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MP By Elections: क्या नया कृषि कानून छीन लेगा शिवराज से मध्य प्रदेश की सत्ता?

मध्यप्रदेश उपचुनाव में किसान बिल मुद्दा
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मध्य प्रदेश एक बार फिर चुनावों (MP By Elections) की दहलीज़ पर आ खड़ा हुआ है। इस बार कमलनाथ खोई हुई सत्ता दोबारा पाने के लिए चुनाव मैदान में हैं तो शिवराज अपनी गद्दी बचाए रखने के लिए सिंधिया के साथ ताल से ताल मिला रहे हैं। 28 सीटों पर होने वाला यह उपचुनाव मध्यप्रदेश के लिए बहुत ही अहम चुनाव है। यह चुनाव शह और मात का खेल बन चुका है जहां हर कोई अपनी चाल बहुत सोच समझ कर चल रहा है। कोरोना महामारी के बाद होने वाला यह प्रदेश का पहला चुनाव होगा। इस चुनाव में कई अहम मुद्दे हावी रह सकते हैं, इसमें से एक नया कृषि कानून भी है।

किसानों ने ही छीनी थी शिवराज से सत्ता

कृषि कनून पर देश के किसानों में असमंजस का महौल है। पंजाब और हरियाणा में जहां किसान इस कानून का विरोध कर रहे है तो अन्य राज्यों के किसानों में भी खास संतोष नहीं है। लोगों में एमएसपी और कृषि क्षेत्र के निजीकरण को लेकर कई सवाल हैं। हालांकि मध्यप्रदेश में इस कानून को लेकर ज्यादा विवाद और विरोध नहीं है। लेकिन यह तय है कि कांग्रेस उपचुनाव (MP By Elections) में इस मुद्दे को ज़रुर भुनाएगी। आपको बता दें कि 15 साल के लंबे वनवास के बाद कांग्रेस ने राज्य में सत्ता हासिल की थी और उसके केंद्र में किसान ही था। मंदसौर में किसानों पर शिवराज के शासन में चली गोली और राज्यवापी आंदोलन ने ही सत्ता की जड़े हिलाने का काम किया था। कमलनाथ द्वारा किसानों की कर्ज़माफी का वादा भी कांग्रेस की जीत का एक अहम कारण रहा। ऐसे में यह कहना कि कृषि कानून का उपचुनाव में कोई असर नहीं होगा यह कहना अभी जल्दबाज़ी ही होगी।

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मध्यप्रदेश मूल रुप से किसान प्रधान राज्य ही है, यहां किसान हमेशा सत्ता के लिए मुख्य किरदार निभाता आया है। कमलनाथ द्वारा किया गया कर्ज़ माफी का वादा अधूरा रहा अपने दो साल की सरकार में वो कुछ ही किसानों का कर्ज़ माफ कर पाए। भाजपा ने कमलनाथ के कर्ज़ माफी को धोखा करार दिया है। अगर राज्य में किसानों से बात की जाए तो ज्यादातर लोग कर्ज़माफी न होने का दावा करते दिखाई देते हैं। ऐसे में कृषि कानून को भुनाना और दोबारा किसानों का समर्थन हासिल करना कांग्रेस के लिए भी आसान नहीं होगा।

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दूसरा जो मुद्दा इस उपचुनाव (MP By Elections) में हावी रहेगा वह है कोरोना महामारी और लॉकडाउन का। लॉकडाउन की वजह से कई प्रवासी मज़दूर अपने गांव लौट आए और प्रशासन की ओर से उनके लिए रोज़गार की कोई खास व्यवस्था नहीं की गई। कई लोगों को उनकी रोज़ी रोटी से हाथ धोना पड़ा, व्यापार और दुकाने बर्बाद हो गई लेकिन किसी प्रकार की आर्थिक मदद लोगों तक नहीं पहुंची। इस समय किसान मज़दूर, व्यापारी और आम आदमी कोरोना महामारी की वजह से टूटा हुआ दिखाई देता है। ऐसे में शिवराज के लिए वोटरों को रिझाना आसान नहीं होगा। यानि यह चुनाव सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए एक प्रयोगशाला की तरह होगा। वोटर को समझना इस समय किसी के लिए आसान नहीं है। हालांकि शिवराज का यह साफ कहना है कि कमलनाथ से एक बार धोखा खाने के बाद लोग उनका साथ नहीं देंगे यह लगभग तय है।

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