किसानों का दमन करती सरकार की नीति, नए कृषि कानूनों से किसको फायदा?

किसानों का दमन करती सरकार
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विचार, गार्गी चतुर्वेदी।। बीएसएनएल याद है? तरह तरह के नाम से मशहूर यह कंपनी टेलीकॉम की सबसे बड़ी कंपनी थी। सरकारी होने के नाते इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी थी गावों में इंटरनेट पहुंचना। 2016 में जियो नेटवर्क के आने के बाद से ही बीएसएनएल का पतन शुरू हुआ। वो बीएसएनएल जो लाखों कर्मचारियों को नौकरी देता था वो आज या तो उनको premature retirement पर मजबूर कर उनकी नौकरियां ले रहा है या फिर इंजिनियर और दूसरे विभागों के लोगो को अलग विभागों में ट्रांसफर कर उनकी बौद्धिक आज़ादी के साथ खिलवाड़ कर रहा हैं। आज जियो 30 प्रतिशत से अधिक मार्केट पर कब्ज़ा रखता है इंटरनेट की दुनिया में। हालत आज ऐसी है की जियो किसी भी तरह मार्केट में इंटरनेट रेट्स के साथ मनमानी कर सकता है। जो जियो सस्ते इंटरनेट पैक्स से कंज्यूमर्स को लुभाता रहा शुरुआत में वो आज बादशाह बना हुआ है। इसका प्रमाण है जियो के बडे़ हुए सर्किल रोमिंग और डेटा पैकेजेस , और कोई कुछ नहीं कर सकता सिवाय लेने के या छोड़ने के।

यहां बीएसएनएल का उदाहरण देना पड़ेगा, क्योंकि हमारा देश एक मिक्सड इकोनॉमी है। यहां अमेरिका और यूरोप की तर्ज पर कैपिटल इकोनॉमी राज नहीं करती , बल्कि यहां सरकारी संस्थानों का आधिपत्य अधिक है। वो सरकारी नौकरियां जो जरिया है करोड़ों लोगों की पेंशन और आय का। भले ही सरकारी तंत्र जर्जर और भ्रष्टाचार की मार झेल रहे हो लेकिन मेडिकल कॉलेज में दाखिला हो या फ़िर लोक सेवा आयोग की परीक्षा हर कोई सरकारी ही चाहता है।

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आज जो किसान बिल का विरोध हो रहा है वो असुरक्षा और भय से ज़्यादा मानसिकता का विरोध है। सरकार सक्षम बनाना चाहती हैं लेकिन वो आज भी उसी घेरे में जीना चाहते हैं जिसे आढ़तियो (middle man) और दलालों ने महफूज़ कर रखा है अपनी निगरानी में। इनके विरोध या कहे डर की वजह अब जानना ज़रूरी हो जाता है।

तीन कानून जो हैं उन में पहली बिल केंद्र सरकार को किसानों को देश में कहीं भी फसल बेचने की आज़ादी देती है ताकि राज्यों के बीच कारोबार ज़्यादा हो । मार्केटिंग और ट्रांस्पोर्टिशन पर भी खर्च कम होगा। भारत में 1950 में कृषि मंडी स्थापित हुई थी। भारत में 7000 से भी अधिक मंडिया हैं। किसान अपनी फसल सीधे सरकार को नहीं पहले मिडिल मैन को बेचते हैं जिनको सरकार लाईसेंस देती हैं। इन्हीं मिडिल मैन को आढ़तियो के नाम से भी जाना जाता है। सरकार इनको तरह तरह की सहूलियत देती हैं जैसे स्टोर हाउस। यह आढ़ति ही आगे फसल बेचते हैं। नए कानून से बदलाव यह आएगा की अब सीधे किसान बिना किसी मिडिल मैन के सहारे ही अपनी फ़सल बड़ी कंपनियों को बेच सकते हैं। यहां तक की वो अपनी फसल के दाम भी निर्धारित कर सकते हैं।

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लेकिन इसमें एक शंका है किसानों को जो शायद जायज़ भी है। अगर आढ़तियो को बीच से हटा दिया गया तो बड़ी बड़ी कंपनियां किसानों से ज़बरदस्ती दाम तय कर के फसल ख़रीद सकती हैं और इससे किसानों का शोषण अधिक होगा। यह भय इसलिए भी तर्कसंगत है क्योंकि देश के 85 प्रतिशत से ज़्यादा किसान छोटे वर्ग पर खेती करते हैं। और यही 85 प्रतिशत किसान खुल कर बड़ी कंपनियों के साथ मोल भाव नहीं कर पाएंगे जिसे मोलभाव कहते हैं। खरीदने वाला ताकतवर और बेचने वाला कमज़ोर हो जाएगा जो मार्केट उसूलों के विपरीत है।

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किसानों को यह भी डर है की निजी मंडियों के आने के बाद सरकारी मंडिया खत्म हो जाएगी। इस पूरे बिल का एक पक्ष जो सरकार बड़-चड़ कर प्रचार कर रही है वो यह है की किसानों को एक राज्य से दूसरे राज्य में जा कर बेचने की सहूलियत दी जा रही है। यह बेतुकी बात है क्योंकि पहले भी किसानों पर कोई रोक नहीं थी लेकिन वो मिडिल मैन के दवाब में अपने ही राज्य में फसल बेचते थे। यह उतना फायदेमंद साबित नहीं होगा क्योंकि किसानों को ही गाड़ियों का भाड़ा अपनी जेब से देना होगा।

राज्य सरकार मंडियों से टैक्स वसूलती है और नौकरियां भी देती है लेकिन प्राइवेट मंडियां आने के बाद यह सब खत्म हो सकता हैं ।

यह बिल कृषि पैदावारों की बिक्री, फार्म सर्विसेज़, कृषि बिजनेस फर्मों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और एक्सपोर्टर्स के साथ किसानों को जुड़ने के लिए मजबूत करता है। कांट्रेक्टेड किसानों को क्वॉलिटी वाले बीज की सप्लाई यकीनी करना, तकनीकी मदद और फसल की निगरानी, कर्ज की सहूलियत और फसल बीमा की सहूलियत मुहैया कराई गई है। यह एक अच्छा प्रोविजन है लेकिन इसमें भी एक बड़ा कारण है विरोध का। उदाहरण के तौर पर एमेज़ॉन को लेते हैं। वर्ष 2012 में एमेज़ॉन अपनी किताबों को मुफ्त में घरों मे डिलीवर करवाता था। लेकिन उसके बाद 2014 तक एमेज़ॉन डिलीवरी चार्ज करने लगा। फ़िर आईं एक लिमिट पर्चेज़ जिसमें डिलीवरी फ्री की गई और अब 2018 के बाद से एमेज़ॉन प्राइम वालो को ही फ्री डिलीवरी की सुविधा दी गई है।

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यहां एमेज़ॉन का उदाहरण दिया क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत बड़ी कंपनियां जैसे Groffers अपनी वेबसाइट पर सब्ज़ियां और अनाज बेचती हैं। यह कंपनियां भारी डिस्काउंट ऑफर देने के लिए जानी जाती है और मुनाफे के लिए भी। अब अगर ऐसा होता है तो किसान एक तय कीमत पाने के बाद मुनाफे से वंचित रह जायेंगे। तो यहां भी विरोध नजायज नहीं है।

एक और मुद्दा है MSP का, MSP याने न्यनूतम दर जिसमें सरकार किसानों से अनाज खरीदती हैं। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में इसको बाहर रखा गया है। अगर मान ले कि सरकार एक किलो गेहूं के लिए किसान को 1000 रुपए देती हैं तो निजी कंपनियां इसके लिए बाध्य नहीं होंगी। उल्टा अगर नीजी कंपनी 1kg गेहूं के 600 रुपए किसान को देती है तो वो कानूनी रूप से सही होगा। किसान चाहते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में भी MSP लाई जाए जो उनके हितों की रक्षा के लिए बहुत जरूरी है। वरना उनका आर्थिक दमन होना निश्चित है।

आखिरी बिल अनाज, दाल, तिलहन, खाने वाला तेल, आलू-प्‍याज को जरूरी चीज़ों की लिस्ट से हटाने का प्रावधान रखा गया है। जिससे किसानों को अच्छी कीमत मिले। इसे होर्डिंग के खिलाफ कह सकते हैं। जैसे कई बार यह आढ़ती या बडे़ किसान अपने पास अनाज रख लेते थे और जब दाम बढ़ते थे तो मार्केट में अपने अनाज उतार देते थे। इसके खिलाफ भारत में कानून लाया गया जिसे असेंशियल कमोडिटी एक्ट कहा गया। इसके तहत छूट दी गई की किसान और आढ़ति एक सीमित सीमा में ही अनाज स्टोर कर सकते हैं लेकिन अब एक नया कानून लाया जा रहा है जो ढील दे रहा है स्टोर करने की क्षमता को।

अब यह जो प्राइवेट कंपनिया है उनको यह छूट दी जा रही है की वो अनलिमिटेड स्टोरेज कर सकती हैं अनाज की। इससे किसानों को डर है की जो एक वक्त आढ़तियो द्वारा किया जाता था अब वो ही बड़ी कंपनिया करेंगी। मतलब, जमाखोरी। इससे होगा यह की प्राइवेट कंपनी मनचाहे वक्त पर दामों से खिलवाड़ कर सकती हैं। और जब किसान उनके पास फसल लेकर जाएगा तो यह कहा जा सकता है की हमें तो 100 क्विंटल चहिए क्योंकि बाकी हमारे पास है और हम 100 क्विंटल की इतनी ही दर अदा करेंगे। आप बेचना चाहो तो बेचो । यह फिर से किसानों के हित से खिलवाड़ करने जैसा है।

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इनकी जो मांगे है वो यह है की यह तीनों ही कानून किसानों के हित में नहीं है। जो बड़ा मुद्दा है वो MSP का है। वो चाहते हैं की MSP को लीगल अमलीजामा पहनाया जाए। आज की तारीख में 20 से ज़्यादा फसलों को MSP का प्रावधान है लेकिन मिलती सिर्फ 6 को ही है। किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में भी MSP को लागू करवाना चाहते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है आढ़तियो की। किसानों का कहना है कि मिडिल मैन कहीं नहीं जा सकते क्योंकि जो सरकार के लिए काम कर रहे हैं वो निजी कंपनियो के लिए भी तो कर सकते हैं?? इसलिए मंडियों को सशक्त करने की ज़रूरत है ,हटाने की नहीं।

कई अर्थशास्त्रियों का कहना है की भारत के कृषि क्षेत्र को वित्तीय रुप से और सक्षम बनाने के लिए मंडियों को मजबूत और पारदर्शी करने की ज़रुरत है न ही प्राइवेट कंपनियों को लाने की। यह काम सरकार का है न ही प्राइवेट सेक्टर का। एग्रीकल्चर पर भारत की आधी आबादी निर्भर करती है। आपको याद होगा मैने उदहारण दिया था बीएसएनएल का? वो इसलिए दिया था क्योंकि गांवों में टावर बीएसएनएल ने ही लगाए थे , किसी निजी टेलीकॉम कंपनियों ने नहीं। क्योंकि जहां राष्ट्र निर्माण और लाभ की बात आती हैं वहां सरकार की भूमिका अहम होती है। ज़रुरत है किसानों की मांगों पर संज्ञान लेने की।

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