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नक्सलवाद: ‘लाल-आतंक’ का वो आंदोलन जिसने हिला दी थी सरकार की चूलें

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न्यूज़डेस्क, रिपोर्ट- पिंकी कड़वे

नक्सलवाद वामपंथी क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है ज‌िसका उदय भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप हुआ है नक्सलवाद शब्द की उत्पत्त‌ि पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी गांव से हुई थी।भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारु माजूमदार और कानू सान्याल ने 1969 में सत्ता के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन शुरु किया।

माजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्सो तुंग के बड़े प्रशसंक थे। इसी कारण नक्सलवाद को माओवाद भी कहा जाता है। उनका मानना था, कि भारत के मजदूरों और किसानों की जो दूर्दशा हो रही है, उसके लिए सरकार और सरकार की नीतियां जिम्मेदार है।

उनके अनुसार सरकार ने उच्च वर्ग को हमेशा ज्यादा तवज्जों दी है जिससे समाज के उद्योगपतियों का एक बड़े तबके ने अपने हित‌ों को साधने के लिए संपूर्ण वहा के जमीनों पर अपना वर्चस्व स्थापित किया है।

यही कारण है कि लाल गलियारे (आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल) का कृषिगत ढांचा पूरी तरह से चरमा गया है।

द‌िपेंद्र भट्टाचार्य थे मुखिया
1968 में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ मार्क्ससिज्म एंड लेन‌िन (Communist Party of Marxism and Lenin) (CPML) का गठन किया गया जिनके मुखिया द‌िपेंद्र भट्टाचार्य थे। यह लोग मार्क्स और लेनिन के सिद्धांतों पर काम करने लगे, क्योंकि वे उन्हीं से ही प्रभावित थे। वर्ष 1969 में पहली बार चारु माजूमदार और कानू सान्याल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर पूरे देश में सत्ता के खिलाफ एक व्यापक लड़ाई शुरू कर दी।

भूमि अधिग्रहण को लेकर देश में सबसे पहले आवाज नक्सलवाड़ी से ही उठी थी। आंदोलनकारी नेताओं का मानना था कि ‘जमीन उसी को जो उस पर खेती करें’। नक्सलवाड़ी से शुरु हुआ इस आंदोलन का प्रभाव पहली बार तब देखा गया जब पश्चिम बंगाल से कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई।

इस आंदोलन का ही प्रभाव था कि 1977 में पहली बार पश्चिम बंगाल में कम्यूनिस्ट पार्टी सरकार के रूप में आयी और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने। सामाजिक जागृत के लिए शुरु हु्आ इस आंदोलन पर कुछ सालों के बाद राजनीति का वर्चस्व बढ़ने लगा और आंदोलन जल्द ही अपने मुद्दों और रास्तों से भटक गया।

बिहार पहुंचने पर मकसद से भटका आंदोलन
जब यह आंदोलन फैलता हुआ ब‌िहार पहुंचा तब यह अपने मुद्दों से पूरी तरह भटक चुका था। अब यह लड़ाई जमीनों की लड़ाई न रहकर जातीय वर्ग की लड़‌ाई शुरू हो चुकी थी।

यहां से शुरु होता है उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग के बीच का उग्र संघर्ष जिससे नक्सल आंदोलन ने देश में नया रूप अख्तियार किया। श्री राम सेना जो कि माओवादियों की सबसे बड़ी सेना थी, जिन्होने उच्च वर्ग के खिलाफ सबसे पहले हिंसक प्रदर्शन करना शुरू किया।

इससे पहले 1972 में आंदोलनकारी के हिंसक होने के कारण चारु माजूमदार को गिरफ्तार कर लिया गया और 10 दिन के लिए कारावास के दौरान ही उनकी जेल में ही मौत हो गयी।

नक्सलवादी आंदोलन के प्रणेता और कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ मार्क्ससिज्म एंड लेन‌िन के फाउंडर कानू सान्याल ने आंदोलन के राजनीति का शिकार होने के कारण और अपने मुद्दों से भटकने के कारण तंग आकर एक कद्दावर नेता ने 23 मार्च, 2010 को आत्महत्या कर ली।

वर्तमान स्थित‌ि
नक्सलवाद की स्थिति आज यह है कि देश के 15 राज्यों में नक्सलवाद का प्रभाव है। जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक आदि प्रमुख राज्य है।

कुल 92 हजार वर्ग किमी भूमि नक्सलियों के कब्जे में है। पिछले 10 दस सालों में नक्सलवादी क्षेत्रों में देश के करीब 10 हजार नागरिकों और जवानों की मौत हुई है। आजादी के बाद करीब 10 करोड़ आदिवासियों ने अपनी जमीने छोड़ी है।

नक्सलवादी नेताओं का आरोप है कि भारत में भूमि सुधार की रफ्तार बहुत ही सुस्त है। उनके अनुसार चीन में 45 प्रतिशत जमीनें छोटे किसानों को बांटी गई है, जापान में 33 प्रतिशत वहीं भारत में आजादी के बाद सिर्फ 2 प्रतिशत ही जमीन आवंटन हुई है।

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