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नोटबन्दी के बाद नक्सलवाद की कमर क्यों नहीं टूटी?

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न्यूज़ डेस्क। ग्राउंड रिपोर्ट।

हाल ही में महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में हुए नक्सल हमले में हमारे 15 जवान शहीद हो गए। नक्सलियों ने क्विक एक्शन फ़ोर्स के जवानों के काफ़िले को लैंडमाइन ब्लास्ट कर निशाना बनाया। यह हमला पुलवामा हमले की भी याद दिलाता है, जहां आतंकवादियों ने सेना के काफिले को निशाना बनाया था। pबीते कुछ सालों में नक्सली हमलों में तेज़ी आई है। नक्सल प्रभावित माने जाने वाले रेड कॉरिडोर के बाहर भी नक्सलवादी जड़े फैलाते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में नक्सलवाद की कमर तोड़ देने का सरकार का दावा याद आता है।

मोदी सरकार द्वारा नोटबन्दी की एक अहम वजह नक्सलवाद और आतंकवाद को आर्थिक रूप से कमज़ोर करना बताई गई थी। यह दावा भी किया गया था कि नोटबन्दी से सबसे ज़्यादा नुकसान नक्सलियों को होगा। लेकिन नोटबन्दी का मकसद पूरी तरह नाकाम हो गया। छोटे गरीब किसान और व्यापारियों पर नोटबन्दी का सबसे ज़्यादा असर हुआ और कला धन रखने वाले इस झटके को सहन कर गए। यह जांच का विषय है कि आखिर नोटबन्दी के बाद नक्सलियों को किसने आर्थिक सहायता दी?

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सरकार खुले तौर पर अभी भी नोटबन्दी की असफलता स्वीकार नहीं करती। लेकिन जिस तरह से नक्सलवाद फिर से पैर पसार है, वह चिंता का विषय है।

पुलवामा हमले में आतंकवादी घाटी में इतना आरडीएक्स लाने में कैसे सफल हो गए? सेना के काफिलों की सुरक्षा क्यों सुनिश्चित नहीं कि गई? गढ़चिरोली में सेना के काफिले की सुरक्षा का ध्यान क्यों नहीं रखा गया? यह वो सवाल हैं जिनका जवाब सरकार को देना चाहिए।