UP : कानपुर स्थित इस गाँव में मुस्लिम मज़दूरों को अब नहीं करने दिया जा रहा कोई काम

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सम्पूर्ण विश्व इस बात से भली-भांति अवगत है कि कोरोना जैसा घातक वायरस कहां से फैला है । मगर हमारे देश भारत में इसे सांप्रदायिक जामा पहनाकर इस बीमारी का ज़िम्मेदार मुसलमानों को ही बता दिया गया । मीडिया द्वारा मुसलमानों को लेकर फैलाई गई झूठी ख़बरों और कोरोना को भारत में फैलाने का बेबुनियाद आरोप मुसलमानों पर लगाकर इतनी नफ़रत फैलाई गई, जिसके चलते मुसलमानों पर देशभर में हमले किए जाने लगे। उनका आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार किया जाने लगा।

कानपुर के शिवगंज गांव में मुसलमानों को साथ काफी भेदभाव ख़बर निकल कर सामने आ रही है । शहरों से अपने गांव लौटे प्रवासी मुसलिम मज़दूर गांव में बहिष्कार और भेदभाव जैसी यात्ना झेल रहे हैं । गांव के अधिकतर मुसलिमों का कहना है कि कोरोना की जांच कराने के बाद उनकी रिपोर्ट भी निगेटिव आई और 14 दिन क्वारंटाइन भी रहे मगर गांव में अब उनको काम नहीं करने दिया जा रहा । जबकि उसी गाँव के हिंदू मज़दूर कृषि क्षेत्रों में काम करने की इजाज़त है मगर मुस्लिम मजदूरों को नहीं ।

Indiaspend में प्रकाशित एक ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार कोरोना फैलाने का ज़िम्मेदार इस गांव में मुस्लिमों को समझा जाता है । गांव वालों को लगता है मुस्लिमों के काम करने से गांव में कोरोना फैल सकता है । एक 50 वर्षीय मुस्लिम मज़दूर, जो नोएडा स्थित एक वायर फैक्ट्री में काम करता था । जब वापस वह अपने गांव शिवगंज लौटा तो उसको अपने परिवार के साथ एक सरकारी स्कूल में 14 दिन तक क्वारंटाइन होना पड़ा । परिवार ने बताया कि दिन में दो बार भोजन तो मिलता था लेकिन खुले में शौच करने के लिए बाहर जाना पड़ता है। एक शौचालय मौजूद था मगर उसे ताला मार दिया गया था । घर की महिलाओं के लिए भी उस शौचालय का इस्तेमाल नहीं करने दिया गया । मजबूरी में हम लोगों को खुलें में शौच के लिए जाना पड़ता था ।

गांव में बसने वाले मुसलिम परिवार के लोग अपनी आजीविका कमाने के लिए गाँव में कृषि या दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें काम करने नहीं दिया जा रहा हैं। गांव में रहने वाले एक मुस्लिम व्यकति ने कहा कि- मैं अपने परिवार का पेट गांव में मज़दूरी करके पालना चाहचा हूं, लेकिन कोई हमें काम नहीं दे रहा है। उनका कहना है कि सभी मुसलमानों के पास कोरोना है इसलिए हमें काम पर नहीं रखा जा सकता है ।

कोरोना महामारी की जितनी क़ीमत दूसरे क़ौम के लोग चुका रहे हैं, उतनी ही क़ीमत मुसलमान भी चुका रहा है। सच तो यह है कि बाकी किसी भी समुदाय से ज्यादा तकलीफ़ में शहरी क्षेत्रों के छोटे मुस्लिम व्यापारी हैं। उन्हें कोई सरकारी राहत भी नहीं मिल सकती, क्योंकि वे पंजीकृत कामग़ार नहीं हैं। आज इस महामारी में जब पूरा भारत विस्थापन, बेरोज़गारी और भूख जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, भारत के मुसलमान इन सबके साथ-साथ अपने पड़ोसियों के नफ़रत और हिंसा को भी झेलने पर मजबूर हो रहे हैं।

भारत में कोरोना वायरस मुसलमानों के लिए दोहरी मार बनकर आया है । मीडिया द्वारा मुसलमानों को भारत में कोरोना फैलाए जाने का बेबुनियाद आरोप लगाकर दिखाई गई फेक न्यूज़ के बाद देशभर में मुसलमानों को ख़लनायक और हिकारत भरी नज़रों देखा जाने लगा है ।

Indiaspend की इस रिपोर्ट को आप यहां पढ़ सकते हैं ।

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