Sun. Sep 22nd, 2019

चाणक्यनीति में हिपहॉप का तड़का, यह नहीं देखा तो क्या देखा..

ग्राउंड रिपोर्ट । न्यूज़ डेस्क

जल्द ही आपकी यूट्यूब प्लेलिस्ट में चाणक्य नीति से प्रेरित साम, दाम, दंड, भेद नाम से चार गाने जुड़ने वाले हैं। इस सीरीज़ का पहला गाना साम- द चाइल्डहुड रिलीज़ किया जा चुका है। भारत की शिक्षा व्यवस्था की रुढ़िबद्ध धारणा के प्रति समाज को सचेत करने का प्रयास इस हिपहॉप के ज़रिये किया गया है। यह गाना आपको गांव की संस्कृति से लेकर स्कूल की घटनाओं तक का सफ़र कराता है। इस गाने के दोनों कलाकार इस शिक्षा व्यवस्था से गुज़र चुके हैं। इस गाने का ऑडियो मुंबई और वीडियो मध्यप्रदेश के बैतूल में शूट किया गया है। इस हिपहॉप गाने के बोल आपको अपने बचबन से ज़ोड़ने में कामयाब होते हैं।

क्या कहते हैं इस वीडियो के कलाकार एन.एस.एन

हमारा हर गाना उसके टाइटल के आधार पर इक्कीसवीं सदी में घट रहे समय और घटनाओं पर आधारित हैजिसमें हम चाणक्य नीति के आधार पर शब्दों के सहारे हिपहोप को आधार मानकर अपनी बाते लोगों तक पहुँचाएँगेचानक्य नीति आपको हमारे गानों में देखने मिलेगीपहला गानासामहै जो बचपन में घटित घटनाओं पर है जो टाइटलसामके आधार पर स्तूतीपुर्वक कही गई है

ये गाना एक तरह से मेरी बचपन की कहानी है, जो मेरे अपने गाँव के जीवन के आसपास घुमती है, शिक्षा, गाँव, परिवार और बचपन के सामाजिक परिवेश के माहौल को दर्शाता है, एक गाँव के किसान के बच्चे का जीवन कैसा रहा, उसने अपना बचपन कैसे बिताया और उसके परिवार और दोस्तों के साथ उसका रिश्ता कैसा था, इस गाने के सहारे बताना चाहते है कि मेरी ही तरह जब अपने गाँव के सरकारी स्कूल से शहर के प्रायवेट स्कूल में पढ़ने जाता है तब उसे कौनकौन सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, और वो उससे कैसे निजात पाता है, कैसे सरकारी स्कूल का ख़ाकी पैंट पहना बच्चा छोटे से गाँव से निकलकर मुम्बई पहुँचता है जिसमें उसे कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है, यह गाना बचपन की कहानी कहने के साथसाथ से एक तरह से शिक्षा के स्तर और सरकारी कामकाज पर सवाल भी उठाता है, साम हमारी शुरूवात है आगे बहुत कुछ अच्छा देखने सुनने मिलेगा

इस वीडियो के दूसरे कलाकार शरद क्या कहते हैं-

इस गाने में मेरा पार्ट भारत में स्कूलों और शिक्षा प्रणाली के बारे में है। जो आपको एक बार भारतीय शिक्षा व्यवस्था के बारे में सोचने पर मजबूर करेगा

मैं भगवान बुद्ध के जन्म स्थान सिद्धार्थ नगर से हूं। जब मैं एक बच्चा था तब मैं और मेरा भाई एक छोटे से शहर सोहरतगढ़ में रहते थे। और आसपास के स्कूल में शिक्षा व्यवस्था उतनी अच्छी नहीं थी। जब हम बड़े हुए तो हमें सिद्धार्थ नगर छोड़ना पड़ा क्योंकि आगे की पढ़ाई के लिए वहाँ अच्छे स्कूल नहीं थे। और फिर कॉलेज और फिर से उच्च शिक्षा के लिए स्कूल वाला शहर भी छोड़ना पड़ा। तो सवाल यह है कि क्यों हमे एक जगह के निवासी के रूप में बेहतर अवसरों के लिए जगह छोड़ना पड़ता है, हमारे शहर में स्कूल क्यों नहीं थे? मेरे जैसे बच्चे हैं जो परिवारों से दूर होने का सामना करने में सक्षम नहीं हैं या आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हैं या अवसरों के लिए किसी शहर या जगह से बाहर जाने में असक्षम हैं। किसी तरह अंतत: उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ता है और छोड़ने के बाद भी बाद कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है

हर दिन मैं छात्रों के अपराधों के मामलों को देखता हूं, स्कूल के दौरान भी छेड़छाड़, अपराध कोई बड़ी बात नहीं है। आप इस तरह की कहानियों को हफ्तो में दो या तीन बार देखते है।इन सभी स्थितियों से मुझे आश्चर्य होता है। हम क्या सिखा रहे हैं और छात्र क्या सीख रहे हैं?

जब मैं स्कूल में था तब मेरे शिक्षक ने मुझे हथेलियों पर इतना बुरा मारा कि मेरी उंगली में खून जम गया था। यह घटना मेरे दिमाग में बुरे तरीके से अंकित हो गई और और यह घटना हर दुसरे बच्चे के साथ होती रही है। ‘उन्होंने हमें हथेलियों पर डंडे से मारा, इस तरह शांति और प्रेम के बारे में पढ़ाया, कैसी विडंबना है छात्र क्या सीखेगा ? बस मैं हिप हॉप के माध्यम से अपनी कहानी बता रहा हूँ।

ग्राउंड रिपोर्ट ऐसे ही उभरती हुई प्रतिभाओं को आपके समक्ष लाने के लिए प्रायसरत है। हमारे आसपास ऐसे कई युवा हैं जो अपनी कला को दुनिया के सामने लाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। उन्हे ज़रुरत है सिर्फ आपकी सराहना और सहयोग की।

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