क्यों मनाया जाता है ‘नकबा दिवस’, आख़िर इज़राइल को क्यों है इससे दिक्कत ?

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Ground Report | News Desk

15 मई को फिलीस्तनी समर्थक नकबा दिवस के रुप में मनाते हैं। 14 मई 1948 को इज़राल एक देश के रुप में अस्तित्व में आया था और उसके परिणामस्वरुप बहुत से फिलीस्तीनियों से उनकी ज़मीने छिन गईं और लाखों लोग बेघर होकर दूसरे देशों में शरणार्थी के रुप में रहने को विवश हो गये। इसी याद में प्रत्येक वर्ष 15 मई को नकबा दिवस मनाया जाता है। नकबा अरबी शब्द है जिसका अर्थ होता है विनाश या तबाही।

इतिहासकार बेनी मॉरिस अपनी किताब ‘द बर्थ ऑफ़ द रिवाइज़्ड पैलेस्टीनियन रिफ़्यूजी प्रॉब्लम’ में लिखते हैं, ” 14 मई 1948 के अगले दिन साढ़े सात लाख फ़लस्तीनी, इसराइली सेना के बढ़ते क़दमों की वजह से घरबार छोड़ कर भागे या भगाए गए थे। कइयों ने ख़ाली हाथ ही अपना घरबार छोड़ दिया था। कुछ घरों पर ताला लगाकर भाग निकले। यही चाबियां बाद में इस दिन के प्रतीक के रूप में सहेज कर रखी गईं।”

लेकिन इज़राइल इस कहानी को नहीं मानता। उसका दावा है कि फ़लस्तीनी लोग उनकी वजह से नहीं बल्कि मिस्र, जॉर्डन, सीरिया और इराक़ के हमले की वजह से भागे थे क्योंकि इन देशों की सेनाएं यहूदी जीत को रोकना चाहती थीं। जब ये संघर्ष ख़त्म हुआ तो इसराइल ने फ़लस्तीनियों को वापस नहीं लौटने दिया। उसका तर्क था कि उन मकानों के मालिक ग़ैर हाज़िर हैं इसलिए उन्हें ज़ब्त करना वाजिब है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के अनुसार “इजरायल फिलिस्तीनी त्रासदी के लिए जिम्मेदार नहीं था।”

नकबा दिवस के दिन फिलीस्तीन एवं विश्व के दूसरे देशों में जहां फिलीस्तीनी शरणार्थी के रुप में रह रहे हैं 1948 की उस तबाही की याद में मार्च, रैलियां निकालते हैं। घरों की उन चाबियों का भी प्रदर्शन किया जाता है जिन घरों को छोड़कर 1948 में उन्हें भागना पड़ा था और फिर कभी उन्हें वापस अपने घर लौटने की अनुमति इज़रायल सरकार द्वारा नहीं मिली। इसकी शुरुआत 1998 में फिलीस्तीनी अथॉरिटी के अध्यक्ष यासिर अराफ़ात ने की थी।हालांकि, इस साल कोरोनोवायरस महामारी के बीच रैलियों को रद्द कर दिया गया है। फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने नकबा दिवस को मनाने के लिए डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल करने की अपील की है।

यरूशलम को अपने राज्य का हिस्सा बनाने को लेकर इज़राइल और फ़लस्तीन के बीच हमेशा से ही विवाद और संघर्ष का मुद्दा रहा है क्योंकि इज़राइल इसे अपना ‘अविभाज्य राजधानी’ मानता है और फ़लस्तीनी इसे अपने भविष्य के राष्ट्र का मुख्यालय बनाने की ख़्वाहिश रखते हैं। जिसे लेकर अकसर संघर्ष और हमले होते रहते हैं। इज़रायल विस्थापित फिलीस्तीनियों जो जॉर्डन, लेबनान, सीरिया, वेस्ट बैंक जैसे दूसरे देशों में शरणार्थी के रुप में रह रहे हैं वापस आने नहीं देता इसको लेकर भी हिंसक झड़पें होती रहती हैं।

2001 में सीरिया बार्डर से अपने घर लौटने का प्रयास कर रहे 22 फिलीस्तीनियों पर इज़रायली सेना द्वारा हमला कर दिया गया जिसमें चार लोगों की मौत हो गई। उसी दिन गाज़ा पट्टी में भी एक फिलीस्तीनी की मौत हो गई और 125 लोग घायल हो गए। 2017 में वेस्ट बैंक के Ramallah में हुई झड़पों में 11 घायल हो गए थे । जब प्रदर्शनकारियों ने इजरायली सैनिकों पर पथराव किया तो, इजरायली सैनिकों ने रबर की गोलियों से हमला कर उसका जवाब दिया था। यहूदियों और मुसलमानों दोनों के लिए पवित्र स्थल रहे राहेल के मकबरे पर इजरायल के सैनिकों द्वारा पत्थर फेंके जाने के बाद बेथलेहम में स्टन ग्रेनेड और आंसू गैस की भी बारिश हो गई थी।

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