यूज़पेपर और अपना यूट्यूब चैनल शुरू करने लगेंगे तो चैनल वालों की वाट लग जाएगी। ऐसे भी  कई युवा यूट्यूब चैनल के जरिये पत्रकारिता करना शुरू कर दिए हैं।  ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं। लोग उनके रिपोर्टिंग को पसंद भी कर रहे हैं। आगे धीरे धीरे ज्यादा से ज्यादा युवा इस फील्ड में आएंगे। उंन्हे पत्रकारिता करने के लिए किसी न्यूज़ पेपर या न्यूज़ चैनल की इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। जब उनके पास खुद का यूट्यूब चैनल होगा और ग्राउंड रिपोर्टिंग होगा तो फिर डर किस बात की।

ये लेख NDTV के वरिष्ट पत्रकार Sushil Mohapatra की वॉल से लिया गया है।

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