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अगर सुभाष चंद्र बोस देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो कैसे काम करती उनकी सरकार?

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन और उनकी मृत्यु का रहस्य आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर कर देता है। जन्म के 125 साल बाद भी उनकी विरासत बंगाल की राजनीति, संस्कृति, समाज और साहित्य को प्रभावित करती रही है।

कई लोगों का मानना है कि अगर नेताजी अचानक गायब नहीं होते तो वो देश के प्रधानमंत्री बन सकते थे। उन्होंन अपने सपनों के भारत का जो खाका खींचा था आज वही हम आपको बताने जा रहे हैं।

सुभाष चंद्र बोस का क्या था आज़ाद भारत के लिए प्लान

1897 में कटक के एक बंगाली परिवार में उनका जन्म हुआ। कलकत्ता में ही उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई की और इसी शहर को उन्होंने अपनी राजनीतिक ज़मीन बनाने के लिए चुना।

सुभाष चंद्र बोस को भारतीय इतिहास की बहुत समझ थी उन्होंने इस विषय पर गहन अध्ययन किया था। उनकी यही समझ उन्हें एक अच्छा शासक बनाती थी। भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सरकारी नौकरी को ठुकरा कर उन्होंने चितरंजन दास के कहने पर राजनीति में कदम रखा। चितरंजन दास स्वदेशी आंदोलन में विश्वास रखते थे। चितरंजन दास ने अपनी अपनी किताब देशर कथा में इंडियन होम रुल पर प्रकाश डाला है। इसमें उन्होंने भारत के अपने गवर्निंग सिस्टम पर काफी विस्तार से लिखा है। नेताजी अपने राजनीतिक गुरु के विचारों से काफी प्रभावित थे। जब वो बाद में कलकत्ता मुनिसिपल कॉरपोरेशन के मेयर बने तो उन्होंने अलग-अगल सामाजिक परिवेश के लोगों के लिए उनकी ज़रुरत के हिसाब से काम किया ।

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वो मानते थे कि बंगाली मुस्लिम सामाजिक और आर्थिक रुप से समाज के सबसे निचले पायदान पर हैं जिसके कई कारण हैं। उन्हें सामाजिक विकास के लिए नौकरियों में लाने की सख्त आवश्यकता है। 1925 में मेयर रहते हुए उन्होंने अपने भाषण में मुस्लिमों के लिए नौकरियों की व्यवस्था करने पर काफी ज़ोर दिया था। नेताजी ने अपने शब्दों को चरितार्थ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन अंग्रेजी प्रशासन की ओर से उन्हें कई तरह की अड़चनों का सामना करना पड़ा। नेताजी को लगता था कि कुटिल अंग्रज़ी प्रशासन कभी भी उन्हें हिंदू-मुस्लिम के बीच की खाई को भरने की इजाज़त नहीं देगा।

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नेताजी मानते थे की भारत में मुस्लिमों की समस्या एक काल्पनिक कथा है जिसे अंग्रेज़ों ने लिखा है, यह अंग्रेज़ो के जाने के साथ ही खत्म हो जाएगी।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए मुस्लिम कभी एंटी नेशनल नहीं रहे न ही उन्होंने अपने सपनों के भारत में हिंदुओं को प्राथमिकता देने का स्वप्न देखा था। नेताजी हमेशा भारतीय मुस्लिमों द्वारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में किए गए बराबर योगदान की प्रशंसा करते थे। उनके सपनों के भारत में हर नागरिक को सांस्कृतिक और धार्मिक आज़ादी का हक दिया गया था। साथ ही वो राज्य को धर्म से अलग रखने के विचार पर विश्वास रखते थे।

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