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मोदी सरकार ने की 1609 करोड़ की मीडिया फंडिंग, दैनिक जागरण को मिले सबसे ज्यादा 100 करोड़ रुपये

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नेहाल रिज़वी | नई दिल्ली

वर्तमान समय में भारत में मीडिया की भूमिका को लेकर अब तमाम सवाल उठने लगे हैं. मीडिया में ही प्रकाशित कुछ रिपोर्टस के अनुसार  पहले के मुकाबले अब लोगों में मीडिया के प्रति भरोसे में तेज़ी से कमी आती जा रही है. प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों पर अब लोगों ने आंख मूंद कर भरोसा करना छोड़ दिया है. वर्तमान समय में मीडिया को सरकार की कटपुतली के खिताब से भी नवाज़ा जाने लगा है.

अब मीडिया का मतलब पैसा ?  

RTI- लगा कर प्राप्त की गई जानकारी के अनुसार मोदी सरकार ने सबसे ज़्यादा विज्ञापन हिंदी अख़बारों को दिया, जिसमें सबसे ज़्यादा पैसा दैनिक जागरण को प्राप्त हुआ. साल 2014 से 2019 के मध्य मोदी सरकार ने देश के हिंदी अख़बारों को 890 करोड़ के विज्ञापन दिए और अंग्रेज़ी के अख़बारों को 719 करोड़ के विज्ञापन दिए गए. इनमें सबसे ज़्यादा 100 करोड़ का विज्ञापन हिंदी के अख़बार दैनिक जागरण को दिया गया.

सरकार से मिलने वाले विज्ञापनों में दूसरे नंबर पर दैनिक भास्कर रहा जिसे 56 करोड़ 66 का विज्ञापन दिया गया. हिन्दुस्तान अखबार को 50 करोड़ 66 लाख का विज्ञापन मिला. पंजाब केसरी को 50 करोड़ 66 लाख, अमर उजाला को 47.4 करोड़, राजस्थान पत्रिका को 27 करोड़ 78 लाख, नभाटा दिल्ली को तीन करोड़ 76 लाख रुपये विज्ञापन के नाम पर मिले. अंग्रेजी अखबारों में सबसे ज्यादा पैसा टाइम्स ऑफ इंडिया को मिला. मोदी सरकार ने अपने पहले टेन्योर में 5726 करोड़ रुपये पब्लिसिटी पर फूंक दिए. इंटरनेट पर सरकारी विज्ञापन पांच सालों में 6.64 करोड़ से 26.95 करोड़ पहुंच गया है.

विज्ञापन के ज़रिए सरकार ने अख़बारों के हाथ बांध दिए ?

बिना स्वतंत्र मीडिया के स्वस्थ लोकतंत्र को सुनिश्चित कर पाना संभव नहीं है. लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकतांत्रिक देशों में प्रेस के लिए बिना अड़चन और रोक के काम कर पाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में मीडिया की आजादी का सिमटना खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. इंडेक्स के 180 देशों में सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करनेवाला भारत पिछले साल के 133वें स्थान से 136वें स्थान पर आ गया है.

क्या सरकार उन मीडिया संस्थानों को सरकारी विज्ञपन नहीं देती जो सरकार की नीतियों की जमकर आलोचना करते हैं ? किसी भी मीडिया हाउस को चलाने के लिय राजस्व जुटाने का सबसे बड़ा माध्यम होता है सरकारी विज्ञापन. वर्तमान समय में देश में लोगों का मानना है कि अधिकतर मीडिया संस्थानों ने सत्तापक्ष के आगे अपने शीश को झुका रखा है जिसके कारण मीडिया को लेकर तमाम सवाल खड़े होने लगे हैं.   

महेश व्यास मीडिया को लेकर कहते हैं-

मैं कहता हूं कि आप पाठक और दर्शक के रूप में अपना व्यवहार बदलें. थोड़ा सख़्त रहें. देखें कि कहां सवाल उठ रहे हैं और कहां नहीं. सवालों से ही तथ्यों के बाहर आने का रास्ता खुलता है. हिंदी के अख़बार आपको कूड़ा परोस रहे हैं और आपकी जवानी के अरमानों को कूड़े से ढांप रहे हैं.

अख़बार ख़रीद लेने और खोलकर पढ़ लेने से पाठक नहीं हो जाते हैं. गोदी मीडिया के दौर पर हेराफेरी को पकड़ना भी आपका ही काम है. वर्ना आप अंधेरे में बस जयकारे लगाने वाले हरकारे बना दिए जाएंगे. मैंने बीस साल के पाठकीय जीवन में यही जाना है कि चैनल तो कूड़ा हो ही गए हैं, हिंदी के अख़बार भी रद्दी हैं.

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