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क्योंकि कश्मीर ज़मीन पर खिंची कोई लक़ीर नहीं है…

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ग्राउंड रिपोर्ट | न्यूज़ डेस्क

पीएम मोदी ने कहा अनुच्छेद 370 हटाने का निर्णय जमीन पर लकीर खींचने के लिए नहीं बल्कि विश्वास की एक मजबूत नींव खड़ी करने की है। और इसी के साथ आज आधिकारिक तौर पर जम्मू कश्मीर का राज्य का दर्जा समाप्त हो गया और अस्तित्व में आए हैं दो नए केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर और लद्दाख। जम्मू कश्मीर में दिल्ली की तरह विधानसभा होगी और लद्दाख पुडुचेरी की तरह बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश होगा। आरके माथुर यहां के पहले उप राज्यपाल होंगे। वहीं जम्मू कश्मीर में जी सी मुर्मू पहले उप राज्यपाल के तौर पर कमान संभालेंगे।

क्या होंगे बदलाव?

आज से जम्मू कश्मीर में देश के अन्य राज्यों की तरह काम काज शुरू हो जाएगा। देश की संसद में बने कानून अब सीधे तौर पर कश्मिर में लागू होंगे। कश्मीर की अपनी रणबीर दंड संहिता आज से समाप्त हो जाएगी और बाकी राज्यों की तरह यहां भी IPC के तहत दंड निर्धारण किया जाएगा। RTI, RTE जैसे कानून कश्मीर में लागू होंगे। साथ ही देश में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति-जनजाति को मिलने वाला आरक्षण अब कश्मीर में भी मान्य होगा। उर्दू अब आधिकारिक भाषा नहीं होगी इसकी जगह हिंदी में कामकाज होगा।

क्या प्रशासनिक ढांचा बदल जाने से कश्मीर मसला हल हो जाएगा?

जम्मू कश्मीर से उसका विशेष राज्य का दर्जा छीनकर उसे एक आम राज्य बना दिया गया है। अब केंद्र की पहले की तुलना में कश्मीर पर ज़्यादा पकड़ होगी। संसद से कानून बनाकर कश्मीर में लागू किये जा सकेंगे। जो पहले संभव नहीं था। लेकिन कश्मीर की सबसे बड़ी समस्या है वहां पनप रहा अलगाववाद जो अनुच्छेद 370 हटने के बाद और बढ़ा है। कश्मीर के नेता जो हमेशा भारतीय संविधान के दायरे में काम करते रहे उन्हें जेलों में बंद कर दिया गया। जिन नेताओं ने अलगाववादियों के विपरीत भारत समर्थित विचारों का समर्थन किया वे अब जेल में हैं। ऐसे में लोगों के जनमानस पर भारत समर्थित विचार ठगा महसूस कर रहा है। कश्मीर में कर्फ्यू में ढील के बावजूद लोग सड़क पर नहीं निकल रहे। केवल 2 घंटे के लिए दुकानें खोली जा रही हैं। बच्चे स्कूलों का रुख नहीं कर रहे। इसे वहां के लोगों के शांत विरोध के रूप में देखा जाना चाहिए। आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं। गैर कश्मीरी मज़दूर आतंकवादियों के निशाने पर हैं। जो पहले कभी नहीं हुआ वो अब हो रहा है। धारा 370 हटने से सहूलियत केंद्र को तो हुई है लेकिन केवल दबाव बनाकर, और हथियार के बल पर कश्मीर के दिलों को वापस भारत से जोड़ना आसान नहीं होगा। क्योंकि लकीर खींच कर केवल ज़मीन को बांटा जा सकता है।

उम्मीद है विकास की नई धारा वहां मौजूद अलगाववादी विचारों को कम कर देंगे। और लोग इस नई सुबह को स्वीकारेंगे।

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